लड़कियों को बलात्कार से बचाने का शिवराज सरकार का यह तरीका शर्मनाक...

संपादकीय
7 नवम्बर 2017


मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में कोचिंग से लौटती एक छात्रा के साथ गैंगरेप के बाद का हादसा उससे कम भयानक नहीं रहा जब पुलिसकर्मी मां-बाप की इस लड़की ने मां-बाप के साथ जाकर रिपोर्ट लिखवाने की कोशिश की, और बीस घंटे तक उसकी रिपोर्ट नहीं लिखी गई। इस मामले में पुलिस का रूख उजागर होने के बाद सरकार का दिल हिल गया, और बहुत से अफसरों को हटा दिया गया। इसके बाद कल सरकार का यह नजरिया सामने आया है कि कोचिंग कक्षाओं से छात्राओं की वापिसी सात बजे तक हो जाए, या फिर कोचिंग सेंटर इन छात्राओं की मोबाइल टेक्नॉलॉजी से मॉनिटरिंग की गारंटी करे।
सरकार की यह सोच और यह इंतजाम केवल यही बताते और साबित करते हैं कि लड़कियों से बलात्कार के लिए मानो लड़कियां ही जिम्मेदार हैं। अगर सरकार गुंडों और बदमाशों पर काबू नहीं कर पा रही है, तो लड़कियों को सात बजे घर के भीतर धकेल दिया जाए। मध्यप्रदेश सरकार की यह सोच हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश की खाप पंचायतों की सोच से अलग नहीं है। होना तो यह चाहिए कि अगर सरकार को यह डर है कि सात बजे के बाद बलात्कारी सक्रिय हो सकते हैं, तो वह तमाम लड़कों को ही सात बजे के बाद उनके घर बिठा दे, बजाय लड़कियों को सात के पहले उनके घर पहुंच जाने को कहने के। ऐसा ही नजरिया बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में सामने आया था, और ऐसा ही नजरिया हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का था जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि जिन लड़कियों को अंधेरे के बाद बाहर निकलना हो, वे नंगी होकर क्यों नहीं निकल जातीं। यह वही सोच है जिसके तहत खाप पंचायतें लड़कियों के जींस को, उनके मोबाइल फोन को बलात्कार के लिए जिम्मेदारी ठहराती हैं। और इनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं रहता कि दिल्ली और गुडगांव से लेकर कर्नाटक तक के स्कूलों में पांच-छह बरस की बच्चियों के साथ क्यों बलात्कार होते हैं? क्या वे अश्लील कपड़े पहनी होती हैं, या कि वे मोबाइल का इस्तेमाल करती हैं, या वे सात बजे के बाद सड़कों पर रहती हैं?
दरअसल हिंदुस्तान की सोच को जब तक पाखंडी कट्टरपंथी मर्दानगी से भरकर रखेंगे, तब तक यहां लड़कियों और महिलाओं से जुल्म और बलात्कार नहीं थमेंगे। पूरी की पूरी सोच ऐसी पुरुषवादी है कि भाषा से लेकर कहावत और मुहावरों तक, गरीब घरों में खाने की प्राथमिकता से लेकर पढ़ाई की प्राथमिकता तक, और कपड़ों से लेकर शादी की पसंद तक लड़की हमेशा दूसरे दर्जे की नागरिक मानी जाती है, और जब तक यह सिलसिला जारी रहेगा, तब तक प्रदेश का मुख्यमंत्री चाहे अपने-आपको हर कन्या का मामा कहता रहे, या कि सरकारी पैसों से कन्यादान किया जाता रहे, ऐसे बलात्कार और ऐसे जुर्म जारी रहेंगे। यह समझने की जरूरत है कि बलात्कार करने वाले तो बदमाश नौजवान थे, लेकिन उसके बाद अपने हिंसक बर्ताव से बलात्कार की शिकार युवती और उसके परिवार के साथ और बलात्कार करने वाले तो सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए वर्दीधारी लोग थे। जब सरकार की अपनी वर्दी की सोच ऐसी हिंसा और मर्दानगी भरी है, तो सात बजे के बाद भी यह पुलिस लड़कियों को क्या बचा लेगी? शिवराज सिंह की सरकार को सिर झुकाकर पूरे प्रदेश की लड़कियों से माफी मांगनी चाहिए, और पूरे प्रदेश की पुलिस के साथ मिलकर एक निर्धारित समय पर सड़क किनारे खड़े होकर दो मिनट के लिए शर्मिंदगी दिखानी चाहिए। देवियों के नाम पर और कन्याओं के नाम पर अंतहीन योजनाओं से प्रदेश की जिंदा देवियां सुरक्षित नहीं हो जातीं, इसके लिए एक संवेदनशील सरकार लगती है क्योंकि एक कट्टर और पुरातनपंथी सरकार की सोच अपनी नागरिक लड़कियों को हमेशा ही पुरुषवादी हिंसा के निशाने पर रखती है। (dailychhattisgarh)
- सुनील कुमार

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