26 सितंबर 2026
इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने अभी यूपी की एक महिला कलेक्टर पर एक आंदोलनकारी छात्रा को गलत तरीके से बंद करने के खिलाफ 5 लाख रुपए का निजी जुर्माना लगाया था। इसके बाद यूपी सरकार ने कहा था कि वह इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी। यह तो किसी भी सरकार, या नागरिक का हक रहता है कि वे ऊपरी अदालत का विकल्प रहने तक अपील करते रहें, इसलिए इसमें अटपटा कुछ नहीं था। फिर सुप्रीम कोर्ट में इस चुनौती में कलेक्टर की तरफ से भारत सरकार के सबसे बड़े वकील खड़े हुए। यहां से लोगों को कुछ खटकना शुरू हुआ, क्योंकि हाईकोर्ट ने फैसला तो कलेक्टर के खिलाफ व्यक्तिगत जुर्माने का दिया था। फिर कुछ ऐसा हुआ जो बड़ा अटपटा था। सुप्रीम कोर्ट के रीति-रिवाजों के मुताबिक यह मामला सुनवाई के लिए एक ऐसी महिला जज के सामने जाना था जो कि अपनी कडक़मिजाजी के लिए जानी जाती हैं। जाने किन वजहों से चीफ जस्टिस ने इस मामले को एक दूसरे जज सतीश चंद्र शर्मा की अदालत में भेजा। लोग गौर से देखने लगे कि ऐसा क्यों किया गया। फिर जब इस अदालत में इस महिला कलेक्टर के मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो जज ने माइक्रोफोन बंद करवा दिए। आज जब सुप्रीम कोर्ट तमाम किस्म के महत्वपूर्ण मामलों में भी कैमरे शुरू रखवाता है, तब इस एक मामले में माइक्रोफोन बंद करवाना बड़ा ही अटपटा था, क्योंकि यह मामला न किसी बच्चे, या नाबालिग से जुड़ा हुआ था, न ही किसी सेक्स-अपराध का था, न ही किसी राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला था। फिर अदालत का यह फैसला आया कि हाईकोर्ट ने महिला कलेक्टर पर जो टिप्पणी की है, और जो जुर्माना लगाया है, उसे सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया। देश के जो लोग एक आंदोलनकारी लडक़ी के खिलाफ जिला प्रशासन की नाजायज दिखती कार्रवाई के खिलाफ मुखर थे, वे हक्का-बक्का रह गए। लेकिन अदालत तो अदालत है, आज की तारीख में तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट का स्थगन लागू हो चुका है, आगे की सुनवाई जब होनी होगी, तब होगी।
अब पर्दे के पीछे की जानकारियां निकलकर सामने आ रही हैं, और चीख-चीखकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। यह बात तो पहले से सामने आ चुकी थी कि यह महिला कलेक्टर देश के भयानक चर्चित और विवादास्पद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने नियमित प्रक्रिया से परे जाकर जिन जज सतीश चंद्र शर्मा की अदालत में इस मामले को भेजा था, उनका एक वकील बेटा चुनाव आयोग का वकील है, वह सरकार के सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज, और आयकर विभाग का भी स्थायी वकील है। दूसरी दिलचस्प बात यह सामने आई कि जस्टिस शर्मा का छोटा बेटा जो कि 2020 में ही वकील बना, वह मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग का स्थायी वकील है। अब सवाल यह उठता है कि केंद्र की भाजपा अगुवाई वाली सरकार के विभागों का वकील बेटा, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार के राज में पीएससी का वकील दूसरा बेटा, ये अपने आपमें जज के विवेक पर कुछ सवाल उठाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह उठता है कि जिस मुख्य चुनाव आयुक्त के चुनाव आयोग में जस्टिस शर्मा का बेटा स्टैंडिंग काउंसिल है, उसी मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी की अपील ये जज साहब सुन रहे हैं। हम कानून के बहुत बड़े जानकार नहीं हैं, लेकिन अदालत में इंसाफ न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते हुए भी दिखना चाहिए, इस सदियों पुरानी सोच को याद रखने के लिए हमें किसी रॉकेट साइंस के फॉर्मूले को याद नहीं रखना पड़ता। यह तो बहुत मामूली सी समझ-बूझ की बात है कि इंसाफ करने की कुर्सी पर जिन्हें बिठाया गया है वे किसी भी लाग-लपेट, किसी भी तरह के हितों के टकराव से पूरी तरह बचे रहें। कई जज तो ऐसे रहते हैं जो कि किसी मामले की सुनवाई से सिर्फ इसलिए मना कर देते हैं कि उसमें एक वकील ऐसे हैं जो कि किसी वक्त जज के जूनियर रहे हुए हैं। रिश्तेदारी तो बहुत दूर की बात रहती है, जरा सा भी जुड़ाव होने से जजों की नैतिकता यही मांग करती है कि वे अपने-आपको मामले से अलग कर लें। यहां पर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा अपने दो वकील बेटों के सरकारों, और खासकर चुनाव आयोग से रिश्ते के बाद भी इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं, यह बहुत हैरानी की बात है।
इस मामले से लोगों को यह भी याद पड़ा कि अभी हाल ही में जब चुनाव आयुक्तों के चयन को लेकर एक मामला सुप्रीम कोर्ट में चला था, तो उस बेंच में भी यही जस्टिस शर्मा भी थे, और यह उनकी राय थी कि इस मामले को संविधान पीठ को दे दिया जाए। जबकि बेंच के दूसरे जज, जस्टिस दीपांकर दत्ता की राय अलग थी। मतलब यह कि आज चुनाव आयोग जितने किस्म के विवादों से घिरा हुआ है, जिनमें यह भी शामिल है कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया सही है, या नहीं, वह मामला निपटने के बजाय एक संविधान पीठ को चले गया, और संविधान पीठ की लंबी प्रक्रिया जानने वाले लोगों का यह कहना है कि यह अब अगले मुख्य न्यायाधीश का इंतजार करेगा, और दिलचस्प बात यह है कि अगले संभावित मुख्य न्यायाधीश को लेकर कुछ और किस्म की जानकारियां सामने आ चुकी हैं। हम किसी जज की नीयत पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं, लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत को अपने आचरण को लेकर नैतिकता के जिन सबसे ऊंचे पैमानों पर चलना चाहिए, उनकी बात तो आज भारत में इंसानों से लेकर कॉकरोच तक सभी कर रहे हैं।
कानून के समाचार-विचार देने वाली वेबसाइटों ने यह लिखा है कि ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम का मामला जस्टिस शर्मा की बेंच को भेजने से कुछ बड़े असुविधाजनक सवाल उठ खड़े हुए हैं। जस्टिस शर्मा की बेंच इस मामले को सुनने के लिए नियमित रोस्टर पर नहीं थी। दूसरी तरफ इस मामले से जुड़े हुए कुछ दूसरे मामले सुप्रीम कोर्ट की ही एक जज, जस्टिस नागरत्ना सुन रही थीं। ऐसे में आमतौर पर होता यही है कि संबंधित मामलों को पहले से सुन रहे, या सुन रही जज को ही यह नया मामला दे दिया जाता। इसलिए जब ज्ञानेश कुमार की बेटी का मामला, चुनाव आयोग के वकील के जज पिता की बेंच को दिया गया, तो लोगों के दिमाग में एक बहुत स्वाभाविक सा संदेह उठना जायज था। फिर मानो संदेह में कोई कसर रह गई हो, तो जस्टिस शर्मा ने सुनवाई के दौरान अदालत का माइक्रोफोन बंद करवा दिया, मानो यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ कोई मुद्दा हो। लेकिन कहानी इसके और आगे तक बढ़ती चली गई। चुनाव आयोग से लेकर आयकर विभाग तक, और मध्यप्रदेश पीएससी तक की वेबसाइटों पर वकीलों के नाम दर्ज हैं, उन्होंने कब वकालत शुरू की यह दर्ज है, और वे किसके बेटे हैं, यह भी सार्वजनिक जानकारी में अच्छी तरह स्थापित है। हालांकि संदेह का लाभ देते हुए हम यह जरूर कहना चाहेंगे कि जस्टिस शर्मा ने इस मामले से जुड़े हुए लोगों से, अपना रिश्ता सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखा था या नहीं, यह अभी खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन अगर ऐसा कोई खुलासा आगे जाकर होता भी है, तो भी यह बात तो है ही कि इतनी रिश्तेदारी के बाद भी उन्होंने यह मामला सुना।
हमें यह पक्का मालूम है कि सुप्रीम कोर्ट के जज बनने तक हर किसी को दर्जनों, या सैकड़ों बार यह बात पढऩे और सुनने मिल चुकी रहती है कि इंसाफ न केवल होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। सैकड़ों बरस पुरानी इस बात की एक दूसरी मिसाल यह भी है कि राजा की पत्नी को संदेह से ऊपर रहना चाहिए। यह बात तो शेयर मार्केट के नियम-कायदे लागू करने वाली संस्थाओं तक में सुनाई देते रहती है कि वहां दर्ज हर कंपनी को अपने रिश्तों के बारे में सेबी जैसी संस्था को जानकारी देना चाहिए। अभी तो छत्तीसगढ़ सरकार ने एक ऐसा आदेश निकाला है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने परिवार के किसी सदस्य को अपना प्रतिनिधि नहीं बना सकते। इस तरह नैतिकता और पारदर्शिता सार्वजनिक जीवन में कोई दुर्लभ पशु नहीं हैं, उन पर चलन की पुरानी परंपरा रही है, और जिन लोगों को वकालत, या अदालत की जानकारी नहीं भी है, वे लोग भी इन बातों को अच्छी तरह समझते हैं। ऐसे में ज्ञानेश कुमार की बेटी का यह मामला नैतिकता और पारदर्शिता के बुनियादी पैमानों में ही उलझ गया है, और हमारा तो अंदाज यह है कि इससे इस नौजवान महिला आईएएस का नफा कम, नुकसान अधिक हुआ है। 5 लाख रुपए का जुर्माना पटाने से मिली एक अस्थायी और तात्कालिक राहत उतना अधिक मायने नहीं रखती, जितना मायने यह विवाद रखता है, और सुप्रीम कोर्ट में आगे अगर इस मामले को कुरेदा जाएगा, तो वहां इस महिला अधिकारी का नुकसान ही अधिक होगा। ऐसा लगता है कि सत्ता की बेहिसाब ताकत कई लोगों से बददिमाग और बेदिमाग फैसले करवा देती है, लेकिन ये फैसले पूरी जिंदगी खड़े नहीं रह पाते। सरकार से लेकर अदालत तक की सत्ता बदलती रहती है।
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