संपादकीय
2 नवम्बर 2017

सुप्रीम कोर्ट ने कल इस बात पर गहरी निराशा जाहिर की है कि सांसदों और विधायकों पर चलने वाले मुकदमे चलते रह जाते हैं, और वे दो-दो, चार-चार कार्यकाल पूरे भी कर लेते हैं, ऐसे में इन पर मुकदमे चलाने के लिए अलग से अदालतें बनाने की जरूरत है। जजों ने पूछा कि इसके लिए अदालत बनाने और स्टॉफ रखने के मामले में निगरानी खुद सुप्रीम कोर्ट करेगा। अभी केन्द्र सरकार को इस पर अपना रूख रखना है, और इस काम में खासा बड़ा बजट लगेगा इसलिए अदालत की सोच को जमीन पर उतरते हुए वक्त भी लग सकता है, और जुर्मों से घिरी हुईं, और मुजरिमों से भरी हुई पार्टियां हो सकता है कि इसे अदालत की सरकारी नीतियों में दखल मानते हुए इसका विरोध भी करे।
हमें इस बारे में नया कुछ इसलिए नहीं कहना है कि हम बरसों से इस पर लिखते आ रहे हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई जब शुरू की, उसके भी बरसों पहले से हमने यह मांग रखी थी, और इससे आगे बढ़कर यह भी कहा था कि देश के ताकतवर तबके अगर जुर्म करते हैं, तो उनके लिए आम मुजरिमों के मुकाबले अधिक कड़ी सजा का इंतजाम होना चाहिए। यहां पर हम अपने ही कुछ पुराने संपादकीय के हिस्से रखना चाहेंगे, क्योंकि कल के सुप्रीम कोर्ट के रूख पर आज जो कहा जा सकता है, वह सब हम पहले लिख चुके हैं। इसी जगह 2011 में हमने लिखा था-''समाज के ताकतवर तबकों के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिए तेजरफ्तार अदालतें अलग से बनानी चाहिए। हम ऐसे दर्जे में सांसदों के अलावा बड़े अफसरों, संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों और बहुत अधिक दौलतमंद लोगों को भी शामिल करना चाहते हैं क्योंकि कुर्सी और पैसे की ताकत के साथ कोई अपराधी अपने खिलाफ मामले को बहुत दूर तक घसीट सकता है, सुबूतों और गवाहों को प्रभावित कर सकता है, और शिकायतकर्ता को इंसाफ से अपनी पूरी नौकरी या अपनी पूरी जिंदगी दूर रख सकता है। हमने कई बार यह भी सुझाया कि जब ऊपर गिनाए गए तबकों के लोग किसी कमजोर के खिलाफ कोई अपराध करें, तो उसके लिए अलग से कड़क सजा का इंतजाम होना चाहिए। गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों के हक छिनने वाले लोगों के लिए भी अलग से कड़ी सजा का संवैधानिक प्रावधान होना चाहिए। भारत जैसे लोकतंत्र में जहां तरह-तरह की ताकतों से लैस तबके अपने अपराधों के बावजूद बचे रहने में कामयाब रहते हैं और इस असमानता को खत्म करने के लिए तेज रफ्तार अदालतें और वीआईपी दर्जे की अधिक कड़क सजा होनी चाहिए।''
''यह देखकर अच्छा लगता है कि अपनी बहुत मामूली सी कानूनी समझ या प्राकृतिक न्याय अपनी सोच के तहत जो मुद्दे हम बार-बार उठाते हैं उन्हें कुछ बरसों बाद जाकर देश की सबसे बड़ी अदालत तर्कसंगत और न्यायसंगत मानती है। ऐसे और बहुत से मुद्दे रहे हैं जिन्हें हमने बहुत बार उठाया और फिर जो अदालत के रास्ते अमल में आए।''
''बहुत से लोगों को यह लग सकता है कि भारत में न्यायपालिका इन दिनों लोकप्रियता के सैलाब पर तैरते हुए अपने दायरे से कुछ बाहर जा रही है। ऐसा हो भी सकता है। लेकिन ऐसा होने पर भी आज हम मुद्दों के आधार पर लक्ष्मण रेखा को लांघने के तब-तब हिमायती हैं जब-जब सरकार या संसद जैसे लोकतंत्र के दूसरे पाए पूरी तरह नाकामयाब, बेअसर, भ्रष्ट या बदनीयत साबित होते हैं। अपराधियों को संसद और विधानसभाओं के बाहर रखने का मामला ऐसा ही है। कटघरे में खड़े हुए लोगों को अगर संसद और विधानसभाओं में जाने का मौलिक अधिकार है तो देश के लोगों को भी संदिग्ध अभियुक्तों से मुक्त संसदीय व्यवस्था का अधिकार है। जब राजनीतिक दलों, संसद और सरकार, इनकी नीयत ही अपराधियों के पक्ष में है तो अदालती दखल को हम जरूरी मानते हैं। अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग पार्टियों के सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को अगर देखें तो बोफोर्स से लेकर चारा घोटाले तक और अयोध्या से लेकर गुजरात दंगों तक, कर्नाटक की खदानों से लेकर आदर्श घोटाले तक, किस मामले में यह लोकतंत्र दिग्गजों को सजा दे पाता है? और ऐसे लोकतंत्र के चलते अगर देश के आधा दर्जन राज्यों में सबसे लुटे और पिटे हुए लोगों के इलाकों में अगर नक्सली अपने किस्म का इंसाफ थोप रहे हैं तो यह नौबत तो किसी दिन आनी ही थी। इसलिए हम लोकतंत्र के पायों से यह कहना चाहते हैं कि सहूलियतों वाली जिंदगी के साथ-साथ अगर इंसाफ की फिक्र नहीं की जाएगी तो फिर बेइंसाफी के शिकार तबके न सिर्फ माओवादी विचारधारा बल्कि कई दूसरी किस्म की विचारधाराओं पर चलकर या विचारहीन हिंसा से भी अपने किस्म के इंसाफ को सही ठहराने की कोशिश करेंगे।''(Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार
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