क्या राजनीतिक विचारधारा का यौन-हिंसा से लेना-देना है?

संपादकीय
4 नवम्बर 2017


कल तक की एक सक्रिय पत्रकार, और अब एक स्तंभकार ने फेसबुक पर यह पोस्ट किया कि क्या किसी की राजनीतिक विचारधारा उसके बलात्कारी होने की आशंका बढ़ाती है? इस महिला स्तंभकार ने खुद ही अपने इस सवाल को खारिज करते हुए अपनी सोच लिखी है कि कोई भी सेक्स-हिंसा करने वाले हो सकते हैं, और कोई भी उसके शिकार।
आज लिखने को कुछ दूसरे भी मुद्दे हैं, लेकिन उन पर लिखते हुए फिर वही आए दिन की साम्प्रदायिकता-विरोधी बातें लिखना हो जाएगा, इसलिए उससे जरा सा हटकर इस मुद्दे पर सोचना और लिखना बेहतर होगा। जहां तक भारत की राजनीतिक विचारधाराएं हैं, तो वे बुनियादी रूप से या तो धर्मनिरपेक्ष हैं, या फिर वे किसी धर्म से जुड़ी हुई हैं। भाजपा, शिवसेना, अकाली दल, या कुछ मुस्लिम पार्टियां अनिवार्य रूप से, घोषित या अघोषित, किसी न किसी धर्म के साथ हैं, उस धर्म की राजनीति करती हैं। ऐसे में जाहिर है कि उनकी राजनीतिक विचारधारा उनकी अपनी पसंद के धर्म की विचारधारा से बड़ी दूर तक प्रभावित भी होंगी। और अलग-अलग धर्मों से निकलने वाली सोच को देखें, तो तकरीबन सभी का हाल औरतों के बारे में एक सरीखा है। धर्म में औरत की जगह दोयम दर्जे की होती है, और मर्द ही पोप होते हैं, मुल्ला या पुजारी होते हैं, ग्रंथी या भिक्षु होते हैं, संत या महाराज होते हैं, और महिलाएं उन धर्मों में उनके पीछे, उनके नीचे चलने वाली होती हैं। एक-एक करके बहुत से धर्मों में यह साबित हो चुका है कि धर्म के प्रमुख लोगों का रूख महिलाओं के लिए यौन-हिंसा का रहता है, इसलिए हमारा यह पुराना निष्कर्ष है कि धर्म मर्दों को औरत-विरोधी बनाता है, गरीब-विरोधी भी बनाता है, और किसी भी सुधार से लोगों को दूर ले जाता है। ऐसे में जाहिर है कि धर्म महिलाओं के बराबरी के हक के खिलाफ रहता है, और धर्म की राजनीति करने वाले लोग भी महिलाओं की बराबरी के खिलाफ रहते हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दलों में से अधिकतर ऐसे हैं जिन्होंने संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण को कभी हकीकत नहीं बनने दिया, उसके लिए नाटक चाहे जितना किया हो।
ऐसे में जो राजनीतिक विचारधाराएं महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के खिलाफ रहती हैं, वे महिलाओं पर सेक्स-जुल्म करने का खतरा कुछ अधिक रखती हैं। जो पार्टियां महिलाओं को बराबरी का मानती हैं, उनके नेता, उनके कार्यकर्ता, धर्मांध और साम्प्रदायिक पार्टियों के नेताओं-कार्यकर्ताओं के मुकाबले कम बलात्कारी होते होंगे, ऐसा हमारा मानना है। ऐसा मानने के पीछे हमारे पास कोई ठोस आंकड़े नहीं है, लेकिन एक सामान्य समझ यह कहती है कि कट्टरपंथी और धर्मांध राजनीतिक विचारधारा महिलाओं का सम्मान नहीं कर सकतीं। हमने इस किस्म की राजनीतिक ताकतों को निजी स्तर पर ऐसी चर्चा में अधिक हिस्सेदार पाया है जो यह बताती है कि राजनीति में महिलाएं अपनी देह का इस्तेमाल करके ही ऊपर चढ़ती हैं। अब धर्म से जुड़ी, धर्म की राजनीति करने वाली जिन पार्टियों के जो नेता ऐसा सोचते हैं, उनके लिए यह अधिक स्वाभाविक बात भी होगी कि मौका पडऩे पर वे महिलाओं से वैसी ही उम्मीद करने लगें, और फिर वैसा ही बर्ताव भी करने लगें। राजनीति में महिलाओं का देह शोषण राजनीतिक विचारधारा के आधार पर भी अधिक होता होगा, ऐसा हमारा अंदाज है। और इसके पीछे की खास वजह पार्टी का धर्मांध और साम्प्रदायिक होना, धर्म आधारित होना होता होगा।
राजनीति से जुड़े सेक्स-अपराधों के आंकड़ों का विश्लेषण अधिक काम का नहीं होगा क्योंकि अलग-अलग राजनीतिक दलों में सेक्स-हिंसा की शिकायत करने की महिलाओं की सोच भी उस पार्टी की सोच से प्रभावित रहती होगी। जो महिलाएं धर्म के भीतर की ऐसी हिंसा, ऐसे शोषण के खिलाफ मुंह नहीं खोलतीं, वे अपनी उसी धार्मिक सीख का इस्तेमाल राजनीतिक दल में भी करती होंगी। इसलिए लोग चर्चा करके ही इस मुद्दे पर कोई अध्ययन कर सकते हैं कि क्या राजनीतिक विचारधारा का यौन-हिंसा से कोई लेना-देना होता है? (Daily Chhattisgarh)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें