अपराध का सामाजिक अंजाम


संपादकीय
17 जनवरी 2012
बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने पिछले दिनों राज्य के सज़ायाफ्ता अपराधियों और उनके अपराध का ब्यौरा इंटरनेट पर रखने की शुरुआत कर दी है। बिहार के गृह विभाग की वेबसाईट पर इससे संबंधित एक पेज में राज्य में सज़ा पाने वाले अपराधियों के नाम पते, उनके पिता का नाम, उनके अपराध और अदालत से मिली सजा के खिलाफ उनकी अपीलों के खारिज होने का ब्यौरा रखा जाएगा। यही नहीं, सजायाफ्ता लोग सरकारी ठेके और हथियारों के लाईसेंस नहीं पा सकेंगे। मुख्यमंत्री का कहना है कि अपराध करने का एक सामाजिक परिणाम होता है जो अपराधियों को भुगतना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि सज़ायाफ्ता लोगों के ब्यौरे  इंटरनेट पर रखने से दूसरों में कानून तोडऩे और जुर्म करने का  हौसला कम होगा। वह इसे बिहार को अपराध मुक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम  बता रहे हैं। पिछले साल बिहार की जनता को सेवा का अधिकार देने के बाद, इस साल नितीश कुमार ने अपराध कम करने के लिए यह कदम उठाकर एक बार फिर सुशासन के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जाहिर की है और इस मामले में देश के सामने एक मिसाल पेश की है। सज़ा मिलने तक  तो कानूनन किसी को गुनहगार माना भी नहीं जा सकता, और इस छूट का आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक  फायदा उठाए जाते हम अपने चारों तरफ देखते ही हैं,लेकिन मौजूदा सियासी चलन के मद्देनजर , एक राज्य के मुख्यमंत्री का अपने राज्य में, जुर्म करने वालों के हौसले पस्त करने के लिए ऐसा कड़ा कदम उठाना हिम्मत का काम है। नितीश कुमार की इस नई पहल से बिहार को रहने के लिए बेहतर जगह बनाने का काम आगे बढ़ा  है।
भारत में आपराधिक मामलों में सजा न मिल पाना अपराध बढऩे के बड़े कारणों में से एक बताया जाता है। आंकड़े बताते हंै कि आईपीसी की अलग-अलग धाराओं में सजा मिलने की दर लगातार घटी हैं, और ऐसे अपराधों में बढ़ोत्तरी हुई है। अभी ताजा मिसाल ओडिशा में पीपली बलात्कार मामले की है, जहां सामूहिक बलात्कार की घटना के एक आरोपी पर, ज़मानत पर बाहर आने के बाद घटना की गवाह के साथ बलात्कार करने का आरोप है। गंभीर अपराध के लिए पकड़े जाते लोगों के साथ बहुत से कारणों से सख्ती नहीं की जा सकती, अपराधियों के मानव अधिकार और कानूनी पेचीदिगियों की सीमाएं बहुत से मामलों में कानून पर अमल करने वाली एजेंसियों के हाथ  बांध देती हंै, और जुर्म को अनचाहे बढ़ावा  मिलता है। कमजोर तबकों जैसे दलित, महिलाओं और बच्चे, जो समाज में सबसे कमज़ोर स्थिति में हंै वह इसका सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। हाल ही में खबरों में गर्म भंवरी देवी का मामला इसकी मिसाल है, जिसमें रसूखदार नेताओं पर सहायक नर्स जैसी छोटी सरकारी कर्मी के अपहरण और हत्या के अरोप हैं। भारत में जुर्मों का लेखा जोखा रखने वाले क्राईम रिकार्ड ब्यूरो ने गौर करने पर पाया कि 1953 से 2006 के बीच देश में हत्या जैसे अपराधों ने 231 फीसदी, अपहरण के मामलों में 356 फीसदी और डकैती  के मामलों में 120 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। इन अपराधों में सजा  मिलने की दर दयनीय है। इसके लिए बहुत सी बातें जिम्मेदार हैं- स्थानीय जांच एजेंसियों में क्षमता, उन्हें अपराध की जांच के लिए मिलने वाली सुविधाओं, सहयोग का अभाव, उनके काम के मुश्किल हालात, जनता की लापरवाही, और अपराधियों का बचाव, लेकिन इन सबका खमियाजा भुगतने वाली जनता ही है। बिहार में एनडीए की सरकार बनने के पहले चुनव के दौरान हिंसा, बूथों पर कब्जे जैसी घटनाएं आम हुआ करती थीं, वहां अपराधियों द्वारा तरह-तरह के जुर्म करने के लिए अपनी अपनी सेनाएं रखने के किस्से आम थे, जाहिर है ऐसा माहौल अपराधी को बेखौफ करने वाला, और जनता को सहमाने वाला था।
नितीश कुमार की इस पहल से हालात रातोंरात बदल जाएंगे, ऐसी उम्मीद हम नहीं करते ,लेकिन इतना तो तय है कि सरकार ने अपराधियों को यह इशारा कर दिया है कि आज तक जो राजनीतिज्ञ उन्हें अपनी आंख का तारा बनाए हुए थे, अब उनके ख्यालात बदल चुके हैं। यह कदम शोभा भर के लिए न बना रहे ,और जिस इरादे से उठाया गया है, उसको पूरा करने के लिए सरकार कमर कसे रहे, तो बात यहां से आगे बढ़ेगी। हम जानते हंै कि बिहार में इंटरनेट पर सजायाफ्ता लोगों के नाम पढऩे वाले बहुत कम होंगे, लेकिन सरकार ने उसे  उपलब्ध एक माध्यम से समाज के गुनाहगारों को उनकी जगह जताने की हिम्म्त बताई है। आज जब भ्रष्टाचार, महंगाई से लोगों ने असंतोष फैला हुआ है। सरकार के ऐसे कदम से जनता में इस बात के लिए धीरज बंधेगा कि अपराधी की हौसला आफज़ाई तो कम से कम नहीं की जा रही है।
नितीश कुमार ने यह भी कहा है कि इंटरनेट पर इस तरह का रिकार्ड रखने से सजायाफ्ता लोगों को सरकारी ठेके हासिल करने से रोका जा सकेगा। सरकारी ठेके हथियाने के लिए माफिया खड़े करने के मामले में आज तक बदनाम बिहार में यह  सोच और कदम तारीफ के काबिल है। जब रजनीति अपराध को सहारा देना बंद कर देगी तो  उसका  आधा  हौसला अपने आप पस्त हो जाएगा। ऐसा फैसला वही नेतृत्व कर सकता है, जिसे अपने जनाधार पर भरोसा हो, और जिसकी नीयात में किसी भी तरह से सत्ता पर काबिज बने रहने की खोट ना हो। आज जब गंभीर अपराधों के लिए कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे  मुजरिमों की सजा पर, देश की बड़ी राजनीतिक  पार्टियां एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रही हंै, नितीश कुमार ने बिना किसी शोरशराबे यह कदम उठाकर अपराध करने वालों को एक सख्त संदेश  दे दिया है। यह फैसला अपराध के  सामाजिक पहलू से जुड़ी कार्रवाई है, जो अपनी मंजिल तभी पा  सकेगी जब न्यायिक ,  प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर आने वाली रुकावटें दूर की जा सके।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें