अपने कुएं से बाहर न देख पाने, और वक्त के साथ न बदलने वालों के साथ यह दिक्कत रहती है...

16 फरवरी 2014
संपादकीय
भारत की राजनीति में क्षेत्रीय और प्रांतीय दलों को भी बहुत से मुद्दों पर न सिर्फ अपनी राय सामने रखनी पड़ती है, बल्कि वक्त आने पर इन मुद्दों पर, इनके मोर्चों पर डटना भी पड़ता है। आज हम लगातार तीसरे दिन दिल्ली की आम आदमी पार्टी के बारे में लिखने नहीं जा रहे, लेकिन हम जिस मुद्दे पर लिखने जा रहे हैं, वह आम आदमी पार्टी पर भी लागू होता है। भारत जैसे दो दर्जन से अधिक राज्यों वाले, आधा दर्जन देशों से घिरे हुए, दर्जनभर धर्मों वाले, और दर्जनों पार्टियों वाले देश में सैकड़ों बोलियों, और सैकड़ों जातियों के साथ-साथ सैकड़ों ऐसे मुद्दे भी रहते हैं, जिन पर पांच बरस के लंबे दौर में बहुत से संघर्ष होते हैं, और राजनीतिक दलों, सरकारों को, और नेताओं को इन पर अपनी राय भी रखनी पड़ती है। 
जो पार्टियां लंबे समय तक मैदान में रहती हैं, सत्ता में आती और जाती रहती हैं, उनको अपने रूख को कुछ लचीला भी बनाए रखना होता है, और मुद्दों पर भी समझौते करने पड़ते हैं, या बिना समझौतों के भी वक्त की बदलती हुई नजाकत के मुताबिक अपनी सोच बदलनी होती है। मिसाल के तौर पर भाजपा को लें, तो एक वक्त लोकसभा में इसके पास दो सीटें थीं, आज चौथाई सदी के भीतर इसके पास दो सौ सीटें होने का अंदाज सामने आ रहा है। एक वक्त था जब इसके पास सिर्फ एक झंडा और एक डंडा था, कि मंदिर वहीं बनाएंगे। आज इसके प्रधानमंत्री-प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी, जो कि देश में हिन्दुत्व के सबसे आक्रामक नेता माने जाते हैं, उनके पिछले सौ भाषण सुन लें, किसी एक में भी मंदिर का जिक्र नहीं है। अयोध्या में रामलला की प्रतिमाएं आज भी भाजपा के इंतजार में हैं, बाबरी मस्जिद को गिराए दो दशक से अधिक हो चुके हैं, सैकड़ों जानें जा चुकी हैं, लेकिन आज भाजपा के हाथ अयोध्या का झंडा-डंडा कुछ भी नहीं है। 
सिर्फ यही एक पार्टी, और यही एक मुद्दा नहीं है, जिसने कि हालात के साथ ख्यालात बदले हों। किसने सोचा था कि यूपीए-1 सरकार वामपंथियों के भारी समर्थन से पांच बरस पूरे करेगी, किसने सोचा था कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोडऩे वाले शरद पवार आज कांग्रेस के सबसे बड़े एक सहयोगी दल बने रहेंगे? ऐसी बहुत सी बातें वक्त के साथ-साथ होती हैं, और इनमें से हर कोई घटिया समझौता हो, यह जरूरी भी नहीं है। हम फिर भाजपा के मुद्दे पर लौटें, तो भाजपा ने मंदिर को देश का चुनावी मुद्दा हटाकर जब मोदी के बेहतर प्रशासन, और आर्थिक विकास को देश का सबसे बड़ा मुद्दा बनाया, तो हमारे हिसाब से वह एक राजनीतिक समझदारी का फैसला था, और वह लचीलापन जरूरी भी था। चुनावी भाषणों में हो सकता है कि लोग भाजपा को फिर कोंचना चाहें कि मंदिर का क्या हुआ, लेकिन देश की कोई दिलचस्पी आज आम चुनावों को मंदिर के मुद्दे पर जनमत संग्रह में बदलने में नहीं है। 
ईमानदारी की राजनीति की बात करने वाले दो लोगों की बात हम यहां पर छेड़ेंगे, जिन्होंने इसी एक मुद्दे को तांगे में जोते गए घोड़े की आंखों पर दोनों तरफ लगाई गई रोक के अंदाज में काम किया ताकि उनको दाएं-बाएं की कोई दूसरी बात विचलित न कर सके। एक तो अरविंद केजरीवाल हैं ही, ऐसे ही दूसरे नेता हैं आन्ध्रप्रदेश में जयप्रकाश नारायण नाम के भूतपूर्व आईएएस अफसर। जेपी ने वहां पर लोकसत्ता नाम की एक पार्टी बनाई है, और वे खुद वहां से विधायक भी हैं। उन्होंने चुनाव सुधार और सूचना के अधिकार के मोर्चों पर काम भी किया, लेकिन अपनी पार्टी को वे न तो आन्ध्रप्रदेश में बहुत से मुद्दों पर सक्रिय रख पाए, और न ही आन्ध्र के बाहर उसका कोई विस्तार हुआ। इस पार्टी को बने आज करीब आठ बरस हो रहे हैं, और इसने भी साफ-सुथरी राजनीति और ईमानदारी के मुद्दे पर चुनाव लडऩा शुरू किया, लेकिन सिर्फ ये दो मुद्दे भारत की राजनीति में, जनजीवन में काफी नहीं हो सकते। इसलिए आम आदमी पार्टी और लोकसत्ता पार्टी से बाकी देश को यह सबक लेना है, कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में, गिने-चुने मुद्दों को लेकर राजनीति बहुत दूर तक सफर नहीं कर सकती। किसी स्थानीय संस्था में, म्युनिसिपल या पंचायत में तो बहुत सीमित नजरिए के साथ राजनीति हो सकती है, लेकिन किसी प्रांतीय या राष्ट्रीय दल को बहुत से राष्ट्रीय मुद्दों पर अपना नजरिया खुलकर सामने रखना पड़ता है, और हिस्सेदारी निभानी पड़ती है। आने वाले दिनों में आम आदमी पार्टी के दिल्ली से बाहर कामकाज को लेकर लोगों की उत्सुकता बनी हुई है। इसकी संभावनाएं इसी पर टिकी रहेंगी, कि यह अपने कुएं से बाहर देख सकेगी या नहीं, और बाकी मुद्दों पर मुंह खोलना यह सीख सकेगी या नहीं। 

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