रूश्दी की आजादी से जुड़े मुद्दे


21 जनवरी 2012
संपादकीय
जयपुर के सालाना साहित्यिक जलसे में अंगे्रजी के चर्चित और विवादास्पद लेखक सलमान रूश्दी का आना टल गया क्योंकि भारत के मुसलमान उनसे चले आ रहा पुराना विरोध लेकर उनके खिलाफ फिर खड़े हो गए थे। मुसलमानों की काफी आबादी वाले उत्तरप्रदेश में चुनाव होने जा रहे हैं, और ऐसे में रूश्दी का यहां आना न सिर्फ केंद्र सरकार के लिए बल्कि राजस्थान और उत्तरप्रदेश सरकार के लिए भी एक बड़ी परेशानी का सबब हो सकता था। लोकतांत्रिक उदारता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नजरिए से देखें तो रूश्दी के भारत आने पर हिफाजत का पूरा इंतजाम करना सरकार या सरकारों की सीधी-सीधी जिम्मेदारी बनती है, लेकिन सरकारों की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने राज में कोई बेकाबू तनाव न होने दें। रूश्दी पर दुनिया के कई मुस्लिम देशों से जारी किए गए फतवे तो चल ही रहे हैं, भारत में भी उन पर कोई हमला हैरानी की बात नहीं होती, इसलिए अगर सरकारों में उनके आने को लेकर अधिक उत्साह नहीं था, तो यह सरकारों की व्यापक जिम्मेदारियों और व्यापक जनहित को देखते हुए एक व्यवहारिक बात लगती है। 
हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती हैं, लेकिन भारत का संविधान सिर्फ ऐसी स्वतंत्रता वाला एक पन्ना नहीं है। यह एक बहुत ही जटिल संस्कृतियों वाले देश में सभी तबकों को इस अधिकार के साथ-साथ एक धार्मिक स्वतंत्रता देने वाला संविधान भी है और इसमें कुछ मामलों को लेकर अल्पसंख्यकों की भावनाओं का अलग से जिक्र भी है। यह बात सही है कि रूश्दी का विरोध करने वाले दुनिया भर के मुस्लिम संगठनों में से अधिकतर बहुत ही कट्टरपंथी हैं और उनके तौर-तरीके उग्रवादी या आतंकी हैं। लेकिन इससे इस बात पर फर्क नहीं पड़ता कि किसी तबके की धार्मिक भावनाओं को अगर रूश्दी के लिखे हुए से इस कदर चोट पहुंचती है कि वे इसके लिए बनाए गए कानून की मदद लेते हैं, तो भारत में ऐसे कानून या ऐसे हक के लिए सार्वजनिक लोकतांत्रिक प्रदर्शन की गुंजाइश भी है। रूश्दी की किताब पर लगाई गई रोक को भी हम गलत मानते हैं, लेकिन सवाल साथ-साथ ही यह भी खड़ा होता है कि किसी के लिखने की आजादी दूसरों की धार्मिक भावनाओं के अधिकार के साथ-साथ ही पढ़ी जा सकती हैं।
धार्मिक कट्टरता, धर्मांधता और पाखंड के खिलाफ हम भी आए दिन लिखते हैं। सलमान रूश्दी हो या कोई और, सबको अपनी बात लिखने का हक है और दुनिया के कुछ ऐसे देश हो सकते हैं जहां पर किसी धार्मिक तबके का विरोध हो इतना बड़ा खतरा उस समाज के लिए न हो कि वैसी किताब पर रोक लगाने की जरूरत पड़े। हमने योरप के देशों में रूश्दी को जगह पाते, और सरकारों का साथ पाते देखा है, लेकिन इन देशों ने ऐसे कार्टून बनाने की छूट भी सरकारों ने दी है जिनमें मोहम्मद पैगंबर का मजाक बनाया गया था। उन देशों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माहौल कुछ अलग है और वहां की सामाजिक स्थिति भी कुछ अलग है। वहां पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अलग पैमाने न सिर्फ धर्म के मामले में हैं बल्कि दूसरे मामलों में भी हैं। इसलिए हम दो अलग-अलग देशों की ऐसे मामले में पूरी-पूरी तुलना नहीं कर सकते। भारत की सरकार पर पहली जिम्मेदारी इस देश में अमन-चैन को जारी रखने की है, अगर किसी भी बात से ऐसे हालात बिगड़ सकते हैं तो सरकार पर उस खतरे को देखते हुए पहले से बचाव की कुछ कार्रवाई करने की जिम्मेदारी भी बनती है। इसलिए अगर रूश्दी के न आने से देश की परेशानी कुछ कम होती है, खतरा टलता है, तो इसे यह सोचकर भी देखना चाहिए कि आगे जब कभी इस देश में लोगों की सहनशीलता बढ़ेगी तब ऐसे मामलों को फिर से तौला जा सकता है। यह बात सिर्फ एक मुसलमान लेखक और मुस्लिम समाज की नहीं है। बहुत से दूसरे मामले ऐसे हुए हैं जिनमें कोई लेखक या कलाकार, कोई चित्रकार या फिल्मकार किसी तबके की नाराजगी का शिकार हुए हैं। सैद्धांतिक रूप से तो सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इन सबको पूरी हिफाजत दे, लेकिन सरकार की अपनी सीमाओं को भी देखना चाहिए। इस देश ने जब एक धार्मिक आतंक और कट्टरपंथी धर्मांधता के हाथों अपने एक प्रधानमंत्री को खोया है, जब एक क्षेत्र और जाति के आतंक के हाथों एक दूसरे प्रधानमंत्री को खोया है तो यह समझ लेना चाहिए कि सरकार की जिम्मेदारियां हवा में नहीं लिखी जा सकतीं और उनकी एक सीमा होती है। ऐसे सीमा को सोचे बिना सिर्फ आजादी की बात करना ठीक नहीं है। और आज के जमाने में किसी व्यक्ति का किसी देश में खुद होकर जाना जरूरी नहीं होता, ऐसी चर्चा के बाद उसका काम भी वहां पहुंचकर उसकी बात को रख सकता है। हमें अधिक अच्छा लगता अगर विरोध के बावजूद रूश्दी यहां आ पाते, लेकिन यह बात न उनके फायदे की होती और न भारत के फायदे की, अगर यहां उनका विरोध करते हुए बेकाबू लोगों में से कुछ लोग मारे जाते। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती लोगों को भी अपना लोकतांत्रिक विरोध करते हुए कुछ सब्र रखना होगा और ऐसे माहौल के लिए कोशिश करनी होगी जब चुनावी राजनीति से सहमे हुए नेता, और उनकी पार्टियां, और उनकी सरकारें धर्मांध लोगों के विरोध के मुकाबले रीढ़ की हड्डी के साथ खड़े हो सकें।

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