नकली, घटिया, और दस गुना महंगे दाम छपी दवाओं से मरीजों को बचाने का काम आसान नहीं

30 सितंबर 2026  

 

सुप्रीम कोर्ट ने अभी भारत में दवाओं के अंधाधुंध और मनमाने दाम छापने के खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई के दौरान बिक्री से दस गुना दाम छापने को ग्राहकों की दिनदहाड़े लूट कहा है, और इसे रंगदारी भी कहा है। अदालत के सामने कुछ दवाओं पर छपे हुए अधिकतम दाम, और बिक्री का असली रेट जब दोनों रखे गए, तो जज यह देखकर हक्का-बक्का रह गए कि कंपनी जो दवा 27 सौ रूपए में दुकानदार को दे रही है, उस पर 27 हजार का एमआरपी छपा है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के दवा और खाद्य नियंत्रक, एक चर्चित आईएएस अफसर ने वहां के अस्पतालों का यह मामला पकड़ा था कि 13 रूपए में मिलने वाली, मरीजों को अक्सर ही चढ़ाई जाने वाली बोतल पर तीन-चार सौ रूपए दाम छापकर अस्पतालों को दिया जाता है, और अस्पताल अपने बिल में वही दाम जोड़ते हैं। सुप्रीम कोर्ट के सामने यह भी आया कि अस्पताल वहां भर्ती मरीजों के लिए बाहर से दवा खरीदने की छूट नहीं देते, और अपने ही दवा दुकान से खरीदने की शर्त रखते हैं। ऐसे में मरीज के पास उसी अस्पताल से दस-बीस या पचास गुना दाम पर दवा खरीदने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता। अदालत में अभी यह मामला भी उठा कि बहुत कम असली दाम वाली दवा दस-बीस या पच्चीस गुना दाम छापकर अस्पताल को दी जाती है, तो सरकारी स्वास्थ्य बीमा के तहत इलाज पाने वाले मरीजों के बिल में भी वही आसमान छूती कीमत दर्ज की जाती है, और इसका भुगतान सरकार को करना पड़ता है। अदालत ने केन्द्र सरकार से पूछा है कि ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता कि दवा पर छपे हुए दाम दुकानदार को लगने वाले रेट से 16 फीसदी अधिक तय कर दिए जाएं, ताकि दुकानदार का मुनाफा तय हो जाए, और अंधाधुंध बढ़ा-चढ़ा दाम मरीजों या सरकार को लूटने के लिए इस्तेमाल न किया जाए। 

लेकिन हिन्दुस्तान में दवाओं का कारोबार सिर्फ इस एक जटिलता से भरा हुआ नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हम रियायती दवा खरीदने के लिए जब सरकारी दुकानों पर जाते हैं, तो आमतौर पर छपे हुए दाम के 20-25 फीसदी पैसे लिए जाते हैं। असली दाम से चार या पांच गुना अधिक रेट छापकर उसे फिर 75-80 फीसदी रियायत पर बेचने का यह झांसा किसको निशाना बनाने के लिए दिया जाता है? इन दुकानों पर आमतौर पर गरीब मरीज जाते हैं, और किसी के पास बिल लेने जितना समय नहीं रहता, दुकानों के कर्मचारी अपने कम्प्यूटर पर तिलस्म के अंदाज में हिसाब-किताब करते हैं, और ग्राहक दवा सस्ते में मिल रही जानकर भुगतान करके चले आते हैं। अगर छपे दाम से एक चौथाई या उससे भी कम पर दवा मिल रही है, तो फिर रेट का यह फर्जीवाड़ा शुरू ही क्यों होता है? 

एक और भयानक पहलू भारतीय मरीजों के लिए दवाओं को लेकर है। अभी पिछले ही महीने कर्नाटक में कई जगह छापे मारे गए, तो पांच करोड़ से अधिक दाम की नकली, एक्सपायर हो चुकी दवाएं, नकली लेबल, इंजेक्शन भरने की मशीन सब जब्त हुए। जांच में पता लगा कि सस्ती दवाओं को नई शीशियों में भरकर महंगे विदेशी ब्रांड की जीवनरक्षक दवाओं के नाम से बेचा जा रहा था, उन पर नकली क्यूआर कोड भी लगाए गए थे। जांच एजेंसियों के मुताबिक कैंसर और दूसरी जीवनरक्षक दवाओं, आईसीयू में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के नकली इंजेक्शन बेंगलुरू के 90 से अधिक अस्पतालों में बेचे जा रहे थे। अब अगर कैंसर की दवाओं, और संक्रमण को रोकने वाली दवाओं के नाम से नकली दवाएं नामी-गिरामी अस्पतालों में ही मरीजों को लगाई जा रही थीं, तो किसके जिंदा बचने की गुंजाइश बचती है? 

इससे परे अभी इसी महीने दिल्ली में रैबीज संक्रमित कुत्तों और दूसरे प्राणियों के काटने पर लगने वाले रैबीज वैक्सीन की नकली खेप पकड़ी गई। इसे बनाने वाली नामी-गिरामी कंपनी, इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड ने कहा कि दवा की यह खेप उसकी बनाई हुई है ही नहीं। अब कुत्ते के काटने पर जिस इंजेक्शन को लगाकर लोगों को लगता है कि वे हाईड्रोफोबिया जैसी मौत से बच जाएंगे, उन्हें नकली दवा लगाने से कितना बड़ा धोखा हो रहा है? इस बारे में कुछ लोग गिरफ्तार हुए हैं, लेकिन याद रखने की बात यह है कि पिछले बरस भी इन्हीं वैक्सीन को नकली बनाकर खपाने के मामले समझ में आए थे, और उस वक्त इसे सप्लाई करने वाली ऑस्ट्रेलिया की कंपनी ने भारत में यह वैक्सीन लगवाने वाले लोगों को सतर्कता जारी की थी कि वे दुबारा कानूनी और असली वैक्सीन लगवाएं। जैसा कि तमाम लोग जानते हैं, और बड़े सामान्य ज्ञान की बात है, ऐसी एंटी रैबीज वैक्सीन अगर समय रहते नहीं लगवाई जाती है, तो बहुत बुरी मौत हो सकती है। इसे भी नकली बनाकर बेचने से हिन्दुस्तानी कारोबारियों को परहेज नहीं है। फिर एक और खतरनाक बात यह है कि ऐसी बेअसर हर दवा नकली हो यह भी जरूरी नहीं है, कई कंपनियां ही ऐसी घटिया दवा और वैक्सीन बनाती हैं जो बहुत हद तक बेअसर रहती हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने अभी केन्द्र सरकार से यह विचार करने को कहा है कि क्या सभी दवाओं के लिए एमआरपी को दुकानदार के लिए 16 फीसदी कमाई रखकर तय कर देना बेहतर नहीं होगा? आज हमारी व्यक्तिगत जानकारी यह है कि चर्मरोग विशेषज्ञ जैसे कई डॉक्टरों के लिए कंपनियां मामूली फेरबदल वाले ऐसे पैकेट तैयार करती हैं, जिनमें उन डॉक्टरों के कहे हुए दाम छापकर दे दिए जाते हैं। ऐसा और ब्रांचों के डॉक्टरों के लिए भी कंपनियां करती होंगी, और कुछ बरस पहले एक बड़े अखबार ने दवा कंपनियों का स्टिंग ऑपरेशन भी किया था जो कि मनचाहे दाम छापकर दवा देने के लिए तैयार थीं। इनमें डॉक्टर और दवा कंपनी की मिलीभगत से ब्रांड नेम में कुछ ऐसा फेरबदल कर दिया जाता है कि वह दवा सिर्फ उसी डॉक्टर के क्लिनिक में मिल सकती है। इस तरह से मरीज के साथ दर्जनों किस्म के धोखे होते हैं, देखते हैं कि केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट किसे बचाने में कामयाब होते हैं, मरीजों को, अस्पतालों को, या दवा कंपनियों को।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 28 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

धर्म का यह विकराल स्वरूप क्या भक्तों के भी भले का रह गया है?

 29 सितंबर 2026  

 

हैदराबाद की खबर है कि तेलुगु फिल्मों के एक जाने-माने अभिनेता अल्लू सिरीश ने पुलिस से शिकायत की है कि एक मंदिर में देर रात तक तेज आवाज में संगीत बजाया जा रहा है जिससे बुजुर्गों, बच्चों, और नौकरीपेशा लोगों को बड़ी परेशानी हो रही है। पहले भी कई बार शिकायतें की जा चुकी हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई है। सिरीश ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में वीडियो भी शेयर किया है, और लिखा है कि उन्होंने फिल्म नगर पुलिस स्टेशन में शिकायत की थी, और उनसे 25 सितंबर तक इंतजार करने को कहा गया था क्योंकि गणेश उत्सव चल रहा था। अब त्यौहार खत्म हो गया है लेकिन तेज संगीत बंद नहीं हुआ है। इस पर हैदराबाद पुलिस ने कहा है कि संबंधित थाने को मामला दे दिया गया है। अभी दो-तीन दिन पहले ही मध्यप्रदेश की एक खबर थी कि गणेश विसर्जन के जुलूस में बहुत तेज बजते हुए डीजे की वजह से बगल के कॉलेज में क्लास में बैठी एक छात्रा की मौत हो गई। इसके पहले देश के अलग-अलग हिस्सों में बच्चों, बड़ों, या बूढ़ों, सभी तरह के लोगों की मौतें डीजे के शोरगुल के बीच हो चुकी हैं। दो दिन पहले ही जयपुर का एक वीडियो सामने आया था जिसमें एक मंदिर के भीतर के सीसीटीवी कैमरे में कैद हुआ है कि पड़ोस का एक छात्र आकर पुजारी को बहुत बुरी तरह मार रहा है क्योंकि वह मंदिर के लाउडस्पीकर से थका हुआ था। 

ये कुछ मामले तो अधिक चर्चित होने की वजह से खबरों में आ जाते हैं, लेकिन असल जिंदगी की हालत यह है कि धर्म के नाम पर रात-दिन बजने वाले लाउडस्पीकरों से दूर-दूर तक लोगों का जीना हराम रहता है, उनका सुख-चैन खत्म हो जाता है, वे मानसिक रूप से तनाव में रहते हैं, ब्लडप्रेशर या दिल की बीमारी के खतरे उन पर बढ़ जाते हैं, उनके कानों को खतरा रहता है, नींद कम होने की वजह से उनकी उत्पादकता घट जाती है। दूसरी तरफ यह देखें कि धार्मिक लाउडस्पीकरों से हासिल क्या होता है, तो दिखता है कि एक धर्म के लोग अपने लाउडस्पीकरों के शोर की मार से दूसरे धर्म के लोगों को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं, अपने धर्म के बाहुबल का प्रदर्शन करते हैं। अपने ही धर्म के भीतर भी अलग-अलग धर्मस्थानों, या अलग-अलग धार्मिक आयोजनों से जुड़े हुए सामाजिक या राजनीतिक नेता एक-दूसरे से मुकाबले में भी अपने आयोजनों को और बड़ा करते हैं। और बड़े का यह मुकाबला सार्वजनिक जीवन में परले दर्जे की अराजकता खड़ी कर चुका है। प्रतिमाओं के आकार में मुकाबला होता है, दही-हांडी को बांधने की रस्सी की कितनी ऊपर जा सकती है, इसका मुकाबला होता है, झांकी और लाउडस्पीकर का मुकाबला होता है। अभी पिछले हफ्ते छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस को जाकर रात दो बजे गणेश पंडाल बंद करवाने पड़े ताकि ड्यूटी पर तैनात पुलिसवालों को कुछ घंटों की नींद नसीब हो जाए। शहरों की सडक़ों की क्षमता, लोगों की कानों की क्षमता, आंखों पर पडऩे वाली तरह-तरह की रौशनी को झेलने की क्षमता, चंदा देने की क्षमता, न देने पर नाराजगी और नुकसान झेलने की क्षमता, आज के धार्मिक आयोजन लोगों की क्षमताओं की अग्निपरीक्षा ले रहे हैं। गुजरात का एक वीडियो कुछ दिन पहले था, वहां एक छोटे से आइस्क्रीम पार्लर वाले से उस मोहल्ले के धार्मिक आयोजन के लिए 21 हजार रूपए चंदा मांगा गया, और न देने पर दुकानदार और उसके परिवार की बहुत बुरी तरह पिटाई की गई, और पार्लर को तोडफ़ोड़ दिया गया। जगह-जगह मनमाना चंदा न मिलने पर कारोबारियों या घरेलू लोगों को अंधाधुंध नुकसान पहुंचाने के मामले सामने आते हैं। 

जो लोग किसी भी धर्मस्थान के आसपास रहते हैं, वे लाउडस्पीकरों से रात-दिन यातना झेलते हैं, और इन जगहों पर आने वाले धर्मालु लोगों की भीड़ से, उनकी गाडिय़ों से होने वाले ट्रैफिक जाम से उनकी पूरी जिंदगी ही खराब हो जाती है। यह हर किसी के बस का तो रहता नहीं कि ऐसी जगहों के अपने मकानों को बेचकर दूसरी जगह जा सकें। ऐसे में होने वाले नुकसान की भला क्या भरपाई हो सकती है? फिर यह भी है कि अलग-अलग धर्मों के ऐसे उपासना केन्द्रों के अपने अवैध निर्माण सडक़ों तक आए हुए रहते हैं, सडक़ों के ऊपर भी कंस्ट्रक्शन कर लिया जाता है। एक साइकिल खड़ी करने की जगह भी धर्मस्थान आमतौर पर नहीं छोड़ते। फिर उनके अहाते के बाहर धार्मिक सामग्री बेचने वालों की दुकानों की कतार लग जाती है, भीख मांगने वाले लोगों की कतार लग जाती है, और श्रद्धालुओं की अलग-अलग गाडिय़ां आसपास के पूरे इलाके को घेर लेती हैं। फिर वायु तरंगों पर लाउडस्पीकर का शोर कब्जा कर लेता है, बाहर चलने वाले अलग-अलग धर्मों के भंडारे चारों तरफ लोगों की भीड़ जुटा लेते हैं, और खाना खत्म होने तक चारों तरफ जूठी पत्तलों और गिलासों के ढेर लग जाते हैं। 

अब किसी देश में लोगों का शांति से जीने, शांति से काम करने, अपने घर-दुकान तक बिना रोकटोक आने-जाने, सडक़ों पर चैन से चलने का हक अधिक महत्वपूर्ण है, या कि धार्मिक पाखंड के लिए सार्वजनिक जीवन के हर नियम-कानून को तोडऩा अधिक जरूरी है? जिस वक्त धर्म बने थे, उस वक्त तो अगले हजारों बरस तक लाउडस्पीकर का आविष्कार ही नहीं हुआ था। साइकिलें बनने में भी सैकड़ों बरस तो लगे ही होंगे, और इसलिए मंदिर-मस्जिद, या किसी और धर्मस्थल पर लोग पैदल ही आते-जाते रहे होंगे। उस वक्त की सीमित आबादी, बिना बिजली, बिना लाउडस्पीकर, बिना पटाखों और आतिशबाजी के अमन-चैन से धार्मिक आयोजन होते रहे होंगे, और शायद ही किसी की मौत मंदिर के भजन, या मस्जिद की अजान से हुई होगी। आज तो हिन्दुस्तान के शहरों में कोई भी धार्मिक त्यौहार आते ही उन सारे इलाकों के लोग दहशत में आ जाते हैं जहां से होकर धार्मिक जुलूस गुजरते हैं। 

अब गणेशोत्सव या दुर्गोत्सव जैसे त्यौहारों की बात करें, जिनमें प्रतिमाओं की ऊंचाई का मुकाबला चलते रहता है, तो अभी ऐसे कई वीडियो सामने आए जिसमें बहुत ऊंची गणेश प्रतिमा को लाते या ले जाते हुए उस प्रतिमा की ऊंचाई तक पहुंचकर लोग रास्ते के सारे टेलीफोन, केबल, या इंटरनेट के तार काटते चले जा रहे थे। एक-एक प्रतिमा के लिए ऐसे दर्जनों तार काटे जा रहे थे। अब इनसे इस पूरे रास्ते में रहने और काम करने वाले लोगों की जिंदगी और कामकाज की जो बर्बादी होगी, उसकी भरपाई कौन से ईश्वर कर सकेंगे? फिर ऐसे दर्जनों वीडियो सामने आए हैं जिसमें क्रेन से पानी में गिराई जाती प्रतिमाएं पुलों की रेलिंग पर ही टूटकर चकनाचूर हो रही हैं, या लोग प्रतिमाओं के ऊपर चढ़-चढक़र उन्हें पानी में बांस से दबाकर डुबाने की कोशिश कर रहे हैं। आज चारों तरफ नदियों में बाढ़ आई हुई है, और हर बरस नदी के किनारे के हजारों-लाखों गांव-शहर की प्रतिमाएं उनमें डुबा-डुबाकर उन्हें पाटा जा रहा है, और कोई हैरानी नहीं कि इससे भी बाढ़ बढ़ रही हो, प्रदूषण तो बढ़ ही रहा है। 

धर्म ने अपने आपको तर्क और विज्ञान से, नियमों और संविधान से, सभी से ऊपर कर लिया है। एक दिन इंसान ने अपने इस्तेमाल के लिए धर्म बनाया था, आज धर्म बेकाबू एआई की तरह बेकाबू हो चुका है, और वह इंसानों का इस्तेमाल अपने आपको महिमामंडित करने के लिए कर रहा है। यह महिमामंडन इंसानों की जिंदगी, पर्यावरण, सभी का अपार नुकसान कर रहा है, और धर्मों के बीच की, अलग-अलग धर्म के भीतर की यह दौड़ जाने कहां तक पहुंचेगी।

(Daily Chhattisgarh)   

विनाशकारी बाढ़ से तबाही रोकना तो आसान नहीं लेकिन उसे घटाना फिर भी मुमकिन है

28 सितंबर 2026  

 

देश के बहुत से प्रदेशों में तूफानी बारिश की वजह से नदी-नालों में बाढ़ आ गई है। जगह-जगह लोग मारे जा रहे हैं, लेकिन लोगों का हौसला है कि ऐसे में भी उफनती नदियों में गणेश विसर्जन में लगे हुए हैं, पूजा के नारियल निकालने के लिए कूद रहे हैं, पुलों के ऊपर आ चुके खतरनाक स्तर के पानी में से भी बस निकाल रहे हैं। यह बात जगजाहिर है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम की सबसे बुरी मार, और अधिक बुरी होती जा रही है, और बार-बार आ रही है। लेकिन वह तो एक बड़ा मुद्दा है, कुछ दूसरे छोटे-छोटे मुद्दे भी हैं जिन पर सरकार और समाज दोनों को गौर करने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन को रोक पाना किसी एक सरकार के हाथ में नहीं है, अभी नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ को लेकर उसने दुनिया के देशों से एक मुआवजा मांगा है कि पर्यावरण बिगाडऩे में उसका योगदान सबसे ही कम है, लेकिन दुनिया के जिन दूसरे देशों ने पर्यावरण सबसे अधिक बिगाड़ा है, उनकी वजह से नेपाल में यह बाढ़ आई है। यह व्यापक बहस तो वैश्विक स्तर पर चलती ही रहेगी, लेकिन देश-प्रदेश की सरकारें अपने स्तर पर भी बाढ़ नियंत्रण के लिए कुछ कर सकती हैं। 

हमने इसी अखबार के इस संपादकीय कॉलम में बीते दशकों में कई बार यह लिखा है कि नदियों में पानी जहां से आता है, उस कैचमेंट एरिया कहे जाने वाले इलाके में जगह-जगह बड़े-बड़े जलाशय बनाए जाने चाहिए। ये जलाशय इंसानों के इस्तेमाल के हिसाब से न बनें, ये धरती से निकाले गए पानी की भरपाई करने के लिए बनें। ऐसे री-चार्ज जलाशय अगर नदियों तक पहुंचने वाले पानी को रोक सकेंगे, तो नदियों में बाढ़ में कुछ कमी आएगी। किसी भी प्रदेश में नदी में किसी एक जगह से पानी नहीं आता, उसकी दिशा के साथ-साथ दोनों तरफ की जमीनों से पानी बहकर आता है, और उस पानी को रोकने का कुछ इंतजाम अलग-अलग स्थानीय तरीकों से किया जा सकता है। 

अब हम पर्यावरण की उतनी जटिल बातों पर अभी जाना नहीं चाहते कि नदियों के किनारे पेड़ों की कटाई होने से उनकी जड़ों के आसपास की मिट्टी बहकर नदियों में पहुंचती है, और वहां गाद बनकर पानी की गहराई को कम कर देती है, इससे भी बाढ़ आती है। हम एक आसान सा तरीका सुझा रहे हैं कि नदियों में जहां-जहां से बहकर पानी बड़ी मात्रा में आता है, ऐसे नालों के किनारे बड़े-बड़े जलाशय इतने गहरे बनाने चाहिए कि वे बहुत सारा पानी समा सकें। इन नालों का पानी इन जलाशयों में जाए, और इनके भरने के बाद ही वह नदी तक जाए। नदी की पूरी लंबाई में अगर किनारे की खाली जमीनों पर तेजी से ऐसे गहरे जलाशय बनाए जाएंगे, तो बाढ़ का खतरा कुछ हद तक कम होगा, और धरती के भीतर के पानी की बहुत हद तक भरपाई भी हो सकेगी। अभी सरकार की तालाबों की जितनी योजनाएं हैं, वे इंसानों, और मवेशियों के निस्तारी के मकसद पूरे करने के लिए हैं। लेकिन इनसे धरती के भीतर खाली होते हुए पेट को वापिस भरना कम हो पाता है। सरकार की योजनाओं में आबादी के आसपास ही तालाब गहरीकरण, या तालाब बनाना होता है, ताकि उनका उपयोग हो सके। इस नजरिए को बदलकर भूजल री-चार्ज के इकलौते मकसद से भी अगर बंजर जमीनों पर बड़े-बड़े गहरे जलाशय बनाए जाएंगे, तो उससे भी लगातार गिरता हुआ भूजल स्तर संभलेगा। आज जमीन के नीचे जितनी अधिक गहराई से पानी निकालना पड़ता है, उस पर उतनी ही अधिक बिजली खर्च होती है। इसलिए जलस्तर ऊपर आने पर बिजली की बचत होगी, और परोक्ष रूप से कोयले से चलने वाले बिजलीघरों से बर्बाद होने वाला पर्यावरण भी कुछ हद तक बच सकेगा। 

फिर शहरीकरण हो, या कि ग्रामीण बसाहट, इन दोनों में ही पानी के खतरे को अनदेखा किया जाता है। शहरों के बीच कई बस्तियां हर बरस पानी में डूबती हैं, हर बरस लोगों के सामानों की बर्बादी होती है, लेकिन शहरीकरण के जिम्मेदार विभाग इस अराजक विकास और विस्तार को नहीं रोक पाते, क्योंकि अवैध कॉलोनियां, अवैध निर्माण लोकप्रिय काम रहते हैं, और इन पर बसने वाले लोगों के वोट पाने के लिए राजनेता इन्हें बढ़ावा भी देते हैं। सरकारी नियमों को तोडक़र यहां तक सडक़, नाली, पानी, और बिजली का इंतजाम भी कर दिया जाता है। लेकिन जब मौसम की मार इन निचले इलाकों को डुबाती है, तो शहरों के बीच भी सरकारी अमले को नाव से लोगों को निकालना पड़ता है। इसलिए अगर किसी सरकार में शहरीकरण और बसाहट को नियमित करने का कलेजा हो, तो किसी जगह लोगों की बस्तियां बनने के पहले ही उसे रोकना चाहिए कि हर बरस जिनके डूब जाने की गारंटी हो, वहां पर लोगों को बसने ही क्यों दिया जाए? 

नदियों की बाढ़ पर कुछ काबू पाने के लिए भारत में एक बहुत बड़ी, नदीजोड़ नाम की विकराल योजना बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार दोनों के एकमत होने से यह योजना आगे बढऩा तय है। इसका मकसद यह है कि जिन इलाकों में लगातार बाढ़ आती है, वहां से नदियों के रास्ते अतिरिक्त पानी को उन इलाकों में ले जाया जाए, जहां पानी की जरूरत रहती है। अभी कुछ ताजा पर्यावरण रिपोर्ट यह कहती हैं कि नदियों का मिजाज भी बदल रहा है। जिन महीनों में जिन नदियों में बाढ़ आती थी, उन महीनों में वहां सूखा पडऩे लगा है, और जहां सूखा पड़ता था, वहां बाढ़ आने लगी है, ऐसे में नदीजोड़ योजना से बाढ़ की दिक्कत कितनी कम होगी, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। फिर भी राज्य सरकारों को चाहिए कि जब तक नदीजोड़ जैसी बड़ी योजना से बाढ़ में काबू में न हो, तब तक वे अपने प्रदेशों की नदियों के किनारे जहां-जहां सूखे, उथले, बसाहट वाले, या जंगलों के बीच भी, जहां जैसे जलाशय बन सकें, उन्हें बनवाना चाहिए। विशाल री-चार्ज जलाशय बनवाते हुए मजदूरों को रोजगार देने को अनिवार्य प्राथमिकता नहीं रखना चाहिए, बल्कि बड़ी-बड़ी दानवाकार मशीनें अगर तेजी से ऐसे जलाशय खोद सकेंगी, तो बारिश के बीच के महीनों में तो नहीं, आने वाले बरसों में जरूर बाढ़ कुछ हद तक काबू में आ सकती है, और भूजल में तो शर्तिया ही सुधार होगा। यह हर पहलू से सरकार के लिए जीत का एक सौदा रहेगा, बारिश के पानी को जितना सहेज सकें, वह धरती को बचाएगा, और बाढ़ को घटाएगा।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 28 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 27 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

एआई नाम की बिना ब्रेक की गाड़ी घाटी की ढलान पर उतरना शुरू कर चुकी है

  27 सितंबर 2026

दुनिया के एक बड़े टेक्नॉलॉजी कारोबारी बिल गेट्स ने अभी कहा है कि अगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गलत लोगों के हाथ में पड़ गया तो वह 100 करोड़ लोगों की जान जाने की वजह बन सकता है। एआई के अपने आप जानलेवा या विनाशकारी हो जाने का खतरा अपनी जगह है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि इंसान ही एआई नाम के इस बेहद ताकतवर औजार को हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगे तो क्या होगा। एआई ऐसे हमलावरों को दुनिया को चलाने वाले सिस्टम की कमजोरियां खोजने में मदद कर सकता है। अस्पताल, वित्तीय संस्थान, बिजली के ग्रिड और दूसरे सरकारी सिस्टम निशाने पर आ सकते हैं। अब तक तबाही मचाने वाले लोगों के हाथ में ऐसा औजार नहीं था जो कुछ ही पल में दुनिया भर की जानकारी को खंगाल सके, किसी सिस्टम की कमजोरी खोज सके और उस कमजोरी का इस्तेमाल करने का तरीका सुझा सके। ऑस्ट्रेलिया में अभी जो हुआ, वह इसी खतरे की एक मिसाल है। वहां एआई एजेंट ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी वेबसाइट में अनधिकृत तरीके से प्रवेश कर गैर-सार्वजनिक फाइलों तक पहुंच बना ली। अमेरिकी सरकारी वेबसाइटों से जुड़े ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें एआई एजेंटों ने इंटरनेट पर मिले लॉग-इन विवरणों का इस्तेमाल करके ऐसी जगहों तक पहुंच बनाई जहां उसे नहीं जाना चाहिए था। इन घटनाओं में हर मामले को पारंपरिक अर्थ में ‘हैकिंग’ कहना शायद सही न हो, लेकिन यह जरूर साफ हो रहा है कि एआई एजेंट अपने दिए हुए काम को पूरा करने के लिए ऐसे रास्ते अपना सकते हैं जिनकी कल्पना उनके बनाने वालों ने भी नहीं की थी।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विकसित करने वाली कंपनियों और विशेषज्ञों के बीच अब यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इसके विकास की रफ्तार कम करने की जरूरत है। आज एआई जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, उसी रफ्तार से उससे बचाव के तरीके नहीं बन रहे हैं। इसे कुछ इस तरह समझिए कि कार की रफ्तार लगातार बढ़ाने की टेक्नॉलॉजी बन रही हो, लेकिन सीट बेल्ट पूरी तरह तैयार न हुई हो, टक्कर के समय खुलने वाले एयरबैग भरोसेमंद न बने हों और ब्रेक के बारे में यह उम्मीद की जा रही हो कि कार के बहुत तेज भागने के पहले तक वे भी तैयार हो जाएंगे। यह ऐसी दौड़ है जिसमें गाड़ी बहुत तेजी से उस पहाड़ी की तरफ बढ़ रही है जिसके नीचे गिरने का खतरा है और उम्मीद यह की जा रही है कि जब तक हम नीचे पहुंचेंगे तब तक जाल बुन लिया जाएगा। लेकिन एआई से होने वाले सीधे हमले और साइबर अपराध को कुछ देर के लिए किनारे रख दें तो एक और बड़ा खतरा दिखाई देता है, एआई इंसान की अपनी सोच और फैसले की जगह लेना शुरू कर सकता है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि एआई गलत जवाब देता है; सवाल यह है कि अगर न्याय जैसे क्षेत्र में इंसान अपनी सोच और विवेक की जगह मशीन के तैयार किए हुए शब्दों पर निर्भर होने लगे तो फैसला आखिर किसका रह जाएगा।

यह खतरा काल्पनिक भी नहीं है। अदालतों में एआई से तैयार की गई ऐसी सामग्री के मामले सामने आ चुके हैं जिसमें ऐसे मुकदमों और फैसलों का हवाला दिया गया जो वास्तव में कभी अस्तित्व में थे ही नहीं। एआई शानदार भाषा में जवाब तैयार कर सकता है, लेकिन उसकी सबसे खतरनाक खूबी यही है कि वह गलती भी पूरे आत्मविश्वास के साथ कर सकता है। हमने खुद अभी पिछले ही हफ्ते इसका अनुभव किया। ओडिशा के एक मजदूर परिवार के 5 बच्चों ने नीट में कामयाबी हासिल की और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पाया। इस मामले पर हमने ‘इंडिया-आजकल’ के लिए एक यू-ट्यूब वीडियो बनाया था। इसकी रिसर्च के दौरान एक लोकप्रिय एआई टूल से इस मामले की जानकारी मांगी गई तो उसने एक दूसरा, लगभग फिल्मी कहानी जैसा मामला बता दिया। उसने कहा कि ओडिशा के ही एक गरीब परिवार के 5 बच्चों को नीट के जरिए 5 अलग-अलग सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला मिला है। परिवार का नाम, बच्चों के नाम, मेडिकल कॉलेजों के नाम, सब कुछ मौजूद था। हमें लगा कि जैसे एक ही राज्य में 2 गरीब मजदूर परिवारों के 5-5 बच्चों ने बिल्कुल एक जैसी असाधारण कामयाबी हासिल की हो। पहला मामला तो देश के कई प्रतिष्ठित अखबारों और एक बड़ी समाचार एजेंसी में प्रकाशित हो चुका था, लेकिन दूसरे मामले को जब हमने 3 दूसरे एआई टूल के जरिए खोजा तो तीनों ने कहा कि ऐसा कोई मामला उन्हें नहीं मिला। जब हमने ये नतीजे पहले एआई के सामने रखे तो उसने अपनी गलती मान ली और कहा कि उसने दूसरी कहानी गढ़ दी थी। अब अगर हमने बिना जांचे उस कहानी को सच मान लिया होता तो एआई का कुछ नहीं बिगड़ता, हमारी विश्वसनीयता मिट्टी में मिल जाती।

लेकिन बात सिर्फ किसी पत्रकार की विश्वसनीयता तक सीमित नहीं है। आज एआई को प्रशिक्षित करने के लिए इंटरनेट पर मौजूद जिस जानकारी का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसका एक बढ़ता हुआ हिस्सा खुद एआई द्वारा तैयार किया हुआ है। यानी एआई ने सच या झूठ, जैसी भी जानकारी पैदा की है, वह इंटरनेट पर आगे फैल रही है और भविष्य में उसी से अगली पीढ़ी के एआई मॉडल सीख सकते हैं। अगर एआई के गढ़े हुए झूठ लगातार इंटरनेट पर जमा होते गए और फिर उन्हीं झूठों से नए मॉडल प्रशिक्षित होते गए तो मशीन की गलती एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच सकती है। इसे लेकर वैज्ञानिकों ने ‘मॉडल कोलैप्स’ जैसी आशंकाओं पर शोध भी किया है। इसके साथ एक और खतरा है, मौलिक सोच का धीरे-धीरे कम होना। गाय पर निबंध लिखते हुए कभी बच्चे को गाय के शरीर की कल्पना करनी पड़ती थी, 2 सींग, 4 पैर, एक पूंछ याद करनी पड़ती थी और फिर अपने शब्दों में लिखना पड़ता था। लिखते हुए गलती होती थी, वाक्य दोबारा लिखना पड़ता था, लेकिन उस पूरी प्रक्रिया में बच्चे सोचते थे. आज सिर्फ लिख दीजिए, ‘गाय पर निबंध लिखिए’, और कुछ ही सेकंड में भाषा, व्याकरण और संरचना के लिहाज से उससे कहीं बेहतर निबंध सामने आ जाता है। यह बहुत बड़ी सुविधा है, लेकिन हर सुविधा की एक कीमत होती है। अगर इंसान अपनी सोचने, खोजने और लिखने की मेहनत धीरे-धीरे एआई को सौंपते गए तो कहीं ऐसा न हो कि एआई हमारी जगह सिर्फ लिखने न लगे, बल्कि हमारी जगह सोचने भी लगे।

और जैविक खतरे की बात इससे भी आगे जाती है। यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि एआई निश्चित रूप से कोरोना से हजार या लाख गुना खतरनाक वायरस बना देगा। लेकिन यह आशंका गंभीर है कि जैसे-जैसे एआई जैव-विज्ञान, दवा-विज्ञान और प्रयोगशाला संबंधी ज्ञान को समझने और इस्तेमाल करने में सक्षम होता जाएगा, वैसे-वैसे किसी दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति के लिए खतरनाक जैविक प्रयोगों की योजना बनाना आसान हो सकता है। खतरा केवल किसी वायरस को बनाने तक सीमित नहीं होगा। अगर कभी कोई बेहद खतरनाक जैविक एजेंट तैयार किया गया तो उसे दुनिया के सबसे नाजुक हिस्सों तक कैसे पहुंचाया जाए, किस तरह तेजी से फैलाया जाए और किन जगहों पर उसका असर सबसे ज्यादा होगा, ऐसी रणनीति बनाने में भी एआई का इस्तेमाल हो सकता है। यह अभी आशंका है, कोई स्थापित तथ्य नहीं, लेकिन तकनीक की ताकत जिस रफ्तार से बढ़ रही है उसके साथ ऐसी आशंकाओं पर गंभीरता से सोचना जरूरी है। हम पिछले दो-तीन दशकों से इंटरनेट और हैकिंग की ताकतों के गलत हाथों में जाने की आशंका देखते रहे हैं। हमने एक-दो दशक पहले तक ऐसी संभावनाएं भी लिखी थीं कि दुनिया में सबसे ज्यादा विमान उड़ाने वाले या सबसे ज्यादा बिजली इस्तेमाल करने वाले तबकों की सुविधाओं को किसी दिन हैकर ठप्प कर सकते हैं। तब हमें एआई नाम के इस नए औजार की आज जैसी ताकत का अंदाजा नहीं था। अब जब उसी पुरानी आशंका को एआई के साथ जोडक़र देखते हैं तो तस्वीर कहीं ज्यादा बड़ी दिखाई देती है।

एक तरफ इंसान ने ऐसा औजार बना लिया है जो दुनिया के विशाल ज्ञान को कुछ ही पल में खोज सकता है, जोड़ सकता है, उसका विश्लेषण कर सकता है और उसके आधार पर नई सामग्री तैयार कर सकता है। दूसरी तरफ वही औजार किसी गलत हाथ में पडक़र दुनिया की कमजोरियों को खोजने में मदद कर सकता है। तीसरी तरफ वही औजार धीरे-धीरे इंसान की अपनी सोच, अपनी खोज और अपनी मौलिकता की जगह ले सकता है। यानी एआई का खतरा सिर्फ यह नहीं है कि मशीन कभी इंसान के खिलाफ हो जाए। खतरा यह भी है कि इंसान ही मशीन को इंसान के खिलाफ इस्तेमाल करने लगे। और एक खतरा यह भी है कि मशीन की सुविधा लेते-लेते इंसान खुद सोचना कम कर दे। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि एआई कितना शक्तिशाली हो सकता है। सवाल यह भी है कि उसकी शक्ति बढऩे की रफ्तार के साथ हमारी जिम्मेदारी, हमारी सावधानी और हमारे सुरक्षा इंतजाम कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं। अगर दुनिया सचमुच एक बहुत तेज रफ्तार गाड़ी में बैठी है तो सवाल सिर्फ यह नहीं कि इंजन कितना शक्तिशाली है। सवाल यह है कि ब्रेक हैं भी या नहीं। सच तो यह है कि एआई नाम की बिना ब्रेक की गाड़ी अब घाटी की ढलान पार उतरना शुरू कर चुकी है।

अब इस बात को खत्म करना भी जरूरी है, वरना खतरों की ऐसी फेहरिस्त खत्म होने वाली नहीं है। आज की सीख शायद वही है जो दुनिया के दार्शनिक सैकड़ों बरस से कहते आए हैं, दुनिया पल भर का मेला है। इस पल भर की जिंदगी में सब कुछ खत्म हो जाने के पहले कम से कम कुछ ऐसा अच्छा कर लिया जाए, जिसे दर्ज करने वाला कोई शायद न भी बचे, लेकिन अपने ही कलेजे में यह ठंडक रहे कि हमने कुछ भला किया था। और जिंदगी में अगली बार भला करने का कोई मौका सामने आए तो इतना जरूर सोच लें, क्या पता, भला करने का यह आखिरी मौका हो।

(Daily Chhattisgarh)  

रोजगार के लिए दूसरे प्रदेश, बच्चों से लेकर बड़े तक हो रहे शोषण के शिकार...

 27 सितंबर 2026  

 

बिहार के भोजपुर जिले में अभी नाबालिगों के तरह-तरह के शोषण करवाने वालों पर पुलिस ने छापा मारा, तो ऑर्केस्ट्रा और पार्टियों में नाचने के लिए रखी गई लड़कियों में छत्तीसगढ़ की तीन नाबालिग लड़कियां भी मिली हैं। उन्हें वहां भेजने वाली जांजगीर-चांपा जिले की सलमा बेगम नाम की एक महिला को भी गिरफ्तार किया गया है। इन बच्चियों से डांस करवाया जा रहा था, लेकिन इन्हें कोई मजदूरी नहीं दी जा रही थी। पिछले बरस भी छत्तीसगढ़ के कुछ दूसरे जिलों से बिहार के कुछ दूसरे जिलों में ले जाई गई कुछ नाबालिग लड़कियां बरामद की गई थीं, जिन्हें उनके परिवार वालों ने ही डांस करने की मजदूरी के लिए वहां भेजा था। जैसा कि पहली नजर में ही समझ पड़ता है कि इन नाबालिग लड़कियों को तरह-तरह का शोषण झेलना पड़ता है। अब कुछ जातियों में लड़कियों को नाच-गाने के पेशे में डालने की परंपरा रहती है। यह मध्यप्रदेश और राजस्थान के आदिवासी इलाकों में और अधिक है। इन दोनों राज्यों में तो यह सिलसिला बदन बेचने तक चले जाता है, और उसे उनके समाज में बुरा भी नहीं माना जाता। छत्तीसगढ़ में ऐसा कोई व्यापक चलन किसी जाति में नहीं है, लेकिन एक जाति में लड़कियों को नाचने के काम में लगाने की परंपरा है। 

अब दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के ही महासमुंद जिले में दो दिन पहले पुलिस ने मानव तस्करी के एक बड़े संगठित नेटवर्क का भांडाफोड़ किया। इसमें छत्तीसगढ़ और ओडिशा में काम कर रहे इस गिरोह से करीब डेढ़ करोड़ रुपये नगद बरामद किए गए और पांच लोग गिरफ्तार हुए। एक नाबालिग लडक़ी की तस्करी, और उसके गर्भवती होने से शुरू हुई जांच यहां तक पहुंची। इस गिरोह के लोग कमजोर परिवारों के लोगों के एडवांस रकम देकर फंसाते थे, और दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए भेजते थे। इनके पास से ऐसे हजारों मजदूरों के रिकॉर्ड मिले हैं, और बंधवा मजदूरी के सुबूत भी मिले हैं। गिरफ्तार होने वालों में चंद्राकर, मोहंती, अग्रवाल, गुप्ता, जैसे कई जातियों के लोग हैं। ये लोग मजदूरों के बैंक खातों को भी अपने कब्जे में रखते थे, और एटीएम कार्ड, आधार कार्ड जैसे दूसरे दस्तावेज भी। इन सबके बिना ये मजदूर दूसरे राज्यों में आबादी से दूर ईंटभट्ठों पर बंधुवा मजदूर रह जाते थे।

न सिर्फ छत्तीसगढ़, बल्कि किसी भी राज्य को ऐसी खबरों को एक बड़ी बीमारी का छोटा लक्षण मानना चाहिए, और सुधार की कोशिश करनी चाहिए। क्या राज्य में मजदूरी की चल रही योजनाओं में कोई कमी है कि लोगों को दूसरे प्रदेश जाना पड़ता है? अगर लोग अधिक महत्वाकांक्षी होकर बेहतर मजदूरी, या अधिक ठेका मजदूरी के लिए दूसरे राज्य जाते हैं, तब तो ठीक है, लेकिन अगर अपने ही राज्य में काम की कमी से वे बेबसी में बाहर जाते हैं, तो यह राज्य को अपना घर संभालने का एक मौका है। दूसरी तरफ बच्चों को महानगरों में घरेलू कामकाज के लिए ले जाना, पढ़े-लिखे बच्चों को नौकरी के नाम पर ले जाना, और फिर वहां उन्हें स्पा सेंटर से होते हुए देह के धंधे में धकेल देना राज्य के लिए शर्मनाक रहता है। ऐसे हर मामले से राज्य को यह मौका मिलता है कि वह मानव तस्करी करने वाले संगठित मुजरिमों पर कार्रवाई कर सके। किसी भी गांव, जाति, या समुदाय के लोगों का बाहर जाना दबे-छुपे नहीं होता, उसकी जानकारी काफी लोगों को रहती है। अगर स्थानीय पुलिस और सरकारी अमला अपनी आंखें खुली रखें तो ये जानकारियां शोषण का शिकार होने के पहले ही, छत्तीसगढ़ से बाहर जाने के पहले ही सरकार के हाथ लग सकती है। समय रहते सरकार की कार्रवाई होने से  लोगों का शोषण होना रूक सकता है।

इस सवाल पर अब केंद्र और राज्य सरकारों के सामने पहले से ज्यादा साफ कसौटी भी है। मनरेगा की जगह 1 जुलाई से लागू हुए विकसित भारत-जी राम जी कानून में ग्रामीण परिवारों को एक साल में 125 दिन के रोजगार की वैधानिक गारंटी दी गई है, यानी रोजगार की गारंटी पहले के 100 दिनों से बढ़ाई गई है। छत्तीसगढ़ में भी इस कानून के तहत ग्रामीण रोजगार के लिए बड़ी राशि का प्रावधान किया गया है। अब असली सवाल यह है कि क्या गांव के जिस परिवार का कोई सदस्य मजबूरी में बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र या तेलंगाना की ईंट- भट्ठी तक पहुंच रहा है, उसे अपने ही गांव में इस रोजगार गारंटी का लाभ मिल रहा है? अगर काम मांगने वाले परिवार को समय पर काम मिले, मजदूरी समय पर खाते में पहुंचे और पंचायत स्तर पर यह पता चलता रहे कि कौन परिवार बाहर जा रहा है, तो रोजगार के नाम पर होने वाली मानव तस्करी की एक बड़ी जमीन अपने आप कमजोर हो सकती है। कानून सिर्फ रोजगार देने का इंतजाम नहीं है, उसे गांव से मजबूरी में होने वाले मजदूरी-प्रवास और उसके साथ जुड़ते शोषण को रोकने का एक औजार भी बनाया जा सकता है। इसके लिए सरकार को यह देखना होगा कि कागज पर दर्ज 125 दिनों की गारंटी गांव के गरीब परिवार की जिंदगी में सचमुच 125 दिन का काम बन रही है या नहीं।

दूसरी बात यह कि बच्चों से मजदूरी, चाहे वह राज्य के भीतर हो, चाहे प्रदेश के बाहर ले जाकर, वह सरकार और समाज की असफलता इसलिए रहती है कि केंद्र और राज्य सरकारों की पर्याप्त योजनाएं हैं कि हर बच्चे-बच्ची को स्कूल-कॉलेज में पढ़ाया जाए। इसके बावजूद जब बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं, तो उसका एक मतलब यह रहता है कि वे परिवार के किसी कामकाज में लगा दिए जाते हैं, या परिवार उन्हें किसी दूसरी जगह मजदूरी पर लगा देता है। उसका दूसरा मतलब यह हो सकता है कि ऐसे बच्चे आवारा हो गए हैं, और घर से भी परे हो गए हैं, कोई काम भी नहीं करते हैं। इन बच्चों का नशे और जुर्म में फंस जाने का खतरा बहुत बड़ा रहता है। इन दिनों समाज में लगातार नाबालिग बच्चे हर किस्म के संगीन जुर्म में शामिल मिल रहे हैं, और इनमें एक बड़ा हिस्सा पढ़ाई छोड़े हुए बच्चों का रहता है। इसलिए जब कभी बच्चों से जुड़ा हुआ कोई मामला सामने आता है, तो उससे सरकार की असफलता भी पता लगती है, और सरकार को अपना घर सुधारने का मौका भी मिलता है।  जिन राज्यों में भी कुछ जातियों में लड़कियों और महिलाओं को नाच-गाने से लेकर देह के धंधे तक में लगा देने की सामाजिक परंपरा है, उन्हें भी सुधारने की जरूरत है। इसके लिए उन जातियों में कोई सम्माननीय रोजगार या कारोबार शुरू करने के लिए लोगों को तैयार करना पड़ेगा, और इसके लिए भी सरकारों के पास पर्याप्त योजनाएं हैं, बजट हैं। 

नाबालिग बच्चों का मामला बहुत खतरनाक इसलिए भी रहता है कि वे अपने शोषण को खुद होकर रोक नहीं पाते, और देह शोषण के बाद वे कई तरह की बीमारियों से लेकर अवांछित गर्भ तक के शिकार हो जाते हैं। सरकार के साथ-साथ समाज को भी यह सोचना चाहिए कि बच्चों को कैसे बचाया जा सकता है। एक बार बच्चे अगर नशे या जुर्म की राह पर चल निकले, तो वे पूरे ही समाज के लिए अपनी बाकी पूरी जिंदगी एक खतरा बने रह सकते हैं। ऐसे हर मामले पर गौर करने के लिए संबंधित विभागों के परे की, बाहरी और संवेदनशील लोगों की एक टीम रहनी चाहिए जिसके पास समाजशास्त्रीय विश्लेषण करने की विशेषज्ञता रहे, और साधन-सुविधा रहे। बच्चों की नई पीढ़ी को बचाने के लिए सरकार का नियमित ढांचा पर्याप्त संवेदनशील नहीं हो सकता, इसके लिए कुछ समर्पित समाजसेवी संगठनों की मदद ली जानी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

बेटी-बेटे और पिताओं में उलझा कानूनी मामला...

26 सितंबर 2026  

 

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने अभी यूपी की एक महिला कलेक्टर पर एक आंदोलनकारी छात्रा को गलत तरीके से बंद करने के खिलाफ 5 लाख रुपए का निजी जुर्माना लगाया था। इसके बाद यूपी सरकार ने कहा था कि वह इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी। यह तो किसी भी सरकार, या नागरिक का हक रहता है कि वे ऊपरी अदालत का विकल्प रहने तक अपील करते रहें, इसलिए इसमें अटपटा कुछ नहीं था। फिर सुप्रीम कोर्ट में इस चुनौती में कलेक्टर की तरफ से भारत सरकार के सबसे बड़े वकील खड़े हुए। यहां से लोगों को कुछ खटकना शुरू हुआ, क्योंकि हाईकोर्ट ने फैसला तो कलेक्टर के खिलाफ व्यक्तिगत जुर्माने का दिया था। फिर कुछ ऐसा हुआ जो बड़ा अटपटा था। सुप्रीम कोर्ट के रीति-रिवाजों के मुताबिक यह मामला सुनवाई के लिए एक ऐसी महिला जज के सामने जाना था जो कि अपनी कडक़मिजाजी के लिए जानी जाती हैं। जाने किन वजहों से चीफ जस्टिस ने इस मामले को एक दूसरे जज सतीश चंद्र शर्मा की अदालत में भेजा। लोग गौर से देखने लगे कि ऐसा क्यों किया गया। फिर जब इस अदालत में इस महिला कलेक्टर के मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो जज ने माइक्रोफोन बंद करवा दिए। आज जब सुप्रीम कोर्ट तमाम किस्म के महत्वपूर्ण मामलों में भी कैमरे शुरू रखवाता है, तब इस एक मामले में माइक्रोफोन बंद करवाना बड़ा ही अटपटा था, क्योंकि यह मामला न किसी बच्चे, या नाबालिग से जुड़ा हुआ था, न ही किसी सेक्स-अपराध का था, न ही किसी राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था। फिर अदालत का यह फैसला आया कि हाईकोर्ट ने महिला कलेक्टर पर जो टिप्पणी की है, और जो जुर्माना लगाया है, उसे सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया। देश के जो लोग एक आंदोलनकारी लडक़ी के खिलाफ जिला प्रशासन की नाजायज दिखती कार्रवाई के खिलाफ मुखर थे, वे हक्का-बक्का रह गए। लेकिन अदालत तो अदालत है, आज की तारीख में तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट का स्थगन लागू हो चुका है, आगे की सुनवाई जब होनी होगी, तब होगी।

अब पर्दे के पीछे की जानकारियां निकलकर सामने आ रही हैं, और चीख-चीखकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। यह बात तो पहले से सामने आ चुकी थी कि यह महिला कलेक्टर देश के भयानक चर्चित और विवादास्पद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने नियमित प्रक्रिया से परे जाकर जिन जज सतीश चंद्र शर्मा की अदालत में इस मामले को भेजा था, उनका एक वकील बेटा चुनाव आयोग का वकील है, वह सरकार के सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज, और आयकर विभाग का भी स्थायी वकील है। दूसरी दिलचस्प बात यह सामने आई कि जस्टिस शर्मा का छोटा बेटा जो कि 2020 में ही वकील बना, वह मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग का स्थायी वकील है। अब सवाल यह उठता है कि केंद्र की भाजपा अगुवाई वाली सरकार के विभागों का वकील बेटा, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार के राज में पीएससी का वकील दूसरा बेटा, ये अपने आपमें जज के विवेक पर कुछ सवाल उठाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह उठता है कि जिस मुख्य चुनाव आयुक्त के चुनाव आयोग में जस्टिस शर्मा का बेटा स्टैंडिंग काउंसिल है, उसी मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी की अपील ये जज साहब सुन रहे हैं। हम कानून के बहुत बड़े जानकार नहीं हैं, लेकिन अदालत में इंसाफ न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते हुए भी दिखना चाहिए, इस सदियों पुरानी सोच को याद रखने के लिए हमें किसी रॉकेट साइंस के फॉर्मूले को याद नहीं रखना पड़ता। यह तो बहुत मामूली सी समझ-बूझ की बात है कि इंसाफ करने की कुर्सी पर जिन्हें बिठाया गया है वे किसी भी लाग-लपेट, किसी भी तरह के हितों के टकराव से पूरी तरह बचे रहें। कई जज तो ऐसे रहते हैं जो कि किसी मामले की सुनवाई से सिर्फ इसलिए मना कर देते हैं कि उसमें एक वकील ऐसे हैं जो कि किसी वक्त जज के जूनियर रहे हुए हैं। रिश्तेदारी तो बहुत दूर की बात रहती है, जरा सा भी जुड़ाव होने से जजों की नैतिकता यही मांग करती है कि वे अपने-आपको मामले से अलग कर लें। यहां पर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा अपने दो वकील बेटों के सरकारों, और खासकर चुनाव आयोग से रिश्ते के बाद भी इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं, यह बहुत हैरानी की बात है।

इस मामले से लोगों को यह भी याद पड़ा कि अभी हाल ही में जब चुनाव आयुक्तों के चयन को लेकर एक मामला सुप्रीम कोर्ट में चला था, तो उस बेंच में भी यही जस्टिस शर्मा भी थे, और यह उनकी राय थी कि इस मामले को संविधान पीठ को दे दिया जाए। जबकि बेंच के दूसरे जज, जस्टिस दीपांकर दत्ता की राय अलग थी। मतलब यह कि आज चुनाव आयोग जितने किस्म के विवादों से घिरा हुआ है, जिनमें यह भी शामिल है कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया सही है, या नहीं, वह मामला निपटने के बजाय एक संविधान पीठ को चले गया, और संविधान पीठ की लंबी प्रक्रिया जानने वाले लोगों का यह कहना है कि यह अब अगले मुख्य न्यायाधीश का इंतजार करेगा, और दिलचस्प बात यह है कि अगले संभावित मुख्य न्यायाधीश को लेकर कुछ और किस्म की जानकारियां सामने आ चुकी हैं। हम किसी जज की नीयत पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं, लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत को अपने आचरण को लेकर नैतिकता के जिन सबसे ऊंचे पैमानों पर चलना चाहिए, उनकी बात तो आज भारत में इंसानों से लेकर कॉकरोच तक सभी कर रहे हैं।

कानून के समाचार-विचार देने वाली वेबसाइटों ने यह लिखा है कि ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम का मामला जस्टिस शर्मा की बेंच को भेजने से कुछ बड़े असुविधाजनक सवाल उठ खड़े हुए हैं। जस्टिस शर्मा की बेंच इस मामले को सुनने के लिए नियमित रोस्टर पर नहीं थी। दूसरी तरफ इस मामले से जुड़े हुए कुछ दूसरे मामले सुप्रीम कोर्ट की ही एक जज, जस्टिस नागरत्ना सुन रही थीं। ऐसे में आमतौर पर होता यही है कि संबंधित मामलों को पहले से सुन रहे, या सुन रही जज को ही यह नया मामला दे दिया जाता। इसलिए जब ज्ञानेश कुमार की बेटी का मामला, चुनाव आयोग के वकील के जज पिता की बेंच को दिया गया, तो लोगों के दिमाग में एक बहुत स्वाभाविक सा संदेह उठना जायज था। फिर मानो संदेह में कोई कसर रह गई हो, तो जस्टिस शर्मा ने सुनवाई के दौरान अदालत का माइक्रोफोन बंद करवा दिया, मानो यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ कोई मुद्दा हो। लेकिन कहानी इसके और आगे तक बढ़ती चली गई। चुनाव आयोग से लेकर आयकर विभाग तक, और मध्यप्रदेश पीएससी तक की वेबसाइटों पर वकीलों के नाम दर्ज हैं, उन्होंने कब वकालत शुरू की यह दर्ज है, और वे किसके बेटे हैं, यह भी सार्वजनिक जानकारी में अच्छी तरह स्थापित है। हालांकि संदेह का लाभ देते हुए हम यह जरूर कहना चाहेंगे कि जस्टिस शर्मा ने इस मामले से जुड़े हुए लोगों से, अपना रिश्ता सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखा था या नहीं, यह अभी खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन अगर ऐसा कोई खुलासा आगे जाकर होता भी है, तो भी यह बात तो है ही कि इतनी रिश्तेदारी के बाद भी उन्होंने यह मामला सुना।

हमें यह पक्का मालूम है कि सुप्रीम कोर्ट के जज बनने तक हर किसी को दर्जनों, या सैकड़ों बार यह बात पढऩे और सुनने मिल चुकी रहती है कि इंसाफ न केवल होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। सैकड़ों बरस पुरानी इस बात की एक दूसरी मिसाल यह भी है कि राजा की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। यह बात तो शेयर मार्केट के नियम-कायदे लागू करने वाली संस्थाओं तक में सुनाई देते रहती है कि वहां दर्ज हर कंपनी को अपने रिश्तों के बारे में सेबी जैसी संस्था को जानकारी देना चाहिए। अभी तो छत्तीसगढ़ सरकार ने एक ऐसा आदेश निकाला है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने परिवार के किसी सदस्य को अपना प्रतिनिधि नहीं बना सकते। इस तरह नैतिकता और पारदर्शिता सार्वजनिक जीवन में कोई दुर्लभ पशु नहीं हैं, उन पर चलन की पुरानी परंपरा रही है, और जिन लोगों को वकालत, या अदालत की जानकारी नहीं भी है, वे लोग भी इन बातों को अच्छी तरह समझते हैं। ऐसे में ज्ञानेश कुमार की बेटी का यह मामला नैतिकता और पारदर्शिता के बुनियादी पैमानों में ही उलझ गया है, और हमारा तो अंदाज यह है कि इससे इस नौजवान महिला आईएएस का नफा कम, नुकसान अधिक हुआ है। 5 लाख रुपए का जुर्माना पटाने से मिली एक अस्थायी और तात्कालिक राहत उतना अधिक मायने नहीं रखती, जितना मायने यह विवाद रखता है, और सुप्रीम कोर्ट में आगे अगर इस मामले को कुरेदा जाएगा, तो वहां इस महिला अधिकारी का नुकसान ही अधिक होगा। ऐसा लगता है कि सत्ता की बेहिसाब ताकत कई लोगों से बददिमाग और बेदिमाग फैसले करवा देती है, लेकिन ये फैसले पूरी जिंदगी खड़े नहीं रह पाते। सरकार से लेकर अदालत तक की सत्ता बदलती रहती है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 26 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)