बसें बढ़ाने की अच्छी सोच


23 जनवरी 2012
संपादकीय
केंद्र सरकार की खबर है कि वह अगले पांच बरस में देश में 85 हजार बसों को सार्वजनिक परिवहन के लिए बढ़ाने की योजना बना रही है। खुद सरकार के आंकड़े बताते हैं कि किस तरह पिछले बरसों में लगातार देश के कुल वाहनों में सार्वजनिक बसों का अनुपात घटते चले गया है और लोग इस कमी की वजह से निजी गाडिय़ों पर चलने के लिए मजबूर हो जाते हैं। एक बार जब कोई अपनी गाड़ी पर चलने लगता है तो फिर उसका सार्वजनिक परिवहन पर लौटना कुछ मुश्किल होता है। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि सार्वजनिक परिवहन के महत्व को बताते हुए हम लगातार लिखते हैं। छत्तीसगढ़ इस बात की मिसाल है कि किस तरह बसों के चलने से वे एकदम से लबालब रहती हैं और लोगों को इससे बड़ी सहूलियत भी मिलती है। रायपुर में आधी सदी पहले चलने वाली सिटी बसें बीच के कुछ दशक पूरी तरह बंद रहीं, लेकिन अब जब इनको शुरू किया गया तो लोग इन पर टूट पड़े। आज इन बसों को कई गुना बढ़ाने की मांग हो रही है। राजधानी दिल्ली का अनुभव है कि जब भूमिगत ट्रेन, मैट्रो शुरू हुई तो सड़कों से भीड़ कम हुई और लोग राजधानी के लंबे-चौड़े इलाके, एनसीआर, में दूर तक जाने के लिए अपनी कार छोड़कर मैट्रो को पसंद करने लगे क्योंकि सस्ती होने के साथ-साथ उसमें समय भी बचने लगा। एक-एक करके देश के महानगरों में मैट्रो की मांग होने लगी है और पूरी दुनिया यह बताती है कि सार्वजनिक परिवहन ही सड़कों से गाडिय़ों को कम करने का अकेला इलाज है। 
भारत का शहरी और संपन्न जीवन अमरीकापरस्त चले आ रहा है। यहां पर लोगों की गाडिय़ांं निजी जरूरतों के मुकाबले अधिक बड़ी भी होती जा रही हैं और जहां पर गाड़ी के बिना काम चल सकता है, वहां भी लोग गाडिय़ों पर आश्रित हो चुके हैं। यह सिलसिला आटोमोबाईल कंपनियों, पेट्रोलियम कंपनियों और इनसे जुड़े दूसरे कारखानों-कारोबारों को ठीक लगता है। ऐसी ही नौबत को और अधिक बाजारू बनाने के लिए एक वक्त अमरीका ने फोर्ड जैसी निजी कार कंपनी ने सार्वजनिक यातायात की ट्राम गाडिय़ां खरीद ली थीं और उन्हें कबाड़ में फेंककर लोगों को निजी कार रखने के लिए मजबूर कर दिया था। यह सिलसिला खतरनाक है और इसे जो लोग अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ समझते हैं, वे एक ऐसी पूंजीवादी व्यवस्था को बढ़ावा देना चाहते हैं जिनमें लोग कर्ज ले-लेकर महंगी जिंदगी जीने को मजबूर हो जाएं। पूंजीवाद में अफ्रीका के देशों तक यह हालत कर दी है कि फटेहाल लोगों को अगर अस्पताल तक भी जाना है तो भी उन्हें निजी गाडिय़ों पर निर्भर रहना होता है।
केंद्र सरकार की यह पहल जरूरत को कितना पूरा करेगी यह अंदाज लगाना हमारे लिए मुश्किल है। लेकिन अगर जरूरत हो तो कारों पर एक ऐसा टैक्स लगाना चाहिए जिसे सीधा-सीधा सार्वजनिक बसों पर खर्च किया जाए। इससे एक तरफ तो कार खरीदना कुछ भारी पड़ेगा, और दूसरी तरफ बसें बढ़ती चली जाएंगी। बसों में चलने वाले लोग सीधे-सीधे कार वाले तो नहीं होते, लेकिन बस और कार के बीच की इतनी बड़ी आबादी दुपहिए गाडिय़ों पर चलने वालों की है कि उनको सार्वजनिक बस-ट्रेन से फायदा भी होगा और वे अपनी मौजूदा गाडिय़ों का कम इस्तेमाल करेंगे, कारों की तरफ बढऩे का नहीं सोचेंगे। इसके साथ-साथ जो कारें आज सड़कों पर आ चुकी हैं, उनका भी इस्तेमाल कम होते जाएगा और सड़कों पर से भीड़ घटेगी। लोगों के घरों में आज कारें चाहे खड़ी रहें, ऐसे लोग भी अगर बस और ट्रेन से चलने में समय और पैसों का फायदा देखेंगे तो वह अच्छा है। सरकार को पहले लोकल ट्रेन और बस का ऐसा जाल फैलाना होगा कि वह निजी गाडिय़ों का एक कामयाब विकल्प बन सके।
आज देश में राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास के नाम पर जितने बड़े-बड़े सरकारी निर्माण होते दिख रहे हैं, या जनता पर टैक्स लगाने का ठेका देकर जो निजी सड़क-पुल बनवाए जा रहे हैं, वे सबके-सब अधिक गाडिय़ों को बढ़ावा देने के हिसाब से किए गए हैं। अगर शहरों और गांवों के बीच, बड़े शहरों के बीच, अलग-अलग आयवर्ग की जरूरत के हिसाब से सस्ती और महंगी सार्वजनिक परिवहन सेवा स्थापित होती है, तो उससे भी आयातित र्इंधन, पर्यावरण, देश की उत्पादकता और लोगों के निजी जीवन सबको फायदा पहुंचेगा।



दर्जनों हत्याओं से जुड़े रहे हत्यारे की किताब, विमोचन


22 जनवरी 2012
संपादकीय

जयपुर में चल रहे नामीगिरामी लोगों के साहित्य सम्मेलन से सलमान रूश्दी को लेकर जितनी बड़ी खबर नहीं उठ पाई, उससे कहीं अधिक बड़ी खबर दिल्ली से उठी है कि एक प्रमुख प्रकाशक ने बिहार के एक कुख्यात हत्यारे की एक किताब छापी है जिसका विमोचन देश के एक विख्यात आलोचक नामवर सिंह करने जा रहे हैं। यह खबर कई मायनों में भयानक है। आनंद मोहन सिंह नाम का यह हत्यारा एक कलेक्टर के कत्ल में उम्रकैद काट रहा है और इससे परे वह दो दर्जन से अधिक हत्याओं के मामले में सुबूत न मिलने पर छूट चुका है। उत्तर भारत की राजनीति में ऐसे अपराधियों का दखल आज वैसे भी पूरे देश में फिक्र की वजह बना हुआ है, लेकिन उससे बड़ी फिक्र यह है कि एक प्रतिष्ठित प्रकाशक बिना पहले की किसी साहित्यिक साख के ऐसे हत्यारे की किताब को छाप रहा है और देश में हिन्दी के सबसे बड़े आलोचकों में से एक, अपने वामपंथी रूझान के बाद भी इसका विमोचन करने जा रहा है। नामवर सिंह प्रगतिशील लेखक संघ नाम के संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं, और शायद अभी भी हैं। यह संगठन भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की विचारधारा से जुड़ा हुआ माना जाता है और आपातकाल का स्तुतिगान करने के लिए हमेशा से यह आलोचना का शिकार भी रहा है।
इस बारे में जब हमारे अखबार ने राजकमल प्रकाशन के प्रमुख से बात की तो उन्होंने एक अपराधी को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हकदार बताया। यह एक सनसनीखेज बाजारू और कारोबारी फैसला हो सकता है कि हिंदी में किताबों के गिरते ग्राहकों को फिर से दुकानों तक ले जाने के लिए कोई ऐसी किताब छापे और अपनी बाकी किताबों के लिए भी कुछ चर्चा पा ले। लेकिन जिस अपराधी का पुराना रिकॉर्ड ऐसे किसी साहित्य का न रहा हो, और जिसके नाम पर इतने बड़े-बड़े अपराधों की एक मील लंबी लिस्ट पुलिस से अदालत तक चली हुई हो, उसके लिखे हुए को छापना और उसका विमोचन करके उसे एक सम्मान देना, एक मान्यता देना, हमें कुछ हैरान करता है। क्या अपराधों से दूर रहना, उनका हौसला पस्त करना सिर्फ  राजनीति और नेताओं का काम होना चाहिए या फिर समाज के बाकी तबकों को भी अपने हक का इस्तेमाल करते हुए ऐसे कुछ फैसले लेने चाहिए जिनसे कि अच्छे और बुरे का फर्क लोगों के सामने साफ हो सके। राजकमल प्रकाशन इसके बाद अगर चाहे तो निठारी कांड के दर्जनों बच्चों के बलात्कारी, हत्यारे और इंसानखोर लोगों के अनुभव भी छाप सकता है, उनकी कहानियां छाप सकता है और देश के महापुरूषों के बारे में उसकी लिखी बातें भी पाठकों तक पहुंचा सकता है। लोकतांत्रिक हक सबको लिखने का, और सबको छापने का है, लेकिन सामाजिक जिम्मेदारी और सामान्य समझबूझ का इस्तेमाल किसी प्रकाशक और विमोचक को अच्छे और बुरे का फर्क बता सकता है। राजकमल प्रकाशन और नामवर सिंह, और अगर नामवर सिंह का संगठन इससे सहमत हो तो वह भी, देश की जेलों में बंद और भी बड़े-बड़े ऐसे अपराधियों का महिमामंडन कर सकते हैं जो किसी विचारधारा के न होकर सिर्फ भयानक अपराधी रहे हुए हैं। 

रूश्दी की आजादी से जुड़े मुद्दे


21 जनवरी 2012
संपादकीय
जयपुर के सालाना साहित्यिक जलसे में अंगे्रजी के चर्चित और विवादास्पद लेखक सलमान रूश्दी का आना टल गया क्योंकि भारत के मुसलमान उनसे चले आ रहा पुराना विरोध लेकर उनके खिलाफ फिर खड़े हो गए थे। मुसलमानों की काफी आबादी वाले उत्तरप्रदेश में चुनाव होने जा रहे हैं, और ऐसे में रूश्दी का यहां आना न सिर्फ केंद्र सरकार के लिए बल्कि राजस्थान और उत्तरप्रदेश सरकार के लिए भी एक बड़ी परेशानी का सबब हो सकता था। लोकतांत्रिक उदारता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नजरिए से देखें तो रूश्दी के भारत आने पर हिफाजत का पूरा इंतजाम करना सरकार या सरकारों की सीधी-सीधी जिम्मेदारी बनती है, लेकिन सरकारों की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने राज में कोई बेकाबू तनाव न होने दें। रूश्दी पर दुनिया के कई मुस्लिम देशों से जारी किए गए फतवे तो चल ही रहे हैं, भारत में भी उन पर कोई हमला हैरानी की बात नहीं होती, इसलिए अगर सरकारों में उनके आने को लेकर अधिक उत्साह नहीं था, तो यह सरकारों की व्यापक जिम्मेदारियों और व्यापक जनहित को देखते हुए एक व्यवहारिक बात लगती है। 
हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती हैं, लेकिन भारत का संविधान सिर्फ ऐसी स्वतंत्रता वाला एक पन्ना नहीं है। यह एक बहुत ही जटिल संस्कृतियों वाले देश में सभी तबकों को इस अधिकार के साथ-साथ एक धार्मिक स्वतंत्रता देने वाला संविधान भी है और इसमें कुछ मामलों को लेकर अल्पसंख्यकों की भावनाओं का अलग से जिक्र भी है। यह बात सही है कि रूश्दी का विरोध करने वाले दुनिया भर के मुस्लिम संगठनों में से अधिकतर बहुत ही कट्टरपंथी हैं और उनके तौर-तरीके उग्रवादी या आतंकी हैं। लेकिन इससे इस बात पर फर्क नहीं पड़ता कि किसी तबके की धार्मिक भावनाओं को अगर रूश्दी के लिखे हुए से इस कदर चोट पहुंचती है कि वे इसके लिए बनाए गए कानून की मदद लेते हैं, तो भारत में ऐसे कानून या ऐसे हक के लिए सार्वजनिक लोकतांत्रिक प्रदर्शन की गुंजाइश भी है। रूश्दी की किताब पर लगाई गई रोक को भी हम गलत मानते हैं, लेकिन सवाल साथ-साथ ही यह भी खड़ा होता है कि किसी के लिखने की आजादी दूसरों की धार्मिक भावनाओं के अधिकार के साथ-साथ ही पढ़ी जा सकती हैं।
धार्मिक कट्टरता, धर्मांधता और पाखंड के खिलाफ हम भी आए दिन लिखते हैं। सलमान रूश्दी हो या कोई और, सबको अपनी बात लिखने का हक है और दुनिया के कुछ ऐसे देश हो सकते हैं जहां पर किसी धार्मिक तबके का विरोध हो इतना बड़ा खतरा उस समाज के लिए न हो कि वैसी किताब पर रोक लगाने की जरूरत पड़े। हमने योरप के देशों में रूश्दी को जगह पाते, और सरकारों का साथ पाते देखा है, लेकिन इन देशों ने ऐसे कार्टून बनाने की छूट भी सरकारों ने दी है जिनमें मोहम्मद पैगंबर का मजाक बनाया गया था। उन देशों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माहौल कुछ अलग है और वहां की सामाजिक स्थिति भी कुछ अलग है। वहां पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अलग पैमाने न सिर्फ धर्म के मामले में हैं बल्कि दूसरे मामलों में भी हैं। इसलिए हम दो अलग-अलग देशों की ऐसे मामले में पूरी-पूरी तुलना नहीं कर सकते। भारत की सरकार पर पहली जिम्मेदारी इस देश में अमन-चैन को जारी रखने की है, अगर किसी भी बात से ऐसे हालात बिगड़ सकते हैं तो सरकार पर उस खतरे को देखते हुए पहले से बचाव की कुछ कार्रवाई करने की जिम्मेदारी भी बनती है। इसलिए अगर रूश्दी के न आने से देश की परेशानी कुछ कम होती है, खतरा टलता है, तो इसे यह सोचकर भी देखना चाहिए कि आगे जब कभी इस देश में लोगों की सहनशीलता बढ़ेगी तब ऐसे मामलों को फिर से तौला जा सकता है। यह बात सिर्फ एक मुसलमान लेखक और मुस्लिम समाज की नहीं है। बहुत से दूसरे मामले ऐसे हुए हैं जिनमें कोई लेखक या कलाकार, कोई चित्रकार या फिल्मकार किसी तबके की नाराजगी का शिकार हुए हैं। सैद्धांतिक रूप से तो सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इन सबको पूरी हिफाजत दे, लेकिन सरकार की अपनी सीमाओं को भी देखना चाहिए। इस देश ने जब एक धार्मिक आतंक और कट्टरपंथी धर्मांधता के हाथों अपने एक प्रधानमंत्री को खोया है, जब एक क्षेत्र और जाति के आतंक के हाथों एक दूसरे प्रधानमंत्री को खोया है तो यह समझ लेना चाहिए कि सरकार की जिम्मेदारियां हवा में नहीं लिखी जा सकतीं और उनकी एक सीमा होती है। ऐसे सीमा को सोचे बिना सिर्फ आजादी की बात करना ठीक नहीं है। और आज के जमाने में किसी व्यक्ति का किसी देश में खुद होकर जाना जरूरी नहीं होता, ऐसी चर्चा के बाद उसका काम भी वहां पहुंचकर उसकी बात को रख सकता है। हमें अधिक अच्छा लगता अगर विरोध के बावजूद रूश्दी यहां आ पाते, लेकिन यह बात न उनके फायदे की होती और न भारत के फायदे की, अगर यहां उनका विरोध करते हुए बेकाबू लोगों में से कुछ लोग मारे जाते। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती लोगों को भी अपना लोकतांत्रिक विरोध करते हुए कुछ सब्र रखना होगा और ऐसे माहौल के लिए कोशिश करनी होगी जब चुनावी राजनीति से सहमे हुए नेता, और उनकी पार्टियां, और उनकी सरकारें धर्मांध लोगों के विरोध के मुकाबले रीढ़ की हड्डी के साथ खड़े हो सकें।

राहुल का आत्मघाती बयान

संपादकीय
20 जनवरी
राहुल गांधी की नासमझी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। कल उनकी जगह  उनकी उम्र का कोई दूसरा ऐसा नेता होता जो कि रात-दिन सिर्फ राजनीति ही कर रहा है तो वे उत्तरप्रदेश के लिए उमा भारती को आयातित साबित करने की कोशिश नहीं करते। मध्यप्रदेश की सरहद से लगे हुए उत्तरप्रदेश के लिए उमा भारती अगर बाहरी कही जाएंगी, तो भारत की राजनीति के लिए सोनिया गांधी क्या कही जाएंगी? और तर्क के लिए हम कुछ और पीछे जाना चाहेंगे, एक कश्मीरी पंडित मोतीलाल नेहरू का उत्तरप्रदेश में क्या काम था? और फिर आज राहुल गांधी के गुरू बने हुए दिग्विजय सिंह का उत्तरप्रदेश की राजनीति में इतने दखल का क्या काम है? और छत्तीसगढ़ में ग्यारह लोकसभा सीटों में से सिर्फ एक पर कांगे्रस का सांसद होने पर भी यहां की गिनीचुनी राज्यसभा सीटों में से एक पर बार-बार एक खालिस बाहरी मोहसिना किदवई को थोपने का क्या तर्क है? ऐसी मिसालें कांगे्रस पार्टी के लिए अनगिनत गिनाई जा सकती हैं, मनमोहन सिंह का असम से क्या रिश्ता? अर्जुन सिंह का दक्षिण दिल्ली से क्या रिश्ता था? और अगर हम कुतर्क की हद तक जाएं, तो आज सोनिया और राहुल जैसे सितारों के रहते हुए कांगे्रस को उत्तरप्रदेश में प्रियंका गांधी की जरूरत क्यों पड़ रही है जो कि शायद न तो कांगे्रस में है, और यह तो जाहिर है कि वे राजनीति में नहीं हैं। भारत के संघीय ढांचे में केंद्र और राज्यों के बीच के रिश्ते, राज्यों के बीच के आपस के रिश्ते लचीले होने चाहिए। आज अगर भाजपा किसी दूसरे राज्य से अपने किसी नेता को विधानसभा का एक टिकट दे रही है तो उसे लेकर हड़बड़ाने की ऐसी जरूरत कांगे्रस को नहीं होनी चाहिए थी जिससे कि उसकी साख भी कम होती है और कांगे्रस अध्यक्ष के जन्म के देश को लेकर एक अप्रिय चर्चा का मौका भी बहुत लोगों को मिलता है जिनके मन में यह बात फांस की तरह लगी रहती है कि इतने बड़े देश में कांगे्रस को अध्यक्ष बनाने के लिए और प्रधानमंत्री बनाने के लिए कोई दूसरा हिन्दुस्तानी नहीं मिला था क्या? 
सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी के लिए राहुल गांधी को या किसी और को गैरजरूरी बातें, नाजायज बातें नहीं करनी चाहिए। उमा भारती से हमें इतने संतुलित जवाबी बयान की उम्मीद नहीं थी जिसमें उन्होंने राहुल को मां और बुआ की भाषा में नसीहत दी है। उमा भारती की साख एक अधिक आग उगलने वाली रही है और यह मौका तो उसके लायक भी था, फिर भी उन्होंने समझदारी की बात कही है। और यह एक दिलचस्प बात है कि मध्यप्रदेश के चुनावी मैदान में दस बरस के दिग्विजय-राज के बाद जब कांगे्रस को भाजपा ने परास्त किया था, तब भी उमा भारती भाजपा की तरफ से अगुवा थीं, और अब उत्तरप्रदेश में भी ये दोनों नेता चुनावी मोर्चों पर जगह-जगह टकराते रहेंगे। 
राहुल गांधी ने उमा भारती से यह सवाल भी किया कि जब बुंदेलखंड रो रहा था तब वे कहां थीं? यह सवाल राजनीतिक रूप से जायज है, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लोकसभा क्षेत्रों में केंद्र सरकार की योजनाओं में भयानक भ्रष्टाचार चल रहा था, तब एक सांसद के रूप में वे लोग कहां थे? मायावती की सरकार तो बहुत बुरी तरह भ्रष्ट साबित हो ही चुकी है और दो दर्जन मंत्रियों की बर्खास्तगी, बहुतों की गिरफ्तारी, बहुत से कटघरों में, इस बात को पूरी तरह साबित करते ही हैं, लेकिन अपने लोकसभा क्षेत्र के लिए अगर सांसद के इतने ताकतवर और सक्षम होते हुए भी अगर वहां भयानक भ्रष्टाचार चल रहा है तो फिर हमें यह समझ नहीं आता कि गांधी परिवार के बहुत भरोसमंद कैप्टन सतीश शर्मा जैसे लोग सोनिया-राहुल के सीटों पर काम किस तरह देख रहे थे? हमें पिछले बरसों में सोनिया और राहुल के अपनी सीटों को लेकर की गई ऐसी किसी शिकायत की जानकारी नहीं है जिसमें उन्होंने वहां पर लगातार चल रहे भारी भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया हो। 
यह बात ठीक है कि मायावती हों या कि कोई और, लंबा राज करने वालों का एक ताकतवर और भरोसेमंद विकल्प अगर सामने नहीं रहता तो ऐसे लोग बददिमाग हो जाने का खतरा भी रखते हैं। लेकिन उत्तरप्रदेश जैसे चौतरफा चुनाव में कांगे्रस पार्टी सिर्फ राहुल के भाषणों से चुनाव नहीं जीत सकती। अगर कांगे्रस पार्टी के उत्तरप्रदेश के नेता इतने पिछले बरसों में माया राज का भ्रष्टाचार बयानों से परे भी उजागर करते होते, तो एक-एक गांव-कस्बे तक कांगे्रस की साख बनती और उसकी चुनावी संभावनाएं भी। लेकिन इस चर्चा के बीच आज हमें एक फिक्र यह होती है कि कांगे्रस का भविष्य, और यूपीए के तिबारा आने पर इस देश का भविष्य जो बनने जा रहा है वह आज चालीस की उम्र में एक नौसिखिए की तरह राजनीतिक बयान देता है और शायद उसकी परिपक्वता की कद-काठी भी वैसी ही है। उमा भारती पर बयान के लिए राहुल गांधी ने जो तर्क ढूंढा है, वह आत्मघाती अधिक है।



महिला के हक में सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला


19 जनवरी 2012
संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला देश की महिलाओं के हक में आया है। एक आदिवासी महिला और गैरआदिवासी पति की संतान को मां की वजह से अदालत ने आदिवासी माना है। इस ऐतिहासिक फैसले में भारत की सबसे बड़ी अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के एक फैसले को खारिज कर दिया जिसमें ऐसे बच्चे को आदिवासी का दर्जा देने से मना कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस बच्चे की तरफ से खड़े हुए वकील के इस तर्क को माना है कि अगर ऐसे बच्चे को आदिवासी समुदाय में ही बड़ा किया गया है और उस बच्चे ने वे तमाम तकलीफें झेली हैं जो कि एक आदिवासी बच्चा झेलता है, तो उसे ऐसा दर्जा देना ही चाहिए।
हम इस मामले की बहुत बारीकियों पर नहीं जाते, और अपनी बात को यहीं तक सीमित रखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ते हुए अंतरजातीय विवाहों का जिक्र करते हुए यह राय दी है कि महिला के आदिवासी होने पर उसके गैरआदिवासी किसी दूसरी जाति के हिंदू से शादी होने पर यह सोचने की जरूरत है कि हिंदू कानून को लागू करना कितना ठीक होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा-ऐसी महिला को शादी के बाद हिंदू मान लेना कहां से ठीक होगा जबकि ऐसी शादी अपने-आपमें हिंदू रिवाजों वाले कानून के ठीक खिलाफ रहती है। हालांकि इसके साथ-साथ अदालत ने यह भी कहा है कि उसका यह निष्कर्ष हर मामले के लिए नहीं है और बच्चे को यह साबित करना होगा कि उसका पालन दलित / आदिवासी मां द्वारा हुआ है और ऐसे मामले में पिता के उच्च वर्ण के होने पर भी उसे पिता के तबके के हक नहीं मिलते हैं।
हम इस फैसले में दो बातों को देख रहे हैं, पहली तो यह कि सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासी समुदाय से जुड़े इस मामले में हिंदू धर्म का जिक्र करते हुए यह बहुत साफ किया है कि हिंदू और आदिवासी समुदाय अलग-अलग हैं। बल्कि अदालत ने आदिवासी और हिंदू की शादी को हिंदू रिवाजों के ठीक खिलाफ करार देकर बहुत साफ-साफ तरीके से हिंदू समाज के मुकाबले आदिवासी समाज को एक वंचित और दबा-कुचला समाज माना है। भारत में हिंदू समाज के एक आक्रामक तबके द्वारा तरह-तरह से आदिवासियों को हिंदू साबित करने की जो कोशिश चलती रहती है, सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश इस कोशिश के तर्क को पूरी तरह खारिज भी कर देता है, जबकि यह मामला इस तर्क पर केंद्रित नहीं है। दूसरी तरफ एक महिला के हकों को यह आदेश बड़े दम-खम के साथ स्थापित करता है और जिस तरह समाज किसी बच्चे के सिलसिले में बाप को ही सब कुछ मान लेता है, और मां की कोई हस्ती ही नहीं गिनी जाती, उस सिलसिले को सुप्रीम कोर्ट ने बदलकर रख दिया है और हम इसे भारत में महिला, और मां के दर्जे की हिमायत में एक बहुत अहमियत का फैसला मानते हैं।
कायदे की बात तो यह है कि इस देश की संसद को, संसद के बाहर राजनीतिक दलों को खुद होकर ऐसा फैसला लेना चाहिए था और जरूरत होती तो उसके लिए संविधान में एक संशोधन करना चाहिए था। हमारे नियमित पाठकों ने यह देखा होगा कि हम महिला के बराबरी के दर्जे के लिए, उसके हकों की हिफाजत के लिए लगातार लिखते हैं और हम यह भी उम्मीद करते हैं कि अदालत तक जाने में जो लोग ताकत रखते हैं, उन्हें भारत सरकार और भारत के प्रधानमंत्री की भाषा के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर करनी चाहिए, कि लालकिले से दिए गए भाषण में अगर प्रधानमंत्री दर्जन भर बार 'आम आदमीÓ कहते हैं तो यह आम औरत के हकों को कुचलना है, उसकी मौजूदगी को ही अनदेखा करना है। इस तरह के भाषा के कदम-कदम के अन्याय के खिलाफ हम बार-बार लिखते हैं, लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि महिलाओं की अगुवाई वाली देश की पार्टियां, महिला नेता, वामपंथियों जैसे सिद्धांतवादी लोग, इनमें से किसी को भी आम आदमी को ही इंसान गिन लेने वाली भाषा में बुराई नहीं दिखती। लेकिन कानून की हमारी समझ यह कहती है कि अगर सुप्रीम कोर्ट में कोई इस भाषा के खिलाफ जाएगा तो वहां भी महिला के पक्ष में ऐसा ही फैसला आएगा जैसा कि अभी एक आदिवासी मां की संतान के पक्ष में आया है।
देश में जो राजनीतिक चेतना संपन्न तबके हैं, उनको यह समझने की जरूरत है कि बेइंसाफी को देखते हुए भी चुप रहकर वे अपने-आपको इतिहास में जागरूक दर्ज नहीं करवा पाएंगे। देश के न सिर्फ महिला संगठनों को, बल्कि बाकी जिम्मेदार लोगों को भी सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद महिलाओं के हक के बाकी पहलुओं पर भी कोशिश करनी चाहिए।

सरकार और फौजी मुखिया में टकराव


संपादकीय
18 जनवरी 2012

दक्षिण एशिया के दो अहम देशों में फौज और सरकार अलग अलग वजहों से टकराव  की स्थिति में है, लेकिन दोनों देशों के हालात एक-दूसरे से एकदम अलग हंै, और दोनों देशों की फौजों और सरकारों की विवादों में भूमिकाएं भी अलग-अलग हंै। पाकिस्तान में प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली सरकार को इस बात पर ऐतराज है कि फौज ने एक हो सकने वाले सत्ता पलट के बारे में उसे परे रखकर सीधे सर्वोच्च न्यायालय से बात की। जबकि अब तक जनता की चुनी हुई सरकार को लाचार और कमजोर समझने, और उससे वैसे ही बरतने वाली फौज और आईएसआई, सरकार के ऐतरज़ जताने की हिम्मत पर भौंचक्की है। दूसरी ओर भारत में पेंशन, आधुनिकीकरण जैसे बहुत से मुद्दों पर सरकार की उपेक्षा की शिकार थल सेना आज तक अनुशासित बनी रही है। देश के इतिहास में पहली बार सेना प्रमुख ने सरकार को अदालत में घसीटा है, यह एक अभूतपूर्व और अवांछनीय घटना है, इसमें दो मत नहीं हो सकते। इस मुद्दे पर सेना अध्यक्ष के पास जहां कहने को अपने तर्क है, वहीं सरकार के पास भी कहने को अपनी बात है। किसका पक्ष ज्यादा भारी है, यह बात अदालत तय करेगी। विपक्षी दल इस मुद्दे पर अपनी आदत और मजबूरी के मुताबिक सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हंै इस मामले में गलती चाहे जिसकी भी साबित हो, खामियाजा इस देश में सरकार और फौज के आपसी संबंधों को भुगतना होगा, इसमें शक नहीं। क्या  देश को इस स्थिति में डालना जरूरी था?
जनरल वी के सिंह ने रक्षा मंत्री को लिखे अपने पत्र में कहा है कि सेना पूर्व सैनिकों के संगठनों ने अदालत में जो जनहित याचिका दायर की है, उसकी सुनवाई के पहले वह अदालत जाने पर मजबूर थे। इस याचिका के कारण उनकी पैदाईश के साल के बारे में उन पर सरकार, और फौज को गलत जानकारी देने का इल्जाम लग सकता था। अखबार और जानकार  सूत्र बताते हंै कि इस जनहित याचिका  के मद्देनजर सरकार, और जनरल सिंह में एक समझौते की बात चल रही थी कि सरकार उनके द्वारा बताई जा रही जन्म तारीख को सही करार दे दे, और जनरल सिन्ह इस्तीफा देकर अपने बाद आने वाले सेना प्रमुख के लिए जगह खाली कर दें।  लेकिन जनरल सिंह ने यह खत लिखकर रक्षा मंत्री को यह जता दिया है कि सरकार के समय पर फैसला ना लेने के कारण वह अदालत जाने पर मजबूर हो गए। उन्होंने दो दिन पहले ही पत्रवार्ता में भी कहा कि जन्म की तिथि गलत बातने का मसला उनकी निष्ठा और सम्मान से जुड़ा है, जो किसी भी फौजी के लिए बहुत अहम है, शायद सबसे ज्यादा अहम है। फौज के संगठन में, उसके फर्ज की जरूरतों को देखते हुए सामान्य लचीले नागरिक मूल्यों से अलग  मूल्यों को बढ़ावा दिया जाता है। शायद 11 लाख की फौज के मुखिया को अपनी निष्ठा और सम्मान अपनी फौज से जुड़ा लगता हो, उसके नैतिक बल का सवाल लगता हो, लेकिन आखिर फौज होती किसलिए है? देश के सम्मान की हिफाज़त के लिए ही ना। सवाल यह उठता है कि अपनी बात साबित करने के लिए क्या जनरल सिंह के पास यही एक रास्ता बचा था? क्या उन्होंने उन गम्भीर नतीजों और खतरों पर गौर किया, जो फौज के मुखिया के सरकार को अदालत में घसीटने  के कारण सामने आ सकते हैं? देश में इस पर बहुत बहस हो रही है। ज्यादातर रिटायर और फर्ज बजा रहे फौजी जनरल सिंह के  साथ हंै, तो देश का एक तबका उनके खिलाफ भी है, लेकिन सरकार के साथ कोई भी नहीं। क्योंकि रक्षा मंत्रालय में जब पहली बार जनरल सिंह के पैदाईश के साल के बारे में गड़बड़ की बात सामने आई, तब से आज तक उन्होंने कई बार इसे ठीक करवाने की गुजारिश की, लेकिन जाहिर था कि सरकार ने इस मसले पर तब फैसला लेने की बजाए इसे लटकाए रखा। बताया जाता है कि जनरल सिंह के पहले के दो सेनाध्यक्ष, उनके बाद जिन जनरल बिक्रम बीर का नाम सेनाअध्यक्ष के रूप में लिया जा रहा है उनकी खातिर जनरल सिंह की पैदाईश का साल 1950 ही रखना चाहते थे, इसलिए जनरल सिंह की कोशिशें नाकाम कर दी गर्इं। जनरल सिंह द्वारा पेश किए गए तमाम सुबूतों के बावजूद सरकार ने इस मसले को जानबूझकर लटकाया, या अपनी लापरवाही में, दूसरे तमाम मामलों में इस सरकार का रवैया देखकर यह कहना बहुत मुश्किल नहीं है। हम पहले भी देख चुके हंै कि यह सरकार अहम मुद्दों पर टकराव टालने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं करती, चाहे 2 जी पर जेपीसी  बनाने का मुद्दा हो, या अन्ना हजारे का मुद्दा, इसने  टकराव  के हालात पैदा किए, और देश का माहौल और संसाधन बर्बाद किए। आज जितनी जिम्मेदारी जनरल सिंह की यह देखने की है कि देश में गलत परम्परा न बने, उससे ज्यादा जिम्मेदारी सरकार की है। अगर थल सेनाअध्यक्ष के इस कदम से आगे चलकर फौज के अनुशासन पर इसका असर पडऩे का डर है, तो इतना ही डर सरकार और नौकरशाहों की फौज में दखलंदाजी, और फौज को अपने जूते तले दबाए रखने की कोशिश करने का भी है। यह कांग्रेस की ही सरकार थी, जिसने इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते देश के इतिहास में पहली बार फौज में ले. जन. एस के सिंहा की वरिष्ठता के बावजूद  उनके मातहत ले. जन. ए एस वैद्य को थल सेनाध्यक्ष बनाया था।
इतने बड़े और अहम संग्ठन के मुखिया के साथ संवाद  ठीक नहीं रख पाने की सरकार की नाकामी के कारण ही आज यह हालात पैदा हुए कि जनरल सिंह या तो अपने ऊपर अपनी पैदाईश के साल के बारे में फौज को गलत जानकारी का दाग लिए रिटायर हो जाते, या अदालत जाते, और इस विवादास्पद मामले का फैसला अदालत करती। ऐसा होने पर  सरकार यह कहने की हालत में आ जाती कि ऐसा हम नहीं, अदालत ने कहा है। सियासी तौर पर देखने में यह चालाकी बहुत सूझ भरी लग सकती है कि सरकार ने एक विवाद से खुद को सफाई से उबार लिया, लेकिन फौज के मनोबल, और परंपराओं के खयाल से यह कितना सही है, यह गौर करने लायक है। जनरल सिंह का देश के हित में  रिटायर होना सही होता, या फौज के मनोबल और अपनी निष्ठा, सम्मान को बचाने के लिए लडऩा, इस बारे में बहस की गुंजाईश हो सकती है, लेकिन आज  सरकार में इस कारण जो दौड़भाग मची हुई है (या जिसका दिखावा किया जा रहा है), देश में जो बदमजगी फैल गई है, उसके लिए यकीनन सरकार दोषी है। अब सरकार चाहे जनरल सिंह से अदालत में निपटे, या अदालत के बाहर, अपने एक अफसर के हाथों मुंह की खाने की शर्मिंदगी से वह बच नहीं सकती। हम बहुत से लोगों की तरह इसे देश की इज्जत मटियामेट होना नहीं मानते बल्कि अंबिका सोनी की तरह यही कहना चाहते है कि देश में न्याय मांगने का हक सब को है। अगर हुआ, तो यह यूपीए सरकार की इज्जत का मटियामेट होगा, जिसमें समय रहते सही फैसले लेने की हिम्मत और नीयत, दोनों नहीं है। थल सेना जैसे बड़े संगठन के मुखिया रह चुकने के बाद भी, जनरल सिंह का अपने जन्म वर्ष का मुद्दा सुलझा नहीं पाना, फौज के प्रति सरकार और नौकरशाही के रवैये के बारे में बहुत कुछ कहता है, और इस  स्थिति के लिए जो किसी भी सूरत में  सही नहीं है, दस साल से देश पर राज कर रही यूपीए सरकार ही दोषी है।

अपराध का सामाजिक अंजाम


संपादकीय
17 जनवरी 2012
बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने पिछले दिनों राज्य के सज़ायाफ्ता अपराधियों और उनके अपराध का ब्यौरा इंटरनेट पर रखने की शुरुआत कर दी है। बिहार के गृह विभाग की वेबसाईट पर इससे संबंधित एक पेज में राज्य में सज़ा पाने वाले अपराधियों के नाम पते, उनके पिता का नाम, उनके अपराध और अदालत से मिली सजा के खिलाफ उनकी अपीलों के खारिज होने का ब्यौरा रखा जाएगा। यही नहीं, सजायाफ्ता लोग सरकारी ठेके और हथियारों के लाईसेंस नहीं पा सकेंगे। मुख्यमंत्री का कहना है कि अपराध करने का एक सामाजिक परिणाम होता है जो अपराधियों को भुगतना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि सज़ायाफ्ता लोगों के ब्यौरे  इंटरनेट पर रखने से दूसरों में कानून तोडऩे और जुर्म करने का  हौसला कम होगा। वह इसे बिहार को अपराध मुक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम  बता रहे हैं। पिछले साल बिहार की जनता को सेवा का अधिकार देने के बाद, इस साल नितीश कुमार ने अपराध कम करने के लिए यह कदम उठाकर एक बार फिर सुशासन के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जाहिर की है और इस मामले में देश के सामने एक मिसाल पेश की है। सज़ा मिलने तक  तो कानूनन किसी को गुनहगार माना भी नहीं जा सकता, और इस छूट का आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक  फायदा उठाए जाते हम अपने चारों तरफ देखते ही हैं,लेकिन मौजूदा सियासी चलन के मद्देनजर , एक राज्य के मुख्यमंत्री का अपने राज्य में, जुर्म करने वालों के हौसले पस्त करने के लिए ऐसा कड़ा कदम उठाना हिम्मत का काम है। नितीश कुमार की इस नई पहल से बिहार को रहने के लिए बेहतर जगह बनाने का काम आगे बढ़ा  है।
भारत में आपराधिक मामलों में सजा न मिल पाना अपराध बढऩे के बड़े कारणों में से एक बताया जाता है। आंकड़े बताते हंै कि आईपीसी की अलग-अलग धाराओं में सजा मिलने की दर लगातार घटी हैं, और ऐसे अपराधों में बढ़ोत्तरी हुई है। अभी ताजा मिसाल ओडिशा में पीपली बलात्कार मामले की है, जहां सामूहिक बलात्कार की घटना के एक आरोपी पर, ज़मानत पर बाहर आने के बाद घटना की गवाह के साथ बलात्कार करने का आरोप है। गंभीर अपराध के लिए पकड़े जाते लोगों के साथ बहुत से कारणों से सख्ती नहीं की जा सकती, अपराधियों के मानव अधिकार और कानूनी पेचीदिगियों की सीमाएं बहुत से मामलों में कानून पर अमल करने वाली एजेंसियों के हाथ  बांध देती हंै, और जुर्म को अनचाहे बढ़ावा  मिलता है। कमजोर तबकों जैसे दलित, महिलाओं और बच्चे, जो समाज में सबसे कमज़ोर स्थिति में हंै वह इसका सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। हाल ही में खबरों में गर्म भंवरी देवी का मामला इसकी मिसाल है, जिसमें रसूखदार नेताओं पर सहायक नर्स जैसी छोटी सरकारी कर्मी के अपहरण और हत्या के अरोप हैं। भारत में जुर्मों का लेखा जोखा रखने वाले क्राईम रिकार्ड ब्यूरो ने गौर करने पर पाया कि 1953 से 2006 के बीच देश में हत्या जैसे अपराधों ने 231 फीसदी, अपहरण के मामलों में 356 फीसदी और डकैती  के मामलों में 120 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। इन अपराधों में सजा  मिलने की दर दयनीय है। इसके लिए बहुत सी बातें जिम्मेदार हैं- स्थानीय जांच एजेंसियों में क्षमता, उन्हें अपराध की जांच के लिए मिलने वाली सुविधाओं, सहयोग का अभाव, उनके काम के मुश्किल हालात, जनता की लापरवाही, और अपराधियों का बचाव, लेकिन इन सबका खमियाजा भुगतने वाली जनता ही है। बिहार में एनडीए की सरकार बनने के पहले चुनव के दौरान हिंसा, बूथों पर कब्जे जैसी घटनाएं आम हुआ करती थीं, वहां अपराधियों द्वारा तरह-तरह के जुर्म करने के लिए अपनी अपनी सेनाएं रखने के किस्से आम थे, जाहिर है ऐसा माहौल अपराधी को बेखौफ करने वाला, और जनता को सहमाने वाला था।
नितीश कुमार की इस पहल से हालात रातोंरात बदल जाएंगे, ऐसी उम्मीद हम नहीं करते ,लेकिन इतना तो तय है कि सरकार ने अपराधियों को यह इशारा कर दिया है कि आज तक जो राजनीतिज्ञ उन्हें अपनी आंख का तारा बनाए हुए थे, अब उनके ख्यालात बदल चुके हैं। यह कदम शोभा भर के लिए न बना रहे ,और जिस इरादे से उठाया गया है, उसको पूरा करने के लिए सरकार कमर कसे रहे, तो बात यहां से आगे बढ़ेगी। हम जानते हंै कि बिहार में इंटरनेट पर सजायाफ्ता लोगों के नाम पढऩे वाले बहुत कम होंगे, लेकिन सरकार ने उसे  उपलब्ध एक माध्यम से समाज के गुनाहगारों को उनकी जगह जताने की हिम्म्त बताई है। आज जब भ्रष्टाचार, महंगाई से लोगों ने असंतोष फैला हुआ है। सरकार के ऐसे कदम से जनता में इस बात के लिए धीरज बंधेगा कि अपराधी की हौसला आफज़ाई तो कम से कम नहीं की जा रही है।
नितीश कुमार ने यह भी कहा है कि इंटरनेट पर इस तरह का रिकार्ड रखने से सजायाफ्ता लोगों को सरकारी ठेके हासिल करने से रोका जा सकेगा। सरकारी ठेके हथियाने के लिए माफिया खड़े करने के मामले में आज तक बदनाम बिहार में यह  सोच और कदम तारीफ के काबिल है। जब रजनीति अपराध को सहारा देना बंद कर देगी तो  उसका  आधा  हौसला अपने आप पस्त हो जाएगा। ऐसा फैसला वही नेतृत्व कर सकता है, जिसे अपने जनाधार पर भरोसा हो, और जिसकी नीयात में किसी भी तरह से सत्ता पर काबिज बने रहने की खोट ना हो। आज जब गंभीर अपराधों के लिए कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे  मुजरिमों की सजा पर, देश की बड़ी राजनीतिक  पार्टियां एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रही हंै, नितीश कुमार ने बिना किसी शोरशराबे यह कदम उठाकर अपराध करने वालों को एक सख्त संदेश  दे दिया है। यह फैसला अपराध के  सामाजिक पहलू से जुड़ी कार्रवाई है, जो अपनी मंजिल तभी पा  सकेगी जब न्यायिक ,  प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर आने वाली रुकावटें दूर की जा सके।