12 फरवरी 2014
संपादकीय
अंग्रेजी का एक प्रमुख प्रकाशक, पेंगुइन इंडिया, हिंदू धर्म पर लिखी गई एक अमरीकी लेखक की पुस्तक को वापस लेने और उसकी बाकी बची प्रतियों को नष्ट करने के लिए सहमत हो गया है। दिल्ली की एक अदालत में दोनों पक्षों के बीच हुए करार को मंजूरी दे दी गई। वेंडी डोनीगर की किताब 'द हिंदूज:एन अल्टरनेटिव हिस्ट्रीÓ को ये कहते हुए कानूनी रूप से चुनौती दी गई थी कि इससे हिंदुओं की भावनाओं को ठेस लगी है। इस विवादास्पद किताब को दो साल पहले रामनाथ गोयनका पुरस्कार दिया गया था और बीते चार बरसों से ये किताब बिक रही है और तभी से इसके खिलाफ अभियान भी चल रहा है। किताब का विरोध करने वालों का तर्क है कि हिन्दू धर्म के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली ये किताब 'सेक्स और कामुकताÓ पर आधारित है, किताब के मुख्य पृष्ठ पर छपी तस्वीर आपत्तिजनक है, साथ ही किताब में देवी-देवताओं और महापुरुषों के बारे में भी ओछी टिप्पणियां की गई हैं।
इस एक किताब के बारे में भारत में अलग से लिखने का कोई महत्व इसलिए नहीं है कि किताब, फिल्म, कला, तस्वीर, नाटक, और बाकी कई किस्म की चीजों पर रोक लगाने के लिए हिन्दुस्तान पूरी दुनिया में बदनाम हो चुका है, और इस देश में जिस तबके का जितना अधिक बाहुबल है, वह तबका उतने ही अधिक रोक के लिए जुट जाता है। कहने के लिए इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक बुनियादी हक है, लेकिन दूसरी तरफ इससे जुड़ा हुआ मुद्दा बाकी लोगों की भावनाओं का है, जिसके आहत होने का बहुत ही आम मामला हो गया है, और लोग मानो बिना देखे, बिना पढ़े, बिना चखे, बुरा मानने को तैयार बैठे हैं।
किसी भी देश की संस्कृति, वहां के इतिहास, वहां की विचारधाराओं की जब दुनिया भर के लोग तरह-तरह से व्याख्या करते हैं, उन पर शोध कार्य करते हैं, तो उनसे उस देश के भीतर एक बौद्धिक संपन्नता बढऩे की संभावना भी आती है। भारत में दुनिया के इतिहासकारों की लिखी बातों का आनन-फानन विरोध करना एक ऐसा शगल हो गया है जिसमें ताकतवर तबके जुटे रहते हैं, और धर्मान्धता, कट्टरपंथ, दकियानूसी बातों को भड़काकर अपने समर्थकों को अपने साथ जोड़े रखने की धूर्तता दिखाते हैं। और वोटों के मोहताज नेता, उनकी पार्टियां, और उनकी सरकारें, इनकी दहशत देखते ही बनती है। कोई मांग शुरू होती नहीं है, कि वह पूरी होने लगती है।
हम भारत जैसे विविधता वाले देश में धार्मिक और साम्प्रदायिक, जातीय और बाकी किस्म की भावनाओं के भड़कने के खतरे को कम नहीं आंक रहे, लेकिन देश के भीतर एक सहनशीलता और परिपक्वता को बढ़ाने के बजाय, उत्तेजना को भड़काने से यह देश गुफाकाल की तरफ बढ़ते चले जा रहा है। हिन्दू समाज के नाम पर जो मु_ी भर लोग इस किताब का विरोध करते आ रहे हैं, वे बहुत ही लचीले और सहनशीलता वाले, आंतरिक विविधता वाले हिन्दू समाज की एक गलत तस्वीर दुनिया के सामने पेश करते हैं। धीरे-धीरे करके भारत में यह माहौल बन रहा है कि यहां किसी भी गंभीर शोधकार्य में भी किसी अलोकप्रिय तथ्य को लिखना आसान नहीं है, और ऐसा करने पर रोक और प्रतिबंध के लिए, जुर्माने और सजा के लिए तैयार रहना चाहिए। इस देश की हुसैन जैसे विश्वविख्यात चित्रकार एक घोषित और गैरकानूनी, नाजायज और शर्मनाक देशनिकाले पर ही भेज दिया था, क्योंकि हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरों को उन्होंने नग्न दिखाया था, जो कि हिन्दुस्तान के मंदिरों के भीतर और मंदिरों की दीवारों पर एक आम बात है।
सैकड़ों बरस पहले इस देश में जो सहनशीलता थी, वह भी अब खत्म हो चली है। यह एक बहुत निराशाजनक तस्वीर है, और सिर्फ बेवकूफ समाज ऐसे विरोध को अपनी ताकत मान सकता है। भारत में ऐसे राष्ट्रीय नेताओं की जरूरत है जो कि लोगों को कुछ कहें, तो लोग उनकी सुनें।

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