लोकतंत्र में क्या-क्या न करें, ट्रंप इसकी बेमिसाल मिसाल

संपादकीय
3 नवम्बर 2017


अमरीका में ट्विटर में नौकरी के आखिरी दिन एक कर्मचारी ने राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का ट्विटर अकाऊंट डी-एक्टिवेट कर दिया। बाद में इसे एक गलती बताकर शुरू किया गया, लेकिन ट्विटर ने यह भी माना कि ऐसा लगता है कि यह जान-बूझकर किया गया है। अमरीका में डोनल्ड ट्रंप की हरकतों की वजह से लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। यह जरूर है कि एक बार कोई अमरीकी राष्ट्रपति चुन लिया जाए, तो उसे हटाना आसान नहीं रहता, और जब तक वे कोई ऐसा जुर्म न करें, या कि ऐसा बहुत गलत काम न करें जिस पर वहां की संसद महाभियोग चलाए, और उसके साबित होने पर उन्हें हटाए। ट्रंप जितनी ज्यादती कर रहे हैं, वह है तो बहुत, लेकिन वह महाभियोग की हद तक अभी पहुंच नहीं रही है।
लेकिन ट्रंप को अमरीकी मूल्यों और नीति-सिद्धांतों को कुचलने वाला एक ऐसा नेता बताया जा रहा है जिसके खिलाफ उन्हीं की पार्टी के बड़े-बड़े नेता बयान दे रहे हैं, और खुलकर उनका विरोध कर रहे हैं। लेकिन यहां पर ट्रंप की मानसिकता को समझने की जरूरत है जिनका एक बयान वहां बार-बार टीवी पर आ रहा है और मीडिया में इसका विश्लेषण किया जा रहा है। ट्रंप ने कहा कि वे एफबीआई और न्याय विभाग को लेकर जिस तरह से काम करना चाहते हैं, वे उस तरह से नहीं कर पा रहे हैं, और इसकी वजह से वे बहुत निराश हैं। इस पर जानकार विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का राष्ट्रपति बनने के पहले तक का सारा तजुर्बा महज एक कंपनी चलाने वाले का रहा है, और वे अलग-अलग स्वायत्त और स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं की सरकार से दूरी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वे सब कुछ काबू में करना चाहते हैं, और अमरीका का संविधान इसकी इजाजत नहीं देता है।
अमरीकी राष्ट्रपति वैसे तो दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान माना जाता है, लेकिन उसकी ताकत अमरीका के बाहर अधिक होती है, खुद अमरीका के भीतर अमरीकी राष्ट्रपति पर काबू करने के लिए बहुत सी संवैधानिक संस्थाएं हैं, और उनमें से कुछ आज भी ट्रंप के पूरे दायरे के खिलाफ संसदीय जांच भी कर रही हैं। यहां पर इस चर्चा का मकसद यह नहीं है कि हमारे पाठक सीधे-सीधे अमरीका या ट्रंप से इतने अधिक जुड़े हुए हैं, इस चर्चा का मकसद यह है कि जब बिना तजुर्बे के किसी के हाथ इतनी अधिक ताकत आ जाती है, तो उसे यह समझ नहीं पड़ता कि बहुत सी बातें लोकतंत्र में उसकी ताकत के बाहर भी रहेंगी। यह बात सिर्फ अमरीका के काम की नहीं है, दुनिया के बाकी तमाम देशों को भी, वहां के नेताओं को भी इसे समझना होगा क्योंकि लोकतंत्र किसी को भी बेकाबू ताकतें नहीं देता है, फिर चाहे लोग लोकतंत्र के लचीलेपन का बेजा फायदा उठाकर तमाम ताकतों को अपने हाथ में ही क्यों न ले लें, और मनमाने फैसले क्यों न करें।
दुनिया में लोकतंत्र का इतिहास आनन-फानन अखबारी सुर्खियों की तरह नहीं लिखा जाता। उसे लिखने में थोड़ा सा वक्त लगता है, लेकिन वह सही संदर्भों में नेताओं के फैसलों को दर्ज करता है। इसलिए जिनके हाथ में ताकत कुछ अधिक आ जाती है, उन्हें ताकत को अपने सिर पर नहीं चढऩे देना चाहिए क्योंकि फिर सिर हाथों से कई गलत काम करवाने लगता है, और हथकड़ी सिर में नहीं लगती, हाथोंं में ही लगती है। अमरीका में ट्रंप एक बेमिसाल मिसाल बनकर सामने आए हैं कि लोकतंत्र में क्या-क्या नहीं करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार

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