राहुल का आत्मघाती बयान

संपादकीय
20 जनवरी
राहुल गांधी की नासमझी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। कल उनकी जगह  उनकी उम्र का कोई दूसरा ऐसा नेता होता जो कि रात-दिन सिर्फ राजनीति ही कर रहा है तो वे उत्तरप्रदेश के लिए उमा भारती को आयातित साबित करने की कोशिश नहीं करते। मध्यप्रदेश की सरहद से लगे हुए उत्तरप्रदेश के लिए उमा भारती अगर बाहरी कही जाएंगी, तो भारत की राजनीति के लिए सोनिया गांधी क्या कही जाएंगी? और तर्क के लिए हम कुछ और पीछे जाना चाहेंगे, एक कश्मीरी पंडित मोतीलाल नेहरू का उत्तरप्रदेश में क्या काम था? और फिर आज राहुल गांधी के गुरू बने हुए दिग्विजय सिंह का उत्तरप्रदेश की राजनीति में इतने दखल का क्या काम है? और छत्तीसगढ़ में ग्यारह लोकसभा सीटों में से सिर्फ एक पर कांगे्रस का सांसद होने पर भी यहां की गिनीचुनी राज्यसभा सीटों में से एक पर बार-बार एक खालिस बाहरी मोहसिना किदवई को थोपने का क्या तर्क है? ऐसी मिसालें कांगे्रस पार्टी के लिए अनगिनत गिनाई जा सकती हैं, मनमोहन सिंह का असम से क्या रिश्ता? अर्जुन सिंह का दक्षिण दिल्ली से क्या रिश्ता था? और अगर हम कुतर्क की हद तक जाएं, तो आज सोनिया और राहुल जैसे सितारों के रहते हुए कांगे्रस को उत्तरप्रदेश में प्रियंका गांधी की जरूरत क्यों पड़ रही है जो कि शायद न तो कांगे्रस में है, और यह तो जाहिर है कि वे राजनीति में नहीं हैं। भारत के संघीय ढांचे में केंद्र और राज्यों के बीच के रिश्ते, राज्यों के बीच के आपस के रिश्ते लचीले होने चाहिए। आज अगर भाजपा किसी दूसरे राज्य से अपने किसी नेता को विधानसभा का एक टिकट दे रही है तो उसे लेकर हड़बड़ाने की ऐसी जरूरत कांगे्रस को नहीं होनी चाहिए थी जिससे कि उसकी साख भी कम होती है और कांगे्रस अध्यक्ष के जन्म के देश को लेकर एक अप्रिय चर्चा का मौका भी बहुत लोगों को मिलता है जिनके मन में यह बात फांस की तरह लगी रहती है कि इतने बड़े देश में कांगे्रस को अध्यक्ष बनाने के लिए और प्रधानमंत्री बनाने के लिए कोई दूसरा हिन्दुस्तानी नहीं मिला था क्या? 
सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी के लिए राहुल गांधी को या किसी और को गैरजरूरी बातें, नाजायज बातें नहीं करनी चाहिए। उमा भारती से हमें इतने संतुलित जवाबी बयान की उम्मीद नहीं थी जिसमें उन्होंने राहुल को मां और बुआ की भाषा में नसीहत दी है। उमा भारती की साख एक अधिक आग उगलने वाली रही है और यह मौका तो उसके लायक भी था, फिर भी उन्होंने समझदारी की बात कही है। और यह एक दिलचस्प बात है कि मध्यप्रदेश के चुनावी मैदान में दस बरस के दिग्विजय-राज के बाद जब कांगे्रस को भाजपा ने परास्त किया था, तब भी उमा भारती भाजपा की तरफ से अगुवा थीं, और अब उत्तरप्रदेश में भी ये दोनों नेता चुनावी मोर्चों पर जगह-जगह टकराते रहेंगे। 
राहुल गांधी ने उमा भारती से यह सवाल भी किया कि जब बुंदेलखंड रो रहा था तब वे कहां थीं? यह सवाल राजनीतिक रूप से जायज है, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लोकसभा क्षेत्रों में केंद्र सरकार की योजनाओं में भयानक भ्रष्टाचार चल रहा था, तब एक सांसद के रूप में वे लोग कहां थे? मायावती की सरकार तो बहुत बुरी तरह भ्रष्ट साबित हो ही चुकी है और दो दर्जन मंत्रियों की बर्खास्तगी, बहुतों की गिरफ्तारी, बहुत से कटघरों में, इस बात को पूरी तरह साबित करते ही हैं, लेकिन अपने लोकसभा क्षेत्र के लिए अगर सांसद के इतने ताकतवर और सक्षम होते हुए भी अगर वहां भयानक भ्रष्टाचार चल रहा है तो फिर हमें यह समझ नहीं आता कि गांधी परिवार के बहुत भरोसमंद कैप्टन सतीश शर्मा जैसे लोग सोनिया-राहुल के सीटों पर काम किस तरह देख रहे थे? हमें पिछले बरसों में सोनिया और राहुल के अपनी सीटों को लेकर की गई ऐसी किसी शिकायत की जानकारी नहीं है जिसमें उन्होंने वहां पर लगातार चल रहे भारी भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया हो। 
यह बात ठीक है कि मायावती हों या कि कोई और, लंबा राज करने वालों का एक ताकतवर और भरोसेमंद विकल्प अगर सामने नहीं रहता तो ऐसे लोग बददिमाग हो जाने का खतरा भी रखते हैं। लेकिन उत्तरप्रदेश जैसे चौतरफा चुनाव में कांगे्रस पार्टी सिर्फ राहुल के भाषणों से चुनाव नहीं जीत सकती। अगर कांगे्रस पार्टी के उत्तरप्रदेश के नेता इतने पिछले बरसों में माया राज का भ्रष्टाचार बयानों से परे भी उजागर करते होते, तो एक-एक गांव-कस्बे तक कांगे्रस की साख बनती और उसकी चुनावी संभावनाएं भी। लेकिन इस चर्चा के बीच आज हमें एक फिक्र यह होती है कि कांगे्रस का भविष्य, और यूपीए के तिबारा आने पर इस देश का भविष्य जो बनने जा रहा है वह आज चालीस की उम्र में एक नौसिखिए की तरह राजनीतिक बयान देता है और शायद उसकी परिपक्वता की कद-काठी भी वैसी ही है। उमा भारती पर बयान के लिए राहुल गांधी ने जो तर्क ढूंढा है, वह आत्मघाती अधिक है।



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