महिला के हक में सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला


19 जनवरी 2012
संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला देश की महिलाओं के हक में आया है। एक आदिवासी महिला और गैरआदिवासी पति की संतान को मां की वजह से अदालत ने आदिवासी माना है। इस ऐतिहासिक फैसले में भारत की सबसे बड़ी अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के एक फैसले को खारिज कर दिया जिसमें ऐसे बच्चे को आदिवासी का दर्जा देने से मना कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस बच्चे की तरफ से खड़े हुए वकील के इस तर्क को माना है कि अगर ऐसे बच्चे को आदिवासी समुदाय में ही बड़ा किया गया है और उस बच्चे ने वे तमाम तकलीफें झेली हैं जो कि एक आदिवासी बच्चा झेलता है, तो उसे ऐसा दर्जा देना ही चाहिए।
हम इस मामले की बहुत बारीकियों पर नहीं जाते, और अपनी बात को यहीं तक सीमित रखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ते हुए अंतरजातीय विवाहों का जिक्र करते हुए यह राय दी है कि महिला के आदिवासी होने पर उसके गैरआदिवासी किसी दूसरी जाति के हिंदू से शादी होने पर यह सोचने की जरूरत है कि हिंदू कानून को लागू करना कितना ठीक होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा-ऐसी महिला को शादी के बाद हिंदू मान लेना कहां से ठीक होगा जबकि ऐसी शादी अपने-आपमें हिंदू रिवाजों वाले कानून के ठीक खिलाफ रहती है। हालांकि इसके साथ-साथ अदालत ने यह भी कहा है कि उसका यह निष्कर्ष हर मामले के लिए नहीं है और बच्चे को यह साबित करना होगा कि उसका पालन दलित / आदिवासी मां द्वारा हुआ है और ऐसे मामले में पिता के उच्च वर्ण के होने पर भी उसे पिता के तबके के हक नहीं मिलते हैं।
हम इस फैसले में दो बातों को देख रहे हैं, पहली तो यह कि सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासी समुदाय से जुड़े इस मामले में हिंदू धर्म का जिक्र करते हुए यह बहुत साफ किया है कि हिंदू और आदिवासी समुदाय अलग-अलग हैं। बल्कि अदालत ने आदिवासी और हिंदू की शादी को हिंदू रिवाजों के ठीक खिलाफ करार देकर बहुत साफ-साफ तरीके से हिंदू समाज के मुकाबले आदिवासी समाज को एक वंचित और दबा-कुचला समाज माना है। भारत में हिंदू समाज के एक आक्रामक तबके द्वारा तरह-तरह से आदिवासियों को हिंदू साबित करने की जो कोशिश चलती रहती है, सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश इस कोशिश के तर्क को पूरी तरह खारिज भी कर देता है, जबकि यह मामला इस तर्क पर केंद्रित नहीं है। दूसरी तरफ एक महिला के हकों को यह आदेश बड़े दम-खम के साथ स्थापित करता है और जिस तरह समाज किसी बच्चे के सिलसिले में बाप को ही सब कुछ मान लेता है, और मां की कोई हस्ती ही नहीं गिनी जाती, उस सिलसिले को सुप्रीम कोर्ट ने बदलकर रख दिया है और हम इसे भारत में महिला, और मां के दर्जे की हिमायत में एक बहुत अहमियत का फैसला मानते हैं।
कायदे की बात तो यह है कि इस देश की संसद को, संसद के बाहर राजनीतिक दलों को खुद होकर ऐसा फैसला लेना चाहिए था और जरूरत होती तो उसके लिए संविधान में एक संशोधन करना चाहिए था। हमारे नियमित पाठकों ने यह देखा होगा कि हम महिला के बराबरी के दर्जे के लिए, उसके हकों की हिफाजत के लिए लगातार लिखते हैं और हम यह भी उम्मीद करते हैं कि अदालत तक जाने में जो लोग ताकत रखते हैं, उन्हें भारत सरकार और भारत के प्रधानमंत्री की भाषा के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर करनी चाहिए, कि लालकिले से दिए गए भाषण में अगर प्रधानमंत्री दर्जन भर बार 'आम आदमीÓ कहते हैं तो यह आम औरत के हकों को कुचलना है, उसकी मौजूदगी को ही अनदेखा करना है। इस तरह के भाषा के कदम-कदम के अन्याय के खिलाफ हम बार-बार लिखते हैं, लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि महिलाओं की अगुवाई वाली देश की पार्टियां, महिला नेता, वामपंथियों जैसे सिद्धांतवादी लोग, इनमें से किसी को भी आम आदमी को ही इंसान गिन लेने वाली भाषा में बुराई नहीं दिखती। लेकिन कानून की हमारी समझ यह कहती है कि अगर सुप्रीम कोर्ट में कोई इस भाषा के खिलाफ जाएगा तो वहां भी महिला के पक्ष में ऐसा ही फैसला आएगा जैसा कि अभी एक आदिवासी मां की संतान के पक्ष में आया है।
देश में जो राजनीतिक चेतना संपन्न तबके हैं, उनको यह समझने की जरूरत है कि बेइंसाफी को देखते हुए भी चुप रहकर वे अपने-आपको इतिहास में जागरूक दर्ज नहीं करवा पाएंगे। देश के न सिर्फ महिला संगठनों को, बल्कि बाकी जिम्मेदार लोगों को भी सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद महिलाओं के हक के बाकी पहलुओं पर भी कोशिश करनी चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें