30 सितंबर 2026
सुप्रीम कोर्ट ने अभी भारत में दवाओं के अंधाधुंध और मनमाने दाम छापने के खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई के दौरान बिक्री से दस गुना दाम छापने को ग्राहकों की दिनदहाड़े लूट कहा है, और इसे रंगदारी भी कहा है। अदालत के सामने कुछ दवाओं पर छपे हुए अधिकतम दाम, और बिक्री का असली रेट जब दोनों रखे गए, तो जज यह देखकर हक्का-बक्का रह गए कि कंपनी जो दवा 27 सौ रूपए में दुकानदार को दे रही है, उस पर 27 हजार का एमआरपी छपा है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के दवा और खाद्य नियंत्रक, एक चर्चित आईएएस अफसर ने वहां के अस्पतालों का यह मामला पकड़ा था कि 13 रूपए में मिलने वाली, मरीजों को अक्सर ही चढ़ाई जाने वाली बोतल पर तीन-चार सौ रूपए दाम छापकर अस्पतालों को दिया जाता है, और अस्पताल अपने बिल में वही दाम जोड़ते हैं। सुप्रीम कोर्ट के सामने यह भी आया कि अस्पताल वहां भर्ती मरीजों के लिए बाहर से दवा खरीदने की छूट नहीं देते, और अपने ही दवा दुकान से खरीदने की शर्त रखते हैं। ऐसे में मरीज के पास उसी अस्पताल से दस-बीस या पचास गुना दाम पर दवा खरीदने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता। अदालत में अभी यह मामला भी उठा कि बहुत कम असली दाम वाली दवा दस-बीस या पच्चीस गुना दाम छापकर अस्पताल को दी जाती है, तो सरकारी स्वास्थ्य बीमा के तहत इलाज पाने वाले मरीजों के बिल में भी वही आसमान छूती कीमत दर्ज की जाती है, और इसका भुगतान सरकार को करना पड़ता है। अदालत ने केन्द्र सरकार से पूछा है कि ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता कि दवा पर छपे हुए दाम दुकानदार को लगने वाले रेट से 16 फीसदी अधिक तय कर दिए जाएं, ताकि दुकानदार का मुनाफा तय हो जाए, और अंधाधुंध बढ़ा-चढ़ा दाम मरीजों या सरकार को लूटने के लिए इस्तेमाल न किया जाए।
लेकिन हिन्दुस्तान में दवाओं का कारोबार सिर्फ इस एक जटिलता से भरा हुआ नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हम रियायती दवा खरीदने के लिए जब सरकारी दुकानों पर जाते हैं, तो आमतौर पर छपे हुए दाम के 20-25 फीसदी पैसे लिए जाते हैं। असली दाम से चार या पांच गुना अधिक रेट छापकर उसे फिर 75-80 फीसदी रियायत पर बेचने का यह झांसा किसको निशाना बनाने के लिए दिया जाता है? इन दुकानों पर आमतौर पर गरीब मरीज जाते हैं, और किसी के पास बिल लेने जितना समय नहीं रहता, दुकानों के कर्मचारी अपने कम्प्यूटर पर तिलस्म के अंदाज में हिसाब-किताब करते हैं, और ग्राहक दवा सस्ते में मिल रही जानकर भुगतान करके चले आते हैं। अगर छपे दाम से एक चौथाई या उससे भी कम पर दवा मिल रही है, तो फिर रेट का यह फर्जीवाड़ा शुरू ही क्यों होता है?
एक और भयानक पहलू भारतीय मरीजों के लिए दवाओं को लेकर है। अभी पिछले ही महीने कर्नाटक में कई जगह छापे मारे गए, तो पांच करोड़ से अधिक दाम की नकली, एक्सपायर हो चुकी दवाएं, नकली लेबल, इंजेक्शन भरने की मशीन सब जब्त हुए। जांच में पता लगा कि सस्ती दवाओं को नई शीशियों में भरकर महंगे विदेशी ब्रांड की जीवनरक्षक दवाओं के नाम से बेचा जा रहा था, उन पर नकली क्यूआर कोड भी लगाए गए थे। जांच एजेंसियों के मुताबिक कैंसर और दूसरी जीवनरक्षक दवाओं, आईसीयू में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के नकली इंजेक्शन बेंगलुरू के 90 से अधिक अस्पतालों में बेचे जा रहे थे। अब अगर कैंसर की दवाओं, और संक्रमण को रोकने वाली दवाओं के नाम से नकली दवाएं नामी-गिरामी अस्पतालों में ही मरीजों को लगाई जा रही थीं, तो किसके जिंदा बचने की गुंजाइश बचती है?
इससे परे अभी इसी महीने दिल्ली में रैबीज संक्रमित कुत्तों और दूसरे प्राणियों के काटने पर लगने वाले रैबीज वैक्सीन की नकली खेप पकड़ी गई। इसे बनाने वाली नामी-गिरामी कंपनी, इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड ने कहा कि दवा की यह खेप उसकी बनाई हुई है ही नहीं। अब कुत्ते के काटने पर जिस इंजेक्शन को लगाकर लोगों को लगता है कि वे हाईड्रोफोबिया जैसी मौत से बच जाएंगे, उन्हें नकली दवा लगाने से कितना बड़ा धोखा हो रहा है? इस बारे में कुछ लोग गिरफ्तार हुए हैं, लेकिन याद रखने की बात यह है कि पिछले बरस भी इन्हीं वैक्सीन को नकली बनाकर खपाने के मामले समझ में आए थे, और उस वक्त इसे सप्लाई करने वाली ऑस्ट्रेलिया की कंपनी ने भारत में यह वैक्सीन लगवाने वाले लोगों को सतर्कता जारी की थी कि वे दुबारा कानूनी और असली वैक्सीन लगवाएं। जैसा कि तमाम लोग जानते हैं, और बड़े सामान्य ज्ञान की बात है, ऐसी एंटी रैबीज वैक्सीन अगर समय रहते नहीं लगवाई जाती है, तो बहुत बुरी मौत हो सकती है। इसे भी नकली बनाकर बेचने से हिन्दुस्तानी कारोबारियों को परहेज नहीं है। फिर एक और खतरनाक बात यह है कि ऐसी बेअसर हर दवा नकली हो यह भी जरूरी नहीं है, कई कंपनियां ही ऐसी घटिया दवा और वैक्सीन बनाती हैं जो बहुत हद तक बेअसर रहती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अभी केन्द्र सरकार से यह विचार करने को कहा है कि क्या सभी दवाओं के लिए एमआरपी को दुकानदार के लिए 16 फीसदी कमाई रखकर तय कर देना बेहतर नहीं होगा? आज हमारी व्यक्तिगत जानकारी यह है कि चर्मरोग विशेषज्ञ जैसे कई डॉक्टरों के लिए कंपनियां मामूली फेरबदल वाले ऐसे पैकेट तैयार करती हैं, जिनमें उन डॉक्टरों के कहे हुए दाम छापकर दे दिए जाते हैं। ऐसा और ब्रांचों के डॉक्टरों के लिए भी कंपनियां करती होंगी, और कुछ बरस पहले एक बड़े अखबार ने दवा कंपनियों का स्टिंग ऑपरेशन भी किया था जो कि मनचाहे दाम छापकर दवा देने के लिए तैयार थीं। इनमें डॉक्टर और दवा कंपनी की मिलीभगत से ब्रांड नेम में कुछ ऐसा फेरबदल कर दिया जाता है कि वह दवा सिर्फ उसी डॉक्टर के क्लिनिक में मिल सकती है। इस तरह से मरीज के साथ दर्जनों किस्म के धोखे होते हैं, देखते हैं कि केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट किसे बचाने में कामयाब होते हैं, मरीजों को, अस्पतालों को, या दवा कंपनियों को।




