एनजीओ भूख का हौव्वा खड़ा करते हैं, और सरकार?


12 जनवरी 2012
संपादकीय
मशहूर अर्थशास्त्री अरविंद पनगढिय़ा ने कहा है कि भारत और अफ्रीका की भूख की बातें कर करके एनजीओ दौलतमंद बनते जा रहे हंै, लोगों की तकलीफों से उनका व्यापार बढ़ रहा है। बात सुनने में बहुत कड़वी लगती है,क्योंकि पिछले कुछ सालों से गैर सरकारी संगठन क्षेत्र के दखल, और सुझावों से ही गरीबों के लिए सरकारों ने बहुत मानवीय योजनाएं बनाई हंै, जैसे- नरेगा। छत्तीसगढ़ की खाद्य सुरक्षा योजना जिससे सीख लेकर केंद्र सरकार अब खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने जा रही है। यही नहीं, सामाजिक और  सियासी फलक पर भी एनजीओ के दखल, और उनके कामों के कारण कौमी भेदभाव, जात-पांत का भेदभाव, कोख में बेटियों की हत्या, और विवादास्पद होने पर भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन ने जनता और सरकार दोनों को दिशा दी है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जब अपने विषय का कोई बड़ा जानकार  ऐसी चुभती बात कहता है, तो उस पर गौर करना लाजिमी हो जाता है।
जनता की भलाई के लिए सरकारों की योजनाएं एनजीओ की मदद से सही तरीके से अंजाम तक पहुंच सकती हैं। वह समाज और सरकार के बीच कड़ी का काम करते हैं। सन 2000 में गुजरात में विनाशकारी भूकंप आने के बाद से देश में एनजीओ की तादाद बहुत बढ़ी, क्योंकि उस दौर में लोगों ने देखा कि मुसीबत में पड़ी जनता के लिए मदद जुटाने में एनजीओ कितने कारगर होते सकते हैं। प्रशिक्षित, विषयों के जानकार, और दिलों में जनता की सेवा करने का जज़्बा रखने वाले लोग समाज में बदलाव लाने के लिए क्या कुछ नहीं कर सकते। देश के कोने-कोने में ऐसे बहुत से एनजीओ हंै, जो बिना किसी शोर शराबे,  शोहरत की हसरत के, किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बिना, संजीदगी से अपना काम करते रहते हैं। ऐसे संगठनों के कारण एनजीओ क्षेत्र को नाम विश्वसनीयता और इज़्ज़त मिली है,  लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। जहां तकलीफंे हंै और उन्हें दूर करने की जरूरत है वहां ऐसे लोगों के लिए मौके हैं। जिन्हें एनजीओ बनाने, उन्हें चलाने की जानकारी है, और वह यह काम करना चाहते हैं समाससेवा का बहुत बड़ा जज़्बा दिल में ना होने पर भी यह लोग पेशेवर अंदाज में, अपनी पढ़ाई-लिखाई को काम में लगाकर इस क्षेत्र में अपना कैरियर बनाते हैं, लेकिन जब लोगों की तकलीफंे किसी की रोजी रोटी का जरिया बन जाए, तो यह खयाल भी उभर सकता है कि तकलीफे नहीं रहेंगी, तो हमें पूछेगा कौन, या तकलीफों का खौफ खड़ा करके अपने पैरों तले जमीन मजबूत की जाए। बहुत से विवादास्पद एनजीओ के कारण आज लोग इन सगठनों पर हावी हो रही पांच सितारा संस्कृति के बारे में बात करने लगे हैं। भोपाल गैस त्रासदी हो या गुजरात भूकंप, या गुजरात  कौमी  दंगे, या फिर छत्तीसगढ़ समेत नक्सल प्रभावित राज्यों की समस्याएं। शक पैदा करने वाले  एनजीओ और उनकी भूमिका पर चर्चे गाहे-बगाहे होते ही रहे है। यही नहीं आतंकवादियों की मदद के लिए एनजीओ के इस्तेमाल पर भी सरकार की तेज नजर है।
हम अक्सर एनजीओ के खिलाफ कुछ लिखने में संयम बरतते हंै, क्योंकि मु_ीभर लोगों के कारण, वाकई गंभीरता से काम कर रहे बहुत से संगठनों के लिए जनता के दिल में शक पैदा हो, यह हम नहीं चाहते। लेकिन यह सच है कि पैसों का गलत इस्तेमाल करने वाले, समस्याओं को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर सरकारी दान लेने वाले एनजीओ आखिरकार चलते तो जनता के पैसों से ही हैं। यही नहीं कार्पोरेट क्षेत्रों से बड़े-बड़े दान लेकर चल रहे एनजीओ भी आखिरकार तो जनता के पैसों से चलते हंै, क्योंकि इन कार्पोरेटों की शेयरधारक जनता है। यह जिन संसाधनों का इस्तेमाल करके धन बटोरते हंै, उन पर जनता का हक है, इसलिए हमारी यही उम्मीद रहती है कि एनजीओ के कामकाज में जितनी हो सके, पारदर्शिता बरती जाए। पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय में एक व्यक्ति ने एनजीओ को दिए जाने वाले पैसों के खर्च की जांच के लिए याचिका दायर की, तो सरकार की एक विकास एजेंसी कापार्ट ने अदालत को बताया कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ जेहाद चलाए हुए अन्ना हजारे के अपने ट्रस्ट ने गांवों में सिंचाई के लिए मिले पैसों का 90 फीसदी आने-जाने, वेतन, और छपाई में ही खर्च कर दिया। एजेंसी को फिर भी इससे शिकायत नहीं, शायद इसलिए कि जनता का पैसा सबका पैसा होता है। एनजीओ की जवाबदेही और पारदर्शिता की जांच सरकार का काम है, क्योंकि वही इन्हें जनता के लिए बनाए गई अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों की जिम्मेदारी और उसे निभाने के लिए जनता के पैसे सौंपती है, लेकिन ऐसे संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वह अपनी पारदर्शिता बनाए रखे।
पनगढिय़ा ने जो बात कही है वह पारदर्शिता और जवाबदेही के इसी मुद्दे से जुड़ा दूसरा, और बहुत अहम मुद्दा है। अपने लिए बाज़ार तलाशने, आर्थिक फायदे के लिए किसी समस्या का हौव्वा खड़ा करने का आरोप अक्सर संगठनों पर लगाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य  संगठन पर पिछले बरसों में यह आरोप कई बार लगते रहा कि वह कुछ दवा कंपनियों के फायदे के लिए महामारियों का डर खड़ा कर रहा है। यही बात एड्स और भुखमरी के लिए काम कर रहे संगठनों पर अक्सर लगता रहता है। भारत में भुखमरी और गरीबी के आंकड़ों पर इस क्षेत्र में काम कर रहे संगठनों, खाद्य सुरक्षा पर अभियान चला रहे संगठनों का,  योजना आयोग से टकराव इन दिनों ज़ोरों पर है। इन संगठनों ने योजना आयोग को गरीबी की बहुत अपमानजनक सीमा वापस लेने पर मजबूर किया है, लेकिन कार्पोरेटों को लाखों-करोड़ों की रियायत देने वाली सरकार गरीबों की खाद्य सुरक्षा में कुछ हजार करोड़ के खर्च को बूते के बाहर बताकर इन संगठनों की बात न मानने पर तुली है। पनगढिय़ा एशियाई विकास बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री रह चुके हंै। उन्होंने विश्व बैंक और आईएमएफ में भी काम किया है, इसलिए भूख पर काम कर रहे संगठनों के बारे में उनकी राय, ऐसे संगठनों के लगातार निशाने पर बने हुए मॉंटेक सिंह अहलुवालिया से किसी हमदर्दी के कारण है, या उससे परे, यह तय करने का बीड़ा हम नहीं उठाते। यह सच है कि भूख मिटाने के लिए देश के संसाधनों में से ज्यादा हिस्सा मांग रहे समाजिक संगठन, योजना आयोग और वित्त मंत्रालय के आंख की किरकिरी बने हुए हैं, और यह भी सच है कि दुनिया में ऐसे भी एनजीओ जिन्होंने लोगों की तकलीफों को पैसे कमाने का जरिया बनाया है, पनगढिय़ा  के बयान को इन दोनों बातों की बिना पर तौलकर देखना होगा। लेकिन यह सच है कि अगर भूख पर शोर मचाने वाले एन जी नो नहीं होते तो, मॉंटेक सिंह 20 रुपये रोज को गरीबों के गुजारे के लिए काफी ठहरा चुके होते। और यह भी कि अगर एनजीओ भूख का हौव्वा खड़ा करके पैसे बना रहे हंै, तो इसकी जिम्मेदारी से सरकारें और ऐसे  बैंक नहीं बच सकते, जो जनता का पैसा उन्हें देकर उस पर नजर रखने की अपनी जिम्मेदारी से चूक जाते हैं।

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