संपादकीय
18 जनवरी 2012

दक्षिण एशिया के दो अहम देशों में फौज और सरकार अलग अलग वजहों से टकराव की स्थिति में है, लेकिन दोनों देशों के हालात एक-दूसरे से एकदम अलग हंै, और दोनों देशों की फौजों और सरकारों की विवादों में भूमिकाएं भी अलग-अलग हंै। पाकिस्तान में प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली सरकार को इस बात पर ऐतराज है कि फौज ने एक हो सकने वाले सत्ता पलट के बारे में उसे परे रखकर सीधे सर्वोच्च न्यायालय से बात की। जबकि अब तक जनता की चुनी हुई सरकार को लाचार और कमजोर समझने, और उससे वैसे ही बरतने वाली फौज और आईएसआई, सरकार के ऐतरज़ जताने की हिम्मत पर भौंचक्की है। दूसरी ओर भारत में पेंशन, आधुनिकीकरण जैसे बहुत से मुद्दों पर सरकार की उपेक्षा की शिकार थल सेना आज तक अनुशासित बनी रही है। देश के इतिहास में पहली बार सेना प्रमुख ने सरकार को अदालत में घसीटा है, यह एक अभूतपूर्व और अवांछनीय घटना है, इसमें दो मत नहीं हो सकते। इस मुद्दे पर सेना अध्यक्ष के पास जहां कहने को अपने तर्क है, वहीं सरकार के पास भी कहने को अपनी बात है। किसका पक्ष ज्यादा भारी है, यह बात अदालत तय करेगी। विपक्षी दल इस मुद्दे पर अपनी आदत और मजबूरी के मुताबिक सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हंै इस मामले में गलती चाहे जिसकी भी साबित हो, खामियाजा इस देश में सरकार और फौज के आपसी संबंधों को भुगतना होगा, इसमें शक नहीं। क्या देश को इस स्थिति में डालना जरूरी था?
जनरल वी के सिंह ने रक्षा मंत्री को लिखे अपने पत्र में कहा है कि सेना पूर्व सैनिकों के संगठनों ने अदालत में जो जनहित याचिका दायर की है, उसकी सुनवाई के पहले वह अदालत जाने पर मजबूर थे। इस याचिका के कारण उनकी पैदाईश के साल के बारे में उन पर सरकार, और फौज को गलत जानकारी देने का इल्जाम लग सकता था। अखबार और जानकार सूत्र बताते हंै कि इस जनहित याचिका के मद्देनजर सरकार, और जनरल सिंह में एक समझौते की बात चल रही थी कि सरकार उनके द्वारा बताई जा रही जन्म तारीख को सही करार दे दे, और जनरल सिन्ह इस्तीफा देकर अपने बाद आने वाले सेना प्रमुख के लिए जगह खाली कर दें। लेकिन जनरल सिंह ने यह खत लिखकर रक्षा मंत्री को यह जता दिया है कि सरकार के समय पर फैसला ना लेने के कारण वह अदालत जाने पर मजबूर हो गए। उन्होंने दो दिन पहले ही पत्रवार्ता में भी कहा कि जन्म की तिथि गलत बातने का मसला उनकी निष्ठा और सम्मान से जुड़ा है, जो किसी भी फौजी के लिए बहुत अहम है, शायद सबसे ज्यादा अहम है। फौज के संगठन में, उसके फर्ज की जरूरतों को देखते हुए सामान्य लचीले नागरिक मूल्यों से अलग मूल्यों को बढ़ावा दिया जाता है। शायद 11 लाख की फौज के मुखिया को अपनी निष्ठा और सम्मान अपनी फौज से जुड़ा लगता हो, उसके नैतिक बल का सवाल लगता हो, लेकिन आखिर फौज होती किसलिए है? देश के सम्मान की हिफाज़त के लिए ही ना। सवाल यह उठता है कि अपनी बात साबित करने के लिए क्या जनरल सिंह के पास यही एक रास्ता बचा था? क्या उन्होंने उन गम्भीर नतीजों और खतरों पर गौर किया, जो फौज के मुखिया के सरकार को अदालत में घसीटने के कारण सामने आ सकते हैं? देश में इस पर बहुत बहस हो रही है। ज्यादातर रिटायर और फर्ज बजा रहे फौजी जनरल सिंह के साथ हंै, तो देश का एक तबका उनके खिलाफ भी है, लेकिन सरकार के साथ कोई भी नहीं। क्योंकि रक्षा मंत्रालय में जब पहली बार जनरल सिंह के पैदाईश के साल के बारे में गड़बड़ की बात सामने आई, तब से आज तक उन्होंने कई बार इसे ठीक करवाने की गुजारिश की, लेकिन जाहिर था कि सरकार ने इस मसले पर तब फैसला लेने की बजाए इसे लटकाए रखा। बताया जाता है कि जनरल सिंह के पहले के दो सेनाध्यक्ष, उनके बाद जिन जनरल बिक्रम बीर का नाम सेनाअध्यक्ष के रूप में लिया जा रहा है उनकी खातिर जनरल सिंह की पैदाईश का साल 1950 ही रखना चाहते थे, इसलिए जनरल सिंह की कोशिशें नाकाम कर दी गर्इं। जनरल सिंह द्वारा पेश किए गए तमाम सुबूतों के बावजूद सरकार ने इस मसले को जानबूझकर लटकाया, या अपनी लापरवाही में, दूसरे तमाम मामलों में इस सरकार का रवैया देखकर यह कहना बहुत मुश्किल नहीं है। हम पहले भी देख चुके हंै कि यह सरकार अहम मुद्दों पर टकराव टालने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं करती, चाहे 2 जी पर जेपीसी बनाने का मुद्दा हो, या अन्ना हजारे का मुद्दा, इसने टकराव के हालात पैदा किए, और देश का माहौल और संसाधन बर्बाद किए। आज जितनी जिम्मेदारी जनरल सिंह की यह देखने की है कि देश में गलत परम्परा न बने, उससे ज्यादा जिम्मेदारी सरकार की है। अगर थल सेनाअध्यक्ष के इस कदम से आगे चलकर फौज के अनुशासन पर इसका असर पडऩे का डर है, तो इतना ही डर सरकार और नौकरशाहों की फौज में दखलंदाजी, और फौज को अपने जूते तले दबाए रखने की कोशिश करने का भी है। यह कांग्रेस की ही सरकार थी, जिसने इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते देश के इतिहास में पहली बार फौज में ले. जन. एस के सिंहा की वरिष्ठता के बावजूद उनके मातहत ले. जन. ए एस वैद्य को थल सेनाध्यक्ष बनाया था।
इतने बड़े और अहम संग्ठन के मुखिया के साथ संवाद ठीक नहीं रख पाने की सरकार की नाकामी के कारण ही आज यह हालात पैदा हुए कि जनरल सिंह या तो अपने ऊपर अपनी पैदाईश के साल के बारे में फौज को गलत जानकारी का दाग लिए रिटायर हो जाते, या अदालत जाते, और इस विवादास्पद मामले का फैसला अदालत करती। ऐसा होने पर सरकार यह कहने की हालत में आ जाती कि ऐसा हम नहीं, अदालत ने कहा है। सियासी तौर पर देखने में यह चालाकी बहुत सूझ भरी लग सकती है कि सरकार ने एक विवाद से खुद को सफाई से उबार लिया, लेकिन फौज के मनोबल, और परंपराओं के खयाल से यह कितना सही है, यह गौर करने लायक है। जनरल सिंह का देश के हित में रिटायर होना सही होता, या फौज के मनोबल और अपनी निष्ठा, सम्मान को बचाने के लिए लडऩा, इस बारे में बहस की गुंजाईश हो सकती है, लेकिन आज सरकार में इस कारण जो दौड़भाग मची हुई है (या जिसका दिखावा किया जा रहा है), देश में जो बदमजगी फैल गई है, उसके लिए यकीनन सरकार दोषी है। अब सरकार चाहे जनरल सिंह से अदालत में निपटे, या अदालत के बाहर, अपने एक अफसर के हाथों मुंह की खाने की शर्मिंदगी से वह बच नहीं सकती। हम बहुत से लोगों की तरह इसे देश की इज्जत मटियामेट होना नहीं मानते बल्कि अंबिका सोनी की तरह यही कहना चाहते है कि देश में न्याय मांगने का हक सब को है। अगर हुआ, तो यह यूपीए सरकार की इज्जत का मटियामेट होगा, जिसमें समय रहते सही फैसले लेने की हिम्मत और नीयत, दोनों नहीं है। थल सेना जैसे बड़े संगठन के मुखिया रह चुकने के बाद भी, जनरल सिंह का अपने जन्म वर्ष का मुद्दा सुलझा नहीं पाना, फौज के प्रति सरकार और नौकरशाही के रवैये के बारे में बहुत कुछ कहता है, और इस स्थिति के लिए जो किसी भी सूरत में सही नहीं है, दस साल से देश पर राज कर रही यूपीए सरकार ही दोषी है।
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