23 जनवरी 2012
संपादकीय
केंद्र सरकार की खबर है कि वह अगले पांच बरस में देश में 85 हजार बसों को सार्वजनिक परिवहन के लिए बढ़ाने की योजना बना रही है। खुद सरकार के आंकड़े बताते हैं कि किस तरह पिछले बरसों में लगातार देश के कुल वाहनों में सार्वजनिक बसों का अनुपात घटते चले गया है और लोग इस कमी की वजह से निजी गाडिय़ों पर चलने के लिए मजबूर हो जाते हैं। एक बार जब कोई अपनी गाड़ी पर चलने लगता है तो फिर उसका सार्वजनिक परिवहन पर लौटना कुछ मुश्किल होता है।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि सार्वजनिक परिवहन के महत्व को बताते हुए हम लगातार लिखते हैं। छत्तीसगढ़ इस बात की मिसाल है कि किस तरह बसों के चलने से वे एकदम से लबालब रहती हैं और लोगों को इससे बड़ी सहूलियत भी मिलती है। रायपुर में आधी सदी पहले चलने वाली सिटी बसें बीच के कुछ दशक पूरी तरह बंद रहीं, लेकिन अब जब इनको शुरू किया गया तो लोग इन पर टूट पड़े। आज इन बसों को कई गुना बढ़ाने की मांग हो रही है। राजधानी दिल्ली का अनुभव है कि जब भूमिगत ट्रेन, मैट्रो शुरू हुई तो सड़कों से भीड़ कम हुई और लोग राजधानी के लंबे-चौड़े इलाके, एनसीआर, में दूर तक जाने के लिए अपनी कार छोड़कर मैट्रो को पसंद करने लगे क्योंकि सस्ती होने के साथ-साथ उसमें समय भी बचने लगा। एक-एक करके देश के महानगरों में मैट्रो की मांग होने लगी है और पूरी दुनिया यह बताती है कि सार्वजनिक परिवहन ही सड़कों से गाडिय़ों को कम करने का अकेला इलाज है।
भारत का शहरी और संपन्न जीवन अमरीकापरस्त चले आ रहा है। यहां पर लोगों की गाडिय़ांं निजी जरूरतों के मुकाबले अधिक बड़ी भी होती जा रही हैं और जहां पर गाड़ी के बिना काम चल सकता है, वहां भी लोग गाडिय़ों पर आश्रित हो चुके हैं। यह सिलसिला आटोमोबाईल कंपनियों, पेट्रोलियम कंपनियों और इनसे जुड़े दूसरे कारखानों-कारोबारों को ठीक लगता है। ऐसी ही नौबत को और अधिक बाजारू बनाने के लिए एक वक्त अमरीका ने फोर्ड जैसी निजी कार कंपनी ने सार्वजनिक यातायात की ट्राम गाडिय़ां खरीद ली थीं और उन्हें कबाड़ में फेंककर लोगों को निजी कार रखने के लिए मजबूर कर दिया था। यह सिलसिला खतरनाक है और इसे जो लोग अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ समझते हैं, वे एक ऐसी पूंजीवादी व्यवस्था को बढ़ावा देना चाहते हैं जिनमें लोग कर्ज ले-लेकर महंगी जिंदगी जीने को मजबूर हो जाएं। पूंजीवाद में अफ्रीका के देशों तक यह हालत कर दी है कि फटेहाल लोगों को अगर अस्पताल तक भी जाना है तो भी उन्हें निजी गाडिय़ों पर निर्भर रहना होता है।
केंद्र सरकार की यह पहल जरूरत को कितना पूरा करेगी यह अंदाज लगाना हमारे लिए मुश्किल है। लेकिन अगर जरूरत हो तो कारों पर एक ऐसा टैक्स लगाना चाहिए जिसे सीधा-सीधा सार्वजनिक बसों पर खर्च किया जाए। इससे एक तरफ तो कार खरीदना कुछ भारी पड़ेगा, और दूसरी तरफ बसें बढ़ती चली जाएंगी। बसों में चलने वाले लोग सीधे-सीधे कार वाले तो नहीं होते, लेकिन बस और कार के बीच की इतनी बड़ी आबादी दुपहिए गाडिय़ों पर चलने वालों की है कि उनको सार्वजनिक बस-ट्रेन से फायदा भी होगा और वे अपनी मौजूदा गाडिय़ों का कम इस्तेमाल करेंगे, कारों की तरफ बढऩे का नहीं सोचेंगे। इसके साथ-साथ जो कारें आज सड़कों पर आ चुकी हैं, उनका भी इस्तेमाल कम होते जाएगा और सड़कों पर से भीड़ घटेगी। लोगों के घरों में आज कारें चाहे खड़ी रहें, ऐसे लोग भी अगर बस और ट्रेन से चलने में समय और पैसों का फायदा देखेंगे तो वह अच्छा है। सरकार को पहले लोकल ट्रेन और बस का ऐसा जाल फैलाना होगा कि वह निजी गाडिय़ों का एक कामयाब विकल्प बन सके।
आज देश में राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास के नाम पर जितने बड़े-बड़े सरकारी निर्माण होते दिख रहे हैं, या जनता पर टैक्स लगाने का ठेका देकर जो निजी सड़क-पुल बनवाए जा रहे हैं, वे सबके-सब अधिक गाडिय़ों को बढ़ावा देने के हिसाब से किए गए हैं। अगर शहरों और गांवों के बीच, बड़े शहरों के बीच, अलग-अलग आयवर्ग की जरूरत के हिसाब से सस्ती और महंगी सार्वजनिक परिवहन सेवा स्थापित होती है, तो उससे भी आयातित र्इंधन, पर्यावरण, देश की उत्पादकता और लोगों के निजी जीवन सबको फायदा पहुंचेगा।









