दर्जनों हत्याओं से जुड़े रहे हत्यारे की किताब, विमोचन


22 जनवरी 2012
संपादकीय

जयपुर में चल रहे नामीगिरामी लोगों के साहित्य सम्मेलन से सलमान रूश्दी को लेकर जितनी बड़ी खबर नहीं उठ पाई, उससे कहीं अधिक बड़ी खबर दिल्ली से उठी है कि एक प्रमुख प्रकाशक ने बिहार के एक कुख्यात हत्यारे की एक किताब छापी है जिसका विमोचन देश के एक विख्यात आलोचक नामवर सिंह करने जा रहे हैं। यह खबर कई मायनों में भयानक है। आनंद मोहन सिंह नाम का यह हत्यारा एक कलेक्टर के कत्ल में उम्रकैद काट रहा है और इससे परे वह दो दर्जन से अधिक हत्याओं के मामले में सुबूत न मिलने पर छूट चुका है। उत्तर भारत की राजनीति में ऐसे अपराधियों का दखल आज वैसे भी पूरे देश में फिक्र की वजह बना हुआ है, लेकिन उससे बड़ी फिक्र यह है कि एक प्रतिष्ठित प्रकाशक बिना पहले की किसी साहित्यिक साख के ऐसे हत्यारे की किताब को छाप रहा है और देश में हिन्दी के सबसे बड़े आलोचकों में से एक, अपने वामपंथी रूझान के बाद भी इसका विमोचन करने जा रहा है। नामवर सिंह प्रगतिशील लेखक संघ नाम के संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं, और शायद अभी भी हैं। यह संगठन भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की विचारधारा से जुड़ा हुआ माना जाता है और आपातकाल का स्तुतिगान करने के लिए हमेशा से यह आलोचना का शिकार भी रहा है।
इस बारे में जब हमारे अखबार ने राजकमल प्रकाशन के प्रमुख से बात की तो उन्होंने एक अपराधी को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हकदार बताया। यह एक सनसनीखेज बाजारू और कारोबारी फैसला हो सकता है कि हिंदी में किताबों के गिरते ग्राहकों को फिर से दुकानों तक ले जाने के लिए कोई ऐसी किताब छापे और अपनी बाकी किताबों के लिए भी कुछ चर्चा पा ले। लेकिन जिस अपराधी का पुराना रिकॉर्ड ऐसे किसी साहित्य का न रहा हो, और जिसके नाम पर इतने बड़े-बड़े अपराधों की एक मील लंबी लिस्ट पुलिस से अदालत तक चली हुई हो, उसके लिखे हुए को छापना और उसका विमोचन करके उसे एक सम्मान देना, एक मान्यता देना, हमें कुछ हैरान करता है। क्या अपराधों से दूर रहना, उनका हौसला पस्त करना सिर्फ  राजनीति और नेताओं का काम होना चाहिए या फिर समाज के बाकी तबकों को भी अपने हक का इस्तेमाल करते हुए ऐसे कुछ फैसले लेने चाहिए जिनसे कि अच्छे और बुरे का फर्क लोगों के सामने साफ हो सके। राजकमल प्रकाशन इसके बाद अगर चाहे तो निठारी कांड के दर्जनों बच्चों के बलात्कारी, हत्यारे और इंसानखोर लोगों के अनुभव भी छाप सकता है, उनकी कहानियां छाप सकता है और देश के महापुरूषों के बारे में उसकी लिखी बातें भी पाठकों तक पहुंचा सकता है। लोकतांत्रिक हक सबको लिखने का, और सबको छापने का है, लेकिन सामाजिक जिम्मेदारी और सामान्य समझबूझ का इस्तेमाल किसी प्रकाशक और विमोचक को अच्छे और बुरे का फर्क बता सकता है। राजकमल प्रकाशन और नामवर सिंह, और अगर नामवर सिंह का संगठन इससे सहमत हो तो वह भी, देश की जेलों में बंद और भी बड़े-बड़े ऐसे अपराधियों का महिमामंडन कर सकते हैं जो किसी विचारधारा के न होकर सिर्फ भयानक अपराधी रहे हुए हैं। 

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