लड़कियों को बलात्कार से बचाने का शिवराज सरकार का यह तरीका शर्मनाक...

संपादकीय
7 नवम्बर 2017


मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में कोचिंग से लौटती एक छात्रा के साथ गैंगरेप के बाद का हादसा उससे कम भयानक नहीं रहा जब पुलिसकर्मी मां-बाप की इस लड़की ने मां-बाप के साथ जाकर रिपोर्ट लिखवाने की कोशिश की, और बीस घंटे तक उसकी रिपोर्ट नहीं लिखी गई। इस मामले में पुलिस का रूख उजागर होने के बाद सरकार का दिल हिल गया, और बहुत से अफसरों को हटा दिया गया। इसके बाद कल सरकार का यह नजरिया सामने आया है कि कोचिंग कक्षाओं से छात्राओं की वापिसी सात बजे तक हो जाए, या फिर कोचिंग सेंटर इन छात्राओं की मोबाइल टेक्नॉलॉजी से मॉनिटरिंग की गारंटी करे।
सरकार की यह सोच और यह इंतजाम केवल यही बताते और साबित करते हैं कि लड़कियों से बलात्कार के लिए मानो लड़कियां ही जिम्मेदार हैं। अगर सरकार गुंडों और बदमाशों पर काबू नहीं कर पा रही है, तो लड़कियों को सात बजे घर के भीतर धकेल दिया जाए। मध्यप्रदेश सरकार की यह सोच हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश की खाप पंचायतों की सोच से अलग नहीं है। होना तो यह चाहिए कि अगर सरकार को यह डर है कि सात बजे के बाद बलात्कारी सक्रिय हो सकते हैं, तो वह तमाम लड़कों को ही सात बजे के बाद उनके घर बिठा दे, बजाय लड़कियों को सात के पहले उनके घर पहुंच जाने को कहने के। ऐसा ही नजरिया बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में सामने आया था, और ऐसा ही नजरिया हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का था जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि जिन लड़कियों को अंधेरे के बाद बाहर निकलना हो, वे नंगी होकर क्यों नहीं निकल जातीं। यह वही सोच है जिसके तहत खाप पंचायतें लड़कियों के जींस को, उनके मोबाइल फोन को बलात्कार के लिए जिम्मेदारी ठहराती हैं। और इनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं रहता कि दिल्ली और गुडगांव से लेकर कर्नाटक तक के स्कूलों में पांच-छह बरस की बच्चियों के साथ क्यों बलात्कार होते हैं? क्या वे अश्लील कपड़े पहनी होती हैं, या कि वे मोबाइल का इस्तेमाल करती हैं, या वे सात बजे के बाद सड़कों पर रहती हैं?
दरअसल हिंदुस्तान की सोच को जब तक पाखंडी कट्टरपंथी मर्दानगी से भरकर रखेंगे, तब तक यहां लड़कियों और महिलाओं से जुल्म और बलात्कार नहीं थमेंगे। पूरी की पूरी सोच ऐसी पुरुषवादी है कि भाषा से लेकर कहावत और मुहावरों तक, गरीब घरों में खाने की प्राथमिकता से लेकर पढ़ाई की प्राथमिकता तक, और कपड़ों से लेकर शादी की पसंद तक लड़की हमेशा दूसरे दर्जे की नागरिक मानी जाती है, और जब तक यह सिलसिला जारी रहेगा, तब तक प्रदेश का मुख्यमंत्री चाहे अपने-आपको हर कन्या का मामा कहता रहे, या कि सरकारी पैसों से कन्यादान किया जाता रहे, ऐसे बलात्कार और ऐसे जुर्म जारी रहेंगे। यह समझने की जरूरत है कि बलात्कार करने वाले तो बदमाश नौजवान थे, लेकिन उसके बाद अपने हिंसक बर्ताव से बलात्कार की शिकार युवती और उसके परिवार के साथ और बलात्कार करने वाले तो सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए वर्दीधारी लोग थे। जब सरकार की अपनी वर्दी की सोच ऐसी हिंसा और मर्दानगी भरी है, तो सात बजे के बाद भी यह पुलिस लड़कियों को क्या बचा लेगी? शिवराज सिंह की सरकार को सिर झुकाकर पूरे प्रदेश की लड़कियों से माफी मांगनी चाहिए, और पूरे प्रदेश की पुलिस के साथ मिलकर एक निर्धारित समय पर सड़क किनारे खड़े होकर दो मिनट के लिए शर्मिंदगी दिखानी चाहिए। देवियों के नाम पर और कन्याओं के नाम पर अंतहीन योजनाओं से प्रदेश की जिंदा देवियां सुरक्षित नहीं हो जातीं, इसके लिए एक संवेदनशील सरकार लगती है क्योंकि एक कट्टर और पुरातनपंथी सरकार की सोच अपनी नागरिक लड़कियों को हमेशा ही पुरुषवादी हिंसा के निशाने पर रखती है। (dailychhattisgarh)
- सुनील कुमार

दीवारों पर लिक्खा है, 7 नवंबर

गन-कल्चर और गन-लॉबी के चलते अमरीका में हिंसा

संपादकीय
6 नवम्बर 2017


अमरीका में कुछ दिनों के भीतर ही फिर एक गोलीबारी हुई, और इस बार दो दर्जन से अधिक लोगों को एक चर्च में मार डाला गया। इसके पहले भी वहां कुछ और किस्म के हमले हुए जिसमें एक मुस्लिम ने लोगों की भीड़ पर ट्रक चढ़ा दी, और अपने को आईएसआईएस का बताते हुए धार्मिक नारे भी लगाए। अमरीका में दो किस्म से घटनाएं हो रही हैं, एक तो लोग निजी तनाव की वजह से भी दूसरों पर गोलियां चला रहे हैं, और दूसरी किस्म है कि लोग अमरीका के खिलाफ आतंकी हमले के लिए हिंसा कर रहे हैं। इन दोनों ही किस्म के मामलों में हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है जो कि अमरीकी कानून के मुताबिक हर नागरिक के घर में कितने भी हो सकते हैं।
अमरीका में यह बहस नई नहीं है कि जनता को कितने हथियार रखने की छूट दी जाए, और कैसे-कैसे हथियार रखने दिए जाएं। आज वहां कोई भी नागरिक हथियारों की दुकान पर जाकर साधारण पहचान पत्र दिखाकर खतरनाक किस्म के फौजी हमले करने वाले ऑटोमैटिक हथियार खरीद सकते हैं। अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा रहता है और हथियारों का हक बुनियादी हक मानने वाली हथियार लॉबी वहां उम्मीदवारों से उम्मीद रखती है, और दूसरी तरफ गन कंट्रोल लॉबी रहती है जो कि हथियारों पर रोक की मांग करती है। अमरीका में निजी हथियार इतना बड़ा बाजार है कि खरबपति कारखानेदार किसी भी कीमत पर निजी हथियारों पर जरा सी भी रोक नहीं लगने देते, और उन्होंने एक ऐसा राजनीतिक माहौल बना रखा है कि अनगिनत हथियार रखने का बुनियादी हक अमरीका को हमेशा के लिए फौजी बगावत से बचाकर रखेगा। अगर जनता के घर-घर में हथियार होंगे तो फौज हथियारों के बल पर बगावत नहीं कर सकेंगे।
लेकिन हकीकत यह है कि इन हथियारों को कभी भी किसी फौजी बगावत से रोकने की नौबत नहीं आई है बल्कि लोग निजी तनाव में, या निजी आतंकी आस्था के चलते हुए ऐसे हथियार लेकर निकलते हैं और दर्जनों लोगों को मार डालते हैं। हिन्दुस्तान जैसे जिन देशों में निजी हथियार बहुत ही कम लोगों को रखने की इजाजत दी जाती है, वहां पर ऐसी हिंसा नहीं होती है। और ऐसी हिंसा का अमरीका में जाहिर तौर पर रिश्ता उसकी आसान मौजूदगी है। अमरीकी फिल्मों और बाजार का अमरीकी जीवनशैली को बढ़ावा कुछ इस तरह का रहता है कि अमरीका के लोग हथियारों को अपनी ताकत के एक विस्तार के रूप में देखते हैं। हॉलीवुड के बहुत से किरदार ऐसी जीवनशैली बढ़ाते चलते हैं, और ये हथियार आत्मरक्षा के नहीं रहते, बल्कि सामूहिक हत्या करने के रहते हैं।
अमरीकी सरकार को ऐसी वारदातों के बाद अक्ल आ जानी चाहिए कि उसे हथियार-कारखानेदारों को बढ़ावा देने के बजाय देश में लोगों को बिना हथियार सुरक्षित महसूस करने का माहौल देना चाहिए। जिस देश में गन-कल्चर इतना हत्यारा हो चुका हो कि लोग निजी भड़ास निकालने के लिए किसी भी जगह जाकर कितने भी लोगों को मारने लगते हैं, वहां पर हथियारों को हटाना ही एक रास्ता हो सकता है, और डोनल्ड ट्रंप जैसे कारोबारी राष्ट्रपति से बिल्कुल भी यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वे हिंसा के इस कारोबार को घटाने की कोई भी कार्रवाई करेंगे। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार

देश के सारे चुनाव एक साथ करवाने की सोच आकर्षक

संपादकीय
5 नवम्बर 2017



भारत के चुनावों में बड़ी-बड़ी सभाओं में जुटे लोगों के बीच बड़े-बड़े नेता अपना आपा खोकर कई तरह की बातें करते हैं जो कि देश के उस चुनावग्रस्त इलाके को भड़काने के लिए कही जाती हैं, लेकिन इससे देश के बाकी हिस्से को जख्म भी पहुंचते हैं। जब अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग वक्त पर चुनाव होते हैं, तो यह सिलसिला हर कुछ महीनों में सामने आता है, और बहुत सी कड़वाहट, बहुत सी गंदगी छोड़ जाता है। मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए ऐसी जो कोशिशें होती हैं, उनसे बाकी देश भी बुरी तरह प्रभावित होता है।
अब जब यह लगता है कि विधानसभा, लोकसभा, और स्थानीय संस्थाओं के चुनाव देश में अगर एक साथ हो जाएं, तो यह सारी गंदगी दो महीनों में सिमट जाएगी, और बाकी के करीब पौने पांच बरस सभी सरकारें कामकाज पर ध्यान दे सकेंगी। लेकिन कुछ लोग ऐसी व्यवस्था को गलत भी मानते हैं और इससे लोकतंत्र का नुकसान होगा ऐसा उनका मानना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुछ विरोधी भी ऐसा समझते हैं कि मोदी एक व्यक्ति के रूप में इतने ताकतवर और इतने मशहूर हो चुके हैं कि वे सबसे लोकप्रिय भी बन सकते हैं, और इसका नुकसान बाकी नेताओं और पार्टियों को राज्य और म्युनिसिपल-पंचायत के स्तर पर भी हो सकता है। आज भारत के संविधान में ऐसे एकमुश्त चुनाव की व्यवस्था नहीं है, लेकिन इस पर विचार और चर्चा पहले भी चलते रहे हैं। इसके हिमायतियों का यह मानना है कि इससे चुनावी खर्च घटेगा, और सरकारी अमला भी इन तीनों चुनावों में अलग-अलग व्यस्त रहने के बजाय अपने सरकारी काम पर ध्यान दे सकेगा।
हम किसी व्यक्ति की लोकप्रियता या संभावना को देखे बिना, उसके एक कामयाब तानाशाह बन जाने की आशंका को देखे बिना अगर ऐसे चुनाव की कल्पना करते हैं, तो वह आज के बिखरे हुए चुनावों के मुकाबले बेहतर लगती है। इसकी एक वजह यह है कि चुनाव खर्च और इंतजाम में भारी किफायत से परे भी एक दूसरी किफायत और होगी। आज देश में चुनाव की वजह से सत्तारूढ़ पार्टी इस बुरी तरह लोगों को खुश करने के लिए सरकारी खजाने से तोहफे बांटती है, वह कुल मिलाकर जनता के ही खजाने की ही एक बड़ी बर्बादी होती है। म्युनिसिपल हो या केंद्र सरकार, उसके निर्वाचित लोगों के सामने चुनाव के पहले के आखिरी साल यह बहुत बड़ी चुनौती रहती है कि वे दुबारा जीतकर कैसे आएं। इसलिए राजनीतिक दल अपने नियंत्रण की इन तीनों सरकारों, केंद्र सरकार, राज्य सरकार, और म्युनिसिपल-पंचायत, इन तीनों के सारे बजट, और इसकी सारी क्षमता का इस्तेमाल चुनावी-प्राथमिकताओं के मुताबिक करते हैं।
एक साथ चुनाव होने से यह जरूरी भी नहीं है कि राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय नेता की पार्टी को राज्य स्तर पर और शहर-पंचायत स्तर पर भी कामयाबी मिल जाए। इस देश के पहले के कुछ ऐसे चुनाव भी रहे हैं जिनमें वोटर ने एक साथ संसद और विधानसभा के लिए वोट दिए, और केंद्र के लिए उसने एक पार्टी का सांसद चुना और राज्य विधानसभा के लिए दूसरी पार्टी का विधायक चुना। लेकिन ऐसा कोई भी फैसला बड़े व्यापक महत्व का होगा, और इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को चुनाव आयोग के साथ मिलकर देश के लोगों के बीच विचार-विमर्श और बहस का एक सिलसिला शुरू करना चाहिए। जिन लोगों ने एक साथ चुनाव की ऐसी सोच के खिलाफ लिखा है, उनके तर्कों पर भी सोचना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

क्या राजनीतिक विचारधारा का यौन-हिंसा से लेना-देना है?

संपादकीय
4 नवम्बर 2017


कल तक की एक सक्रिय पत्रकार, और अब एक स्तंभकार ने फेसबुक पर यह पोस्ट किया कि क्या किसी की राजनीतिक विचारधारा उसके बलात्कारी होने की आशंका बढ़ाती है? इस महिला स्तंभकार ने खुद ही अपने इस सवाल को खारिज करते हुए अपनी सोच लिखी है कि कोई भी सेक्स-हिंसा करने वाले हो सकते हैं, और कोई भी उसके शिकार।
आज लिखने को कुछ दूसरे भी मुद्दे हैं, लेकिन उन पर लिखते हुए फिर वही आए दिन की साम्प्रदायिकता-विरोधी बातें लिखना हो जाएगा, इसलिए उससे जरा सा हटकर इस मुद्दे पर सोचना और लिखना बेहतर होगा। जहां तक भारत की राजनीतिक विचारधाराएं हैं, तो वे बुनियादी रूप से या तो धर्मनिरपेक्ष हैं, या फिर वे किसी धर्म से जुड़ी हुई हैं। भाजपा, शिवसेना, अकाली दल, या कुछ मुस्लिम पार्टियां अनिवार्य रूप से, घोषित या अघोषित, किसी न किसी धर्म के साथ हैं, उस धर्म की राजनीति करती हैं। ऐसे में जाहिर है कि उनकी राजनीतिक विचारधारा उनकी अपनी पसंद के धर्म की विचारधारा से बड़ी दूर तक प्रभावित भी होंगी। और अलग-अलग धर्मों से निकलने वाली सोच को देखें, तो तकरीबन सभी का हाल औरतों के बारे में एक सरीखा है। धर्म में औरत की जगह दोयम दर्जे की होती है, और मर्द ही पोप होते हैं, मुल्ला या पुजारी होते हैं, ग्रंथी या भिक्षु होते हैं, संत या महाराज होते हैं, और महिलाएं उन धर्मों में उनके पीछे, उनके नीचे चलने वाली होती हैं। एक-एक करके बहुत से धर्मों में यह साबित हो चुका है कि धर्म के प्रमुख लोगों का रूख महिलाओं के लिए यौन-हिंसा का रहता है, इसलिए हमारा यह पुराना निष्कर्ष है कि धर्म मर्दों को औरत-विरोधी बनाता है, गरीब-विरोधी भी बनाता है, और किसी भी सुधार से लोगों को दूर ले जाता है। ऐसे में जाहिर है कि धर्म महिलाओं के बराबरी के हक के खिलाफ रहता है, और धर्म की राजनीति करने वाले लोग भी महिलाओं की बराबरी के खिलाफ रहते हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दलों में से अधिकतर ऐसे हैं जिन्होंने संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण को कभी हकीकत नहीं बनने दिया, उसके लिए नाटक चाहे जितना किया हो।
ऐसे में जो राजनीतिक विचारधाराएं महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के खिलाफ रहती हैं, वे महिलाओं पर सेक्स-जुल्म करने का खतरा कुछ अधिक रखती हैं। जो पार्टियां महिलाओं को बराबरी का मानती हैं, उनके नेता, उनके कार्यकर्ता, धर्मांध और साम्प्रदायिक पार्टियों के नेताओं-कार्यकर्ताओं के मुकाबले कम बलात्कारी होते होंगे, ऐसा हमारा मानना है। ऐसा मानने के पीछे हमारे पास कोई ठोस आंकड़े नहीं है, लेकिन एक सामान्य समझ यह कहती है कि कट्टरपंथी और धर्मांध राजनीतिक विचारधारा महिलाओं का सम्मान नहीं कर सकतीं। हमने इस किस्म की राजनीतिक ताकतों को निजी स्तर पर ऐसी चर्चा में अधिक हिस्सेदार पाया है जो यह बताती है कि राजनीति में महिलाएं अपनी देह का इस्तेमाल करके ही ऊपर चढ़ती हैं। अब धर्म से जुड़ी, धर्म की राजनीति करने वाली जिन पार्टियों के जो नेता ऐसा सोचते हैं, उनके लिए यह अधिक स्वाभाविक बात भी होगी कि मौका पडऩे पर वे महिलाओं से वैसी ही उम्मीद करने लगें, और फिर वैसा ही बर्ताव भी करने लगें। राजनीति में महिलाओं का देह शोषण राजनीतिक विचारधारा के आधार पर भी अधिक होता होगा, ऐसा हमारा अंदाज है। और इसके पीछे की खास वजह पार्टी का धर्मांध और साम्प्रदायिक होना, धर्म आधारित होना होता होगा।
राजनीति से जुड़े सेक्स-अपराधों के आंकड़ों का विश्लेषण अधिक काम का नहीं होगा क्योंकि अलग-अलग राजनीतिक दलों में सेक्स-हिंसा की शिकायत करने की महिलाओं की सोच भी उस पार्टी की सोच से प्रभावित रहती होगी। जो महिलाएं धर्म के भीतर की ऐसी हिंसा, ऐसे शोषण के खिलाफ मुंह नहीं खोलतीं, वे अपनी उसी धार्मिक सीख का इस्तेमाल राजनीतिक दल में भी करती होंगी। इसलिए लोग चर्चा करके ही इस मुद्दे पर कोई अध्ययन कर सकते हैं कि क्या राजनीतिक विचारधारा का यौन-हिंसा से कोई लेना-देना होता है? (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 4 नवंबर

लोकतंत्र में क्या-क्या न करें, ट्रंप इसकी बेमिसाल मिसाल

संपादकीय
3 नवम्बर 2017


अमरीका में ट्विटर में नौकरी के आखिरी दिन एक कर्मचारी ने राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का ट्विटर अकाऊंट डी-एक्टिवेट कर दिया। बाद में इसे एक गलती बताकर शुरू किया गया, लेकिन ट्विटर ने यह भी माना कि ऐसा लगता है कि यह जान-बूझकर किया गया है। अमरीका में डोनल्ड ट्रंप की हरकतों की वजह से लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। यह जरूर है कि एक बार कोई अमरीकी राष्ट्रपति चुन लिया जाए, तो उसे हटाना आसान नहीं रहता, और जब तक वे कोई ऐसा जुर्म न करें, या कि ऐसा बहुत गलत काम न करें जिस पर वहां की संसद महाभियोग चलाए, और उसके साबित होने पर उन्हें हटाए। ट्रंप जितनी ज्यादती कर रहे हैं, वह है तो बहुत, लेकिन वह महाभियोग की हद तक अभी पहुंच नहीं रही है।
लेकिन ट्रंप को अमरीकी मूल्यों और नीति-सिद्धांतों को कुचलने वाला एक ऐसा नेता बताया जा रहा है जिसके खिलाफ उन्हीं की पार्टी के बड़े-बड़े नेता बयान दे रहे हैं, और खुलकर उनका विरोध कर रहे हैं। लेकिन यहां पर ट्रंप की मानसिकता को समझने की जरूरत है जिनका एक बयान वहां बार-बार टीवी पर आ रहा है और मीडिया में इसका विश्लेषण किया जा रहा है। ट्रंप ने कहा कि वे एफबीआई और न्याय विभाग को लेकर जिस तरह से काम करना चाहते हैं, वे उस तरह से नहीं कर पा रहे हैं, और इसकी वजह से वे बहुत निराश हैं। इस पर जानकार विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का राष्ट्रपति बनने के पहले तक का सारा तजुर्बा महज एक कंपनी चलाने वाले का रहा है, और वे अलग-अलग स्वायत्त और स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं की सरकार से दूरी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वे सब कुछ काबू में करना चाहते हैं, और अमरीका का संविधान इसकी इजाजत नहीं देता है।
अमरीकी राष्ट्रपति वैसे तो दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान माना जाता है, लेकिन उसकी ताकत अमरीका के बाहर अधिक होती है, खुद अमरीका के भीतर अमरीकी राष्ट्रपति पर काबू करने के लिए बहुत सी संवैधानिक संस्थाएं हैं, और उनमें से कुछ आज भी ट्रंप के पूरे दायरे के खिलाफ संसदीय जांच भी कर रही हैं। यहां पर इस चर्चा का मकसद यह नहीं है कि हमारे पाठक सीधे-सीधे अमरीका या ट्रंप से इतने अधिक जुड़े हुए हैं, इस चर्चा का मकसद यह है कि जब बिना तजुर्बे के किसी के हाथ इतनी अधिक ताकत आ जाती है, तो उसे यह समझ नहीं पड़ता कि बहुत सी बातें लोकतंत्र में उसकी ताकत के बाहर भी रहेंगी। यह बात सिर्फ अमरीका के काम की नहीं है, दुनिया के बाकी तमाम देशों को भी, वहां के नेताओं को भी इसे समझना होगा क्योंकि लोकतंत्र किसी को भी बेकाबू ताकतें नहीं देता है, फिर चाहे लोग लोकतंत्र के लचीलेपन का बेजा फायदा उठाकर तमाम ताकतों को अपने हाथ में ही क्यों न ले लें, और मनमाने फैसले क्यों न करें।
दुनिया में लोकतंत्र का इतिहास आनन-फानन अखबारी सुर्खियों की तरह नहीं लिखा जाता। उसे लिखने में थोड़ा सा वक्त लगता है, लेकिन वह सही संदर्भों में नेताओं के फैसलों को दर्ज करता है। इसलिए जिनके हाथ में ताकत कुछ अधिक आ जाती है, उन्हें ताकत को अपने सिर पर नहीं चढऩे देना चाहिए क्योंकि फिर सिर हाथों से कई गलत काम करवाने लगता है, और हथकड़ी सिर में नहीं लगती, हाथोंं में ही लगती है। अमरीका में ट्रंप एक बेमिसाल मिसाल बनकर सामने आए हैं कि लोकतंत्र में क्या-क्या नहीं करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार

दागी नेताओं पर विशेष कोर्ट का सुप्रीम कोर्ट का रूख बिना देर किए लागू किया जाए

संपादकीय
2 नवम्बर 2017


सुप्रीम कोर्ट ने कल इस बात पर गहरी निराशा जाहिर की है कि सांसदों और विधायकों पर चलने वाले मुकदमे चलते रह जाते हैं, और वे दो-दो, चार-चार कार्यकाल पूरे भी कर लेते हैं, ऐसे में इन पर मुकदमे चलाने के लिए अलग से अदालतें बनाने की जरूरत है। जजों ने पूछा कि इसके लिए अदालत बनाने और स्टॉफ रखने के मामले में निगरानी खुद सुप्रीम कोर्ट करेगा। अभी केन्द्र सरकार को इस पर अपना रूख रखना है, और इस काम में खासा बड़ा बजट लगेगा इसलिए अदालत की सोच को जमीन पर उतरते हुए वक्त भी लग सकता है, और जुर्मों से घिरी हुईं, और मुजरिमों से भरी हुई पार्टियां हो सकता है कि इसे अदालत की सरकारी नीतियों में दखल मानते हुए इसका विरोध भी करे।
हमें इस बारे में नया कुछ इसलिए नहीं कहना है कि हम बरसों से इस पर लिखते आ रहे हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई जब शुरू की, उसके भी बरसों पहले से हमने यह मांग रखी थी, और इससे आगे बढ़कर यह भी कहा था कि देश के ताकतवर तबके अगर जुर्म करते हैं, तो उनके लिए आम मुजरिमों के मुकाबले अधिक कड़ी सजा का इंतजाम होना चाहिए। यहां पर हम अपने ही कुछ पुराने संपादकीय के हिस्से रखना चाहेंगे, क्योंकि कल के सुप्रीम कोर्ट के रूख पर आज जो कहा जा सकता है, वह सब हम पहले लिख चुके हैं। इसी जगह 2011 में हमने लिखा था-''समाज के ताकतवर तबकों के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिए तेजरफ्तार अदालतें अलग से बनानी चाहिए। हम ऐसे दर्जे में सांसदों के अलावा बड़े अफसरों, संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों और बहुत अधिक दौलतमंद लोगों को भी शामिल करना चाहते हैं क्योंकि कुर्सी और पैसे की ताकत के साथ कोई अपराधी अपने खिलाफ मामले को बहुत दूर तक घसीट सकता है, सुबूतों और गवाहों को प्रभावित कर सकता है, और शिकायतकर्ता को इंसाफ से अपनी पूरी नौकरी या अपनी पूरी जिंदगी दूर रख सकता है। हमने कई बार यह भी सुझाया कि जब ऊपर गिनाए गए तबकों के लोग किसी कमजोर के खिलाफ कोई अपराध करें, तो उसके लिए अलग से कड़क सजा का इंतजाम होना चाहिए। गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों के हक छिनने वाले लोगों के लिए भी अलग से कड़ी सजा का संवैधानिक प्रावधान होना चाहिए। भारत जैसे लोकतंत्र में जहां तरह-तरह की ताकतों से लैस तबके अपने अपराधों के बावजूद बचे रहने में कामयाब रहते हैं और इस असमानता को खत्म करने के लिए तेज रफ्तार अदालतें और वीआईपी दर्जे की अधिक कड़क सजा होनी चाहिए।''
''यह देखकर अच्छा लगता है कि अपनी बहुत मामूली सी कानूनी समझ या प्राकृतिक न्याय अपनी सोच के तहत जो मुद्दे हम बार-बार उठाते हैं उन्हें कुछ बरसों बाद जाकर देश की सबसे बड़ी अदालत तर्कसंगत और न्यायसंगत मानती है। ऐसे और बहुत से मुद्दे रहे हैं जिन्हें हमने बहुत बार उठाया और फिर जो अदालत के रास्ते अमल में आए।''
''बहुत से लोगों को यह लग सकता है कि भारत में न्यायपालिका इन दिनों लोकप्रियता के सैलाब पर तैरते हुए अपने दायरे से कुछ बाहर जा रही है। ऐसा हो भी सकता है। लेकिन ऐसा होने पर भी आज हम मुद्दों के आधार पर लक्ष्मण रेखा को लांघने के तब-तब हिमायती हैं जब-जब सरकार या संसद जैसे लोकतंत्र के दूसरे पाए पूरी तरह नाकामयाब, बेअसर, भ्रष्ट या बदनीयत साबित होते हैं। अपराधियों को संसद और विधानसभाओं के बाहर रखने का मामला ऐसा ही है। कटघरे में खड़े हुए लोगों को अगर संसद और विधानसभाओं में जाने का मौलिक अधिकार है तो देश के लोगों को भी संदिग्ध अभियुक्तों से मुक्त संसदीय व्यवस्था का अधिकार है। जब राजनीतिक दलों, संसद और सरकार, इनकी नीयत ही अपराधियों के पक्ष में है तो अदालती दखल को हम जरूरी मानते हैं। अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग पार्टियों के सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को अगर देखें तो बोफोर्स से लेकर चारा घोटाले तक और अयोध्या से लेकर गुजरात दंगों तक, कर्नाटक की खदानों से लेकर आदर्श घोटाले तक, किस मामले में यह लोकतंत्र दिग्गजों को सजा दे पाता है? और ऐसे लोकतंत्र के चलते अगर देश के आधा दर्जन राज्यों में सबसे लुटे और पिटे हुए लोगों के इलाकों में अगर नक्सली अपने किस्म का इंसाफ थोप रहे हैं तो यह नौबत तो किसी दिन आनी ही थी। इसलिए हम लोकतंत्र के पायों से यह कहना चाहते हैं कि सहूलियतों वाली जिंदगी के साथ-साथ अगर इंसाफ की फिक्र नहीं की जाएगी तो फिर बेइंसाफी के शिकार तबके न सिर्फ माओवादी विचारधारा बल्कि कई दूसरी किस्म की विचारधाराओं पर चलकर या विचारहीन हिंसा से भी अपने किस्म के इंसाफ को सही ठहराने की कोशिश करेंगे।''(Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार

बालिग बरस की तरफ पहला कदम बढ़ाता, भूख और बेवक्त मौत से आजाद छत्तीसगढ़

संपादकीय
1 नवम्बर 2017


किसी नए बने हुए राज्य के सामने अनगिनत चुनौतियों भी हो सकती हैं, और संभावनाएं भी। सत्रह बरस पहले मध्यप्रदेश की गुलामी से अलग हुए इस पिछड़े हुए आदिवासी, नक्सली, गरीब कहे जाने वाले राज्य के सामने चुनौती यह थी कि शहरी हिंदुस्तान की शिक्षित और संपन्न आबादी इसे अलग से जानती भी नहीं थी, और कोई इसे झारखंड में मानते थे, तो कोई इसकी राजधानी रांची समझते थे। अभी-अभी तक इस राज्य के बाहर के बहुत बड़े तबके के भीतर इसे लेकर ऐसी धारणा है कि छत्तीसगढ़ में विमान से उतरते ही नक्सली गोलियों से सामना होगा, और जान बचाकर होटल पहुंचना होगा। गरीब, पिछड़े, और अपनी किसी साख के बिना इस राज्य ने एक सफर शुरू किया था, और इसके पहले तीन बरस राजनीतिक हत्या, विधायक खरीद-बिक्री, और ऐसे ही दूसरे विवादों से लदे हुए गुजर गए। देश में छत्तीसगढ़ का नाम एक बार थोक में भाजपा विधायकों की कामयाब खरीदी के लिए आया, और एक बार नाकामयाब खरीद के लिए।
लेकिन 2003 के बाद इस राज्य में भाजपा के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अगुवाई में चुनौतियों के साथ-साथ संभावनाओं पर भी मेहनत करना शुरू किया, और तबसे लेकर अब तक तीन विधानसभा चुनाव, तीन लोकसभा चुनाव, और तीन म्युनिसिपल चुनाव में जीत का निरंतर सिलसिला अविभाजित मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास में भी अभूतपूर्व रहा। देश भर में जगह-जगह मुख्यमंत्रियों को अस्थिरता झेलनी पड़ती है, कहीं दलबदल से सरकार गिरती है, तो कहीं भ्रष्टाचार के दलदल में सरकार धंसती है, छत्तीसगढ़ में यह नौबत नहीं आ पाई, न मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई बगावत हुई, न भाजपा की सरकार बदलने की नौबत आई, और इसी निरंतरता के चलते सरकार ने कई बड़ी नीतियां बनाई, और कई बड़े कार्यक्रम लागू किए।
आज जब यह राज्य सत्रह बरस पूरे करके अपने बालिग बरस की तरफ पहला कदम बढ़ा रहा है, तो उसकी सबसे बड़ी कामयाबी के बारे में सोचने की जरूरत है। बहुत से लोगों को इसकी अर्थव्यवस्था, इसके ढांचागत विकास, इसकी प्रतिव्यक्ति आय में बढ़ोतरी सबसे महत्वपूर्ण लग सकती हैं, लेकिन हमारी नजर में इस सरकार के इन तकरीबन चौदह बरसों की सबसे बड़ी कामयाबी प्रदेश में भुखमरी खत्म होना, कुपोषण बहुत हद तक घटना, और शिशु-मृत्युदर, जननी-मृत्युदर में एक बड़ी गिरावट आना है। राज्य बनने के बाद भी भूख से मौत खत्म नहीं हो पाई थी, लेकिन पिछले कई बरस से छत्तीसगढ़ में सरकार की रियायती अनाज की नीति ने छत्तिसगढिय़ों की बेवक्त की मौत को खत्म कर दिया है, और यह सबसे बड़ा सामाजिक विकास है। आर्थिक विकास के आंकड़े सार्वजनिक क्षेत्र की कमाई और कारखानेदारों की कमाई को सबसे गरीब की कमाई के साथ जोड़कर प्रतिव्यक्ति औसत आय दिखा देते हैं। लेकिन वे आंकड़े पूरी तरह फर्जी रहते हैं। ऐसे में खानपान और जीने के केंद्र सरकार, योजना आयोग, सुप्रीम कोर्ट, यूनिसेफ, और संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े भी सही विकास बताते हैं, और इस मोर्चे पर छत्तीसगढ़ में सबसे शानदार तरक्की की है।
दूसरा कामयाब मोर्चा बिजली का है, और यह राज्य पॉवर-सरप्लस राज्य होकर छोटे-छोटे कारीगरों और स्वरोगारियों को कमाई का जितना मौका देता है, उससे भी प्रदेश के लोगों की हालत सुधरी है। साथ-साथ किसानों को पंप के लिए जितनी बिजली मिलती है, उससे भी ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था सुधरी है। लगे हाथों राज्य की धान खरीदी नीति पर भी नजर डालने की जरूरत है जिसकी वजह से किसान बेफिक्र होकर खेत में मेहनत कर पाते हैं। अब राज्य में लगातार लघु वनोपज इकट्ठा करने वाले आधा करोड़ से अधिक लोग ऐसे हैं जिनको तेंदूपत्ता बोनस मिलने जा रहा है, और केंद्र सरकार के समर्थन मूल्य से अधिक दाम पर उनकी वनोपज खरीदी जा रही है। आबादी का इतना बड़ा हिस्सा मौसमी कामकाज से अगर कमाई पाता है, तो वह चाहे शहरी नजरों में न आ पाए, लेकिन उससे इन बेचेहरा, बेनाम लोगों की जिंदगी बदल रही है।
राज्य की इन सत्रह बरसों की तरक्की को याद करने का यह मौका मौजूदा सरकार की स्तुति भी लग सकता है क्योंकि इन सत्रह में से चौदह बरस तो डॉ. रमन सिंह के अकेले के हैं। हम एक-एक योजना को यहां गिनाना नहीं चाहते, लेकिन राज्य के अस्तित्व के संदर्भ में हम यह जरूर कहना चाहते हैं कि इन चौदह बरसों में से दस बरस डॉ. रमन सिंह को ऐसे मिले जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी, और राज्य में उस यूपीए की मुखिया कांगे्रस पार्टी के बड़े दिग्गज नेता सक्रिय थे। इसके बावजूद रमन सिंह को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने ये दस बरस बिना किसी टकराव के, केंद्र के साथ अच्छे समन्वय से गुजार दिए, और राज्य का कोई नुकसान नहीं होने दिया। केंद्र और राज्य के संबंधों में यह बात इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि इन दोनों जगहों पर यह जरूरी नहीं है कि एक ही पार्टी या गठबंधन की सरकारें हों।
आने वाले दिनों में हम राज्य के सत्रह बरस के और अच्छे-बुरे पहलुओं पर चर्चा करेंगे, लेकिन आज सीमित जगह और सीमित समय में हमने उन दो-चार मुद्दों को छुआ है जो हमें सबसे महत्वपूर्ण दिखते हैं, और लगते हैं। बाकी चर्चा आने वाले दिनों में। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार