जनता का सोना लुटता रहे, और लोहे की नाप-तौल वाला बजट महज लोकतांत्रिक पाखंड...

17 फरवरी 2014
संपादकीय

यूपीए सरकार के इस आखिरी बजट में छोटी-मोटी कुछ रियायतों को लेकर टीवी पर मोटी-मोटी बहसें चल रही हैं, और लोग इसका आर्थिक विश्लेषण कर रहे हैं। कुल मिलाकर एक-दो फीसदी का फेरबदल तौला जा रहा है कि इससे जनता को क्या फर्क पड़ेगा, और इससे कम या अधिक करने की गुंजाइश थी या नहीं? वैसे तो यह बजट एक अंतरिम बजट है जो कि चुनाव तक के कुछ महीनों के लिए ही है, और उसके बाद अगली सरकार के वित्त मंत्री को बाकी महीनों के लिए बजट पेश करना होगा, लेकिन फिर भी इस केंद्रीय बजट, और बाकी राज्यों के आए बजटों पर हम एक दूसरी तरह से देखना चाहते हैं। 
जब भारत और इसके प्रदेशों की अर्थव्यवस्था गिने-चुने दो-चार फीसदी के टैक्स फेरबदल तक सीमित हैं, तब यह सोचकर हैरानी होती है कि बजट का आधे से अधिक हिस्सा जब सरकारें अपने खुद पर खर्च करती हैं, तो उस खर्च में कटौती और किफायत बरतने से कितना बड़ा फर्क पड़ सकता है, और ऐसी किफायत के बारे में बजट के मौके पर कोई बात भी नहीं होती। दूसरी बात जो बजट के मौके पर एक अर्थशास्त्री न होने की वजह से हमको सूझती है, वह यह है कि सरकार के भ्रष्टाचार और कमाई में चोरी से कितना बड़ा फर्क पड़ता है, और वह अगर न हो तो एक अंक वाली टैक्स कटौती शायद दो अंकों वाली भी हो सकती है। 
सरकारों के बजट अर्थशास्त्र के जानकारों के लिए तो काम के हो सकते हैं, लेकिन हमको यही दो-तीन बातें परेशान करती हैं। सरकार में किफायत, फिजूलखर्ची का खात्मा, टैक्स की चोरी बंद, और भ्रष्टाचार में कमी, इतनी बातों पर अगर ध्यान दिया जाए, तो हमारी सामान्य समझ यह कहती है कि सरकार की कमाई दोगुनी हो सकती है, और खर्च आधा हो सकता है। लेकिन बजट के आंकड़ों में ऐसी सोच की कोई जगह नहीं होती, और वित्त मंत्री आंकड़ों के खेल और फेरबदल को ही कामयाबी मानते हैं, और विपक्ष या आलोचक खेल में वित्त मंत्री के इसी प्रदर्शन को नाकामयाबी मान लेते हैं। दरअसल बजट के एक दिन देश में कुछ भी साबित नहीं होता, और साल के बाकी दिनों में सरकार की सोच, जनता की सोच, और देश की फिक्र, उन्हीं से सब कुछ साबित होता है। 
बजट एक ऐसा सालाना रिवाज बनकर रह गया है कि लोग उससे बड़ी-बड़ी उम्मीदें बांध लेते हैं, जबकि बजट की ऐसी कोई ताकत ही नहीं होती कि सरकार के भारी-भरकम स्थापना व्यय की भरपाई कर सके, या टैक्स चोरी की भरपाई कर सके, या भ्रष्टाचार का पेट भर सके। इस सालाना जलसे से परे जनता के बीच से ऐसा दबाव आना जरूरी है जिससे कि हर बरस का यह कागजी फर्जीवाड़ा जरूरी न रह जाए। बजट नाम के दस्तावेज को देश और प्रदेशों में जरूरत से अधिक अहमियत का दर्जा दे दिया गया है, और उसे सरकारों की बाकी खामियों और कमियों का इलाज मान लिया गया है। यह सिलसिला थमना चाहिए। अगर सरकार और जनता ईमानदारी से काम करें, तो हर बरस कागज की यह बर्बादी जरूरी ही नहीं रह जाएगी। देश की जनता की जो दौलत खदानों से लेकर खेतों तक, और पानी से लेकर आसमान की तरंगों तक बिखरी पड़ी हैं, उनकी लूटपाट को अगर देखें, तो इस बात पर हंसी आएगी कि एक-दो फीसदी की कमी या बढ़ोतरी वाले टैक्स को आज महत्वपूर्ण माना जा रहा है, और देश की दौलत पसंदीदा खरबपतियों को चांदी की तश्तरी में रखकर पेश की जा रही है। बजट के मौके पर हम बजट से परे की इन बातों को ही कहना चाहते हैं, क्योंकि देश का सोना लुटता रहे, और लोहे के नाप-तौल वाले बजट को राष्ट्रीय महत्व का मान लिया जाए, यह एक बहुत बड़ा लोकतांत्रिक पाखंड है।

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