9 फरवरी 2014
संपादकीय
वकीलों के एक संगठन की 150वीं सालगिरह पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इस बात पर फिक्र जाहिर की कि देश की अदालतों में 3 करोड़ 10 लाख मामले चल रहे हैं। दूसरी तरफ एक अलग खबर में दो-तीन दिन पहले ही यह जानकारी आई कि आज देश में फिक्र का सबसे बड़ा मामला, बलात्कार, देश के उच्च न्यायालयों में बहुत बड़ी संख्या में पड़े हुए हैं। उच्च न्यायालयों में 24 हजार, और सर्वोच्च न्यायालय में 8 हजार। इन आंकड़ों को देखें तो अकेले इलाहाबाद हाईकोर्ट में बलात्कार के 8 हजार 215 मामले चल रहे हैं, और पिछले तीन बरसों में इस हाईकोर्ट में बलात्कार के कुल 39 मामले निपटे हैं। इस हिसाब से अगर देखें तो इलाहाबाद हाईकोर्ट में आज चल रहे बलात्कार के मामले 631 बरस (छह सौ इकत्तीस बरस) में जाकर निपट पाएंगे। अब इसे कोई भारतीय लोकतंत्र के तहत इंसाफ माने तो मान लें। और ये आंकड़े सिर्फ हमने केलकुलेटर पर नहीं निकाले हैं, अभी-अभी दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहे मामलों को लेकर दिल्ली में मुख्य न्यायाधीश ने यह कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट एक मामले की सुनवाई में औसतन 4 मिनट 55 सेकंड लगा रहा है, और इसके बाद भी आज वहां पर जो मामले चल रहे हैं, उनको इस रफ्तार से निपटाने में 466 साल (चार सौ छैंसठ साल) लगेंगे।
कोई हैरानी नहीं है कि भारतीय लोकतंत्र में लोगों का भरोसा न्याय व्यवस्था पर से पूरी तरह से खत्म है। और लोग अगर बातचीत की जुबान में यह कहते हैं कि अदालतों से ईश्वर बचाए, तो वह ठीक ही कहते हैं। इसके अलावा देश के कई लोगों को मुंबई में माफिया सरगनाओं के किए गए निजी इंसाफ ठीक लगते हैं, चंबल में लोगों को डकैतों का किया हुआ इंसाफ ठीक लगता था, कई जगहों पर नक्सलियों का किया हुआ इंसाफ लोगों को ठीक लगता है, तो वह इसीलिए है कि भारत में न्याय व्यवस्था बुरी तरह, और पूरी तरह नाकामयाब साबित हुई है। अब इसके पीछे की वजहों को देखें, तो देश के उच्च न्यायालयों में ही जजों के करीब पौने चार सौ पद खाली पड़े हुए हैं। बहुत सी बड़ी अदालतों में न तो जरूरत जितनी इमारतें हैं, और न ही जरूरत जितना ढांचा है। नतीजा यह होता है कि एक-एक, छोटा-छोटा मामला दस-दस, बीस-बीस बरस तक खिंच जाता है, और लोग कई मामलों में तो पीढिय़ों तक अदालतों के चक्कर काटते हैं, और कई मामलों में गरीब विचाराधीन कैदी, उन पर चल रहे मामलों में अधिकतम संभव सजा से भी अधिक वक्त फैसले के पहले जेल में काट चुके रहते हैं।
भारतीय अदालतों से जिनका भी वास्ता पड़ता है, वे भारतीय न्याय व्यवस्था से ही नहीं, भारतीय लोकतंत्र से भी विश्वास खो बैठते हैं। और हमारा यह मानना है कि सत्ता पर बैठे हुए ताकतवर लोगों की एक दिलचस्पी अदालतों को ठप्प रखने में इसलिए रहती है क्योंकि सत्ता का बेजा इस्तेमाल भारत में एक बहुत आम बात है, और अदालतों से अगर रफ्तार से इंसाफ होने लगेगा, तो सत्ता पर बैठे लोग अगले दस-दस चुनाव लडऩे के पहले दसियों बरस के लिए जेल चले जाएंगे। इसलिए सत्ता का फायदा इसमें रहता है कि इंसाफ घिसटता रहे, कभी मंजिल पर पहुंच ही न सके, और इस दौरान सत्ता पर काबिज मुजरिम अपने-आपको जनता की अदालतों में सही साबित करते हुए चुनाव जीत-जीतकर सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रख सकें। भारत में अगर लोकतंत्र पर जनता का भरोसा वापिस लाना है, तो इंसाफ के हाथ-पैर चलने जितना इंतजाम करना होगा। और हमारा यह भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र और राज्य सरकारों की बेरूखी के खिलाफ खुद होकर सुनवाई कर सकता है, और तय समय के भीतर सारी कुर्सियों को भरने, सारा इंतजाम करने का हुक्म भी दे सकता है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट को अपनी इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को पूरा करना चाहिए।

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