गैरजिम्मेदार-नासमझ लोगों को बचाने की पहल सरकार करे

22 फरवरी 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की सड़कों पर रोज ही लहू बिखर रहा है। छोटे-छोटे दुपहिया वालों से लेकर बड़े-बड़े लोगों तक की गाडिय़ां हादसों की शिकार हो रही हैं। और केंद्र सरकार के बारे में यह पता लग रहा है कि वह सड़कों पर नशे में गाड़ी चलाने वालों के खिलाफ एक बहुत कड़ा कानून बनाने जा रही है। लेकिन नशे से परे भी, होश में भी सड़कों पर एक्सीडेंट के लिए जिम्मेदार लोगों पर आज कोई रोक नहीं है। और चूंकि सड़कों पर हिफाजत का इंतजाम राज्य का अधिकार है, और राज्य की जिम्मेदारी है इसलिए केंद्र सरकार का बनाया कानून यहां पर तब तक कागज का एक पुलिंदा ही बना रहेगा, जब तक राज्य सरकार में लोगों को समझ देने का हौसला नहीं जुटेगा।
हमारे अखबार में हादसों की जो तस्वीरें आती हैं, उनसे समझ आता है कि अगर दुपहियों पर सवार लोग हेलमेट लगाए होते, तो बहुत सी मौतें, शायद अधिकतर मौतें, टल जातीं। इसी तरह अगर बड़ी गाडिय़ों में चलने वाले लोग सीट-बेल्ट का इस्तेमाल करते, रफ्तार को काबू में रखते, तो भी बहुत सी मौतें टल चुकी होतीं। लेकिन लोगों को उनकी खुद की हिफाजत की समझ जब नहीं होती, जब आम लोग भारी गैरजिम्मेदार होते हैं, और नियमों को मानने के खिलाफ उनके मन में एक अहंकार बैठा होता है, तब एक जनकल्याणकारी सरकार को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और लोगों की नाराजगी, और वोटों की फिक्र किए बिना नियम लागू करके लोगों को बचाने का काम करना चाहिए। 
हिंदुस्तान में बहुत से छोटे-छोटे ऐसे प्रदेश और शहर हैं, जहां पर बड़ी आसानी से राज्य सरकार हेलमेट को अनिवार्य कर चुकी हैं, और कुछ हफ्तों के विरोध के बाद लोगों को खुद ही समझ आ जाता है कि जब घर से निकले लोग दुपहियों पर हेलमेट के साथ जाते हैं, तो उनके लौटने की आस भी पूरी रहती है। लेकिन छत्तीसगढ़ में छोटे-छोटे बकवासी बयानबाजों के विरोध की वजह से हेलमेट अनिवार्य नहीं हो पाया। जबकि यहीं के एक जिले दुर्ग में, वहां के पुलिस अधीक्षक ने अपनी समझ और अपनी कोशिश से उसे बहुत हद तक कामयाबी से लागू करके दिखा दिया था। 
आज जब हिंदुस्तान का सुप्रीम कोर्ट कई बार इस बारे में कह चुका है कि दुपहिया गाडिय़ों के साथ हेलमेट अनिवार्य रूप से देकर भी अगर लोगों को बचाया जा सकता है, तो वह करना चाहिए। हम सड़कों पर बुरी तरह से जख्मी लोगों को मरने के आंकड़ों में तो देख लेते हैं, लेकिन मौत से कम जिस तरह की तकलीफ के साथ ऐसे जख्मी लोग जिंदगी भर लंगड़ाने या घिसटने को मजबूर रहते हैं, उस तकलीफ को मौतों के आंकड़ों में जगह नहीं मिलती, और इसीलिए सड़कों पर खतरा हकीकत जितना बड़ा कभी दिखता नहीं है। लेकिन जब किसी परिवार के लोग सिर की चोट के बाद बाकी जिंदगी उसकी तकलीफ के साथ मरने की तरह जीने को मजबूर रहते हैं, तो उन लोगों को आसपास के लोगों तक यह समझ भी पहुंचानी चाहिए कि हेलमेट इस्तेमाल न करने का क्या नतीजा होता है।
एक दूसरी बात यह भी है कि जो लोग किसी एक नियम-कानून को नहीं मानते, या उसे तोडऩे में मजा पाते हैं, वैसे ही लोग दूसरे नियम-कायदे भी तोड़ते हैं। इसलिए हेलमेट का, या सीट-बेल्ट का अनुशासन, दूसरे कई किस्म के अनुशासन को भी बढ़ावा देता है। आज हेलमेट के नियम लागू न होने से दुपहियों पर आवारागर्दी करते लोग टै्रफिक के हर तरह के नियम तोड़ते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार को बिना हिचक, बिना देर किए, सड़कों पर लोगों को जिम्मेदार बनाना शुरू करना चाहिए, और हेलमेट इस तरफ पहला कदम होगा, जो कि हर बरस सैकड़ों जानें बचाएगा।

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