बालिग बरस की तरफ पहला कदम बढ़ाता, भूख और बेवक्त मौत से आजाद छत्तीसगढ़

संपादकीय
1 नवम्बर 2017


किसी नए बने हुए राज्य के सामने अनगिनत चुनौतियों भी हो सकती हैं, और संभावनाएं भी। सत्रह बरस पहले मध्यप्रदेश की गुलामी से अलग हुए इस पिछड़े हुए आदिवासी, नक्सली, गरीब कहे जाने वाले राज्य के सामने चुनौती यह थी कि शहरी हिंदुस्तान की शिक्षित और संपन्न आबादी इसे अलग से जानती भी नहीं थी, और कोई इसे झारखंड में मानते थे, तो कोई इसकी राजधानी रांची समझते थे। अभी-अभी तक इस राज्य के बाहर के बहुत बड़े तबके के भीतर इसे लेकर ऐसी धारणा है कि छत्तीसगढ़ में विमान से उतरते ही नक्सली गोलियों से सामना होगा, और जान बचाकर होटल पहुंचना होगा। गरीब, पिछड़े, और अपनी किसी साख के बिना इस राज्य ने एक सफर शुरू किया था, और इसके पहले तीन बरस राजनीतिक हत्या, विधायक खरीद-बिक्री, और ऐसे ही दूसरे विवादों से लदे हुए गुजर गए। देश में छत्तीसगढ़ का नाम एक बार थोक में भाजपा विधायकों की कामयाब खरीदी के लिए आया, और एक बार नाकामयाब खरीद के लिए।
लेकिन 2003 के बाद इस राज्य में भाजपा के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अगुवाई में चुनौतियों के साथ-साथ संभावनाओं पर भी मेहनत करना शुरू किया, और तबसे लेकर अब तक तीन विधानसभा चुनाव, तीन लोकसभा चुनाव, और तीन म्युनिसिपल चुनाव में जीत का निरंतर सिलसिला अविभाजित मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास में भी अभूतपूर्व रहा। देश भर में जगह-जगह मुख्यमंत्रियों को अस्थिरता झेलनी पड़ती है, कहीं दलबदल से सरकार गिरती है, तो कहीं भ्रष्टाचार के दलदल में सरकार धंसती है, छत्तीसगढ़ में यह नौबत नहीं आ पाई, न मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई बगावत हुई, न भाजपा की सरकार बदलने की नौबत आई, और इसी निरंतरता के चलते सरकार ने कई बड़ी नीतियां बनाई, और कई बड़े कार्यक्रम लागू किए।
आज जब यह राज्य सत्रह बरस पूरे करके अपने बालिग बरस की तरफ पहला कदम बढ़ा रहा है, तो उसकी सबसे बड़ी कामयाबी के बारे में सोचने की जरूरत है। बहुत से लोगों को इसकी अर्थव्यवस्था, इसके ढांचागत विकास, इसकी प्रतिव्यक्ति आय में बढ़ोतरी सबसे महत्वपूर्ण लग सकती हैं, लेकिन हमारी नजर में इस सरकार के इन तकरीबन चौदह बरसों की सबसे बड़ी कामयाबी प्रदेश में भुखमरी खत्म होना, कुपोषण बहुत हद तक घटना, और शिशु-मृत्युदर, जननी-मृत्युदर में एक बड़ी गिरावट आना है। राज्य बनने के बाद भी भूख से मौत खत्म नहीं हो पाई थी, लेकिन पिछले कई बरस से छत्तीसगढ़ में सरकार की रियायती अनाज की नीति ने छत्तिसगढिय़ों की बेवक्त की मौत को खत्म कर दिया है, और यह सबसे बड़ा सामाजिक विकास है। आर्थिक विकास के आंकड़े सार्वजनिक क्षेत्र की कमाई और कारखानेदारों की कमाई को सबसे गरीब की कमाई के साथ जोड़कर प्रतिव्यक्ति औसत आय दिखा देते हैं। लेकिन वे आंकड़े पूरी तरह फर्जी रहते हैं। ऐसे में खानपान और जीने के केंद्र सरकार, योजना आयोग, सुप्रीम कोर्ट, यूनिसेफ, और संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े भी सही विकास बताते हैं, और इस मोर्चे पर छत्तीसगढ़ में सबसे शानदार तरक्की की है।
दूसरा कामयाब मोर्चा बिजली का है, और यह राज्य पॉवर-सरप्लस राज्य होकर छोटे-छोटे कारीगरों और स्वरोगारियों को कमाई का जितना मौका देता है, उससे भी प्रदेश के लोगों की हालत सुधरी है। साथ-साथ किसानों को पंप के लिए जितनी बिजली मिलती है, उससे भी ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था सुधरी है। लगे हाथों राज्य की धान खरीदी नीति पर भी नजर डालने की जरूरत है जिसकी वजह से किसान बेफिक्र होकर खेत में मेहनत कर पाते हैं। अब राज्य में लगातार लघु वनोपज इकट्ठा करने वाले आधा करोड़ से अधिक लोग ऐसे हैं जिनको तेंदूपत्ता बोनस मिलने जा रहा है, और केंद्र सरकार के समर्थन मूल्य से अधिक दाम पर उनकी वनोपज खरीदी जा रही है। आबादी का इतना बड़ा हिस्सा मौसमी कामकाज से अगर कमाई पाता है, तो वह चाहे शहरी नजरों में न आ पाए, लेकिन उससे इन बेचेहरा, बेनाम लोगों की जिंदगी बदल रही है।
राज्य की इन सत्रह बरसों की तरक्की को याद करने का यह मौका मौजूदा सरकार की स्तुति भी लग सकता है क्योंकि इन सत्रह में से चौदह बरस तो डॉ. रमन सिंह के अकेले के हैं। हम एक-एक योजना को यहां गिनाना नहीं चाहते, लेकिन राज्य के अस्तित्व के संदर्भ में हम यह जरूर कहना चाहते हैं कि इन चौदह बरसों में से दस बरस डॉ. रमन सिंह को ऐसे मिले जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी, और राज्य में उस यूपीए की मुखिया कांगे्रस पार्टी के बड़े दिग्गज नेता सक्रिय थे। इसके बावजूद रमन सिंह को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने ये दस बरस बिना किसी टकराव के, केंद्र के साथ अच्छे समन्वय से गुजार दिए, और राज्य का कोई नुकसान नहीं होने दिया। केंद्र और राज्य के संबंधों में यह बात इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि इन दोनों जगहों पर यह जरूरी नहीं है कि एक ही पार्टी या गठबंधन की सरकारें हों।
आने वाले दिनों में हम राज्य के सत्रह बरस के और अच्छे-बुरे पहलुओं पर चर्चा करेंगे, लेकिन आज सीमित जगह और सीमित समय में हमने उन दो-चार मुद्दों को छुआ है जो हमें सबसे महत्वपूर्ण दिखते हैं, और लगते हैं। बाकी चर्चा आने वाले दिनों में। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार 

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