परिवार की हत्या और आत्महत्या के पहले के तनाव का अंदाज...

21 फरवरी 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जहां हम बैठे हुए हैं वहां एक दिल दहलाने वाली खबर आई है, एक गरीब मुस्लिम नौजवान ने अपनी बीवी, दो बच्चों को मार डाला, और फिर पुलिस को फोन करके, पुलिस के पहुंचने के पहले खुद भी फांसी पर झूल गया। इसके पीछे कई किस्म की वजहों में से कोई एक या एक से अधिक हो सकती हैं, लेकिन कुल मिलाकर सवाल यह है कि इस कदर तनाव, इस कदर तकलीफ, और इस कदर हिंसा का शिकार हुआ यह परिवार जिस घनी बस्ती में अड़ोस-पड़ोस के बीच रहता था, वह पड़ोस किसी काम नहीं आया, जात-बिरादरी किसी काम नहीं आई, रिश्तेदार किसी काम नहीं आए, और परिवार के भीतर इतनी बड़ी हिंसा हो गई। 
हिन्दुस्तान में आज बहुत बड़े हिस्से के सामने गरीबी की दिक्कत है, बहुत से लोगों के सामने बेरोजगारी, बीमारी, या निजी किस्म के तनाव हैं। परिवारों के भीतर तनाव कम नहीं रहता। और ऐसे में जब समाज और आसपास का अधिकतर हिस्सा अपनी-अपनी रोजाना की दिक्कतों से जूझता हुआ एक-एक दिन गुजारता है, तो पास के किसी दूसरे तकलीफजदा की मदद करने का न तो शायद वक्त होता, और न ही शायद ताकत बचती। अब ऐसे में लोगों को ऐसी हत्या और आत्महत्या से पहले की तनाव से भरी हुई नौबत से उबारने के लिए सरकार और समाज क्या कर सकते हैं? और यह बात तय है कि जिस देश या समाज के लोग इतने अधिक तनाव की हद तक पहुंचते हैं, तो उसके पहले भी बरसों से या महीनों से उनकी उत्पादकता देश को नहीं मिल पाती, समाज को उनका रचनात्मक योगदान नहीं मिल पाता। 
हमको आत्महत्या और ऐसी निजी हिंसा के हर मामले के वक्त एक बात खटकती है कि हिन्दुस्तान में लोगों को निजी परामर्श देने के लिए मनोचिकित्सक या मनोपरामर्शदाता नहीं हैं। गिने-चुने जो लोग हैं, उनके पास इतनी भीड़ है, कि किसी गरीब की बारी वहां कभी नहीं आ सकती है। इसके अलावा मनोचिकित्सकों के पास जाना भारत में एक सामाजिक अपमान की बात भी रहती है, कि लोग ऐसे लोगों को पागल समझते हैं, और कहते हैं। इसलिए भी बहुत से लोग मनोचिकित्सा की जरूरत, और बात को दबा जाते हैं। दूसरी तरफ समाज के भीतर हिन्दी टीवी सीरियलों की मेहरबानी से दुष्टता, कमीनापन, साजिश, और बाकी कई किस्म की नकारात्मक भावनाएं इस कदर बढ़ चुकी हैं, कि लोग सामान्य नहीं रह पा रहे हैं। टीवी पर इस किस्म की बिना खून-खराबे वाली लेकिन तनाव वाली कहानियों को रोज देख-देखकर लोग अपनी जिंदगी को इन कहानियों से जोडऩे लगते हैं, और फिर कई ऐसे मौके आते हैं, जब ऐसे तनाव हिंसा की हद तक पहुंच जाते हैं। 
हम यहां पर सरकार के साथ-साथ समाज की भी एक हिस्सेदारी चाहते हैं, ताकि सरकार तो मनोचिकित्सक और परामर्शदाताओं की संख्या बढ़ाने के लिए कॉलेज और नौकरियों का इंतजाम करे, लेकिन समाज को भी इसके साथ-साथ तमाम लोगों के दिल-दिमाग को सेहतमंद रखने के लिए कुछ करना चाहिए। आज बहुत संगठित सामाजिक कार्यक्रमों से परे, हमको ऐसी अनौपचारिक कोशिशें नहीं दिखतीं, जिनसे आबादी के एक बड़े हिस्से के बीच लोग जाकर सकारात्मक और रचनात्मक भावनाओं को बढ़ाने के लिए कुछ करते हों। 
भारत एक तरफ तो अपने आर्थिक ढांचे को लेकर गरीबी से उबर जाने की बात करता है, लेकिन दूसरी तरफ उसका मानवीय ढांचा फटेहाल हैं। और चूंकि मानसिक स्थिति, तनाव और कुंठा, हताशा और मानसिक हिंसा को आंकड़ों में गिना नहीं जा सकता, इसलिए समाज की सतह के ठीक नीचे की यह खराब हालत सिर चढ़कर नहीं बोल पाती, और देश में मानसिक अशांति के खतरों का अंदाज नहीं लगता। इसलिए हम पहले कई बार लिखी गई इस बात को दुहराना चाहते हैं कि सरकार को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और मनोपरामर्शदाता, और मनोचिकित्सक बढ़ाने के लिए कॉलेजों में इनकी सीटें बढ़ानी चाहिए। दूसरी तरफ समाज के भीतर के लोगों को समाज के सभी लोगों के बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए कोशिश करनी चाहिए। 

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