केजरीवाल के बहाने, बाकी देश की संभावनाओं से कुछ बातें...

3 फरवरी 2014
संपादकीय
दिल्ली में आम आदमी पार्टी को लेकर जो कुछ चल रहा है उस पर आज यहां लिखना, खुद हमारे पैमाने से इस छोटी सी पार्टी पर बहुत जल्दी-जल्दी, बहुत बड़ी-बड़ी जगह खराब करना है, लेकिन हम इसे दिल्ली का एक स्थानीय मुद्दा न मानते हुए इसे पूरे देश के लिए एक संभावना की तरह देखते हुए इस पर अनुपात से कुछ अधिक लिख रहे हैं। यह जरूरी नहीं है कि आम आदमी पार्टी दिल्ली के बाहर भी इसी नाम या इसी निशान के साथ चुनाव में रहे, हो सकता है कि दूसरी जगहों पर कुछ दूसरे लोग इसी तरह का या इससे बेहतर विकल्प बनकर सामने आएं, और स्थापित राजनीतिक दलों की यथास्थिति को चुनौती दें। हम ऐसी ही संभावना की उम्मीद में आज यहां पर एक बार फिर आम आदमी पार्टी की मिसाल पर कुछ लिख रहे हैं। 
इस पार्टी के भीतर आज इसके महिला विरोधी रूख को लेकर इस्तीफे शुरू हुए हैं, और सवाल शुरू हुए हैं। इस पार्टी के मुखिया को अपने अलावा बाकी अधिकतर नेताओं को भ्रष्ट मानने, समझने और कहने को लेकर बहुत से कानूनी नोटिस मिलने लगे हैं, और अदालती कार्रवाई से परे भी लोगों को यह लगने लगा है कि यह पार्टी एक तानाशाह अंदाज में लोगों के अच्छे और बुरे होने पर फैसले कर रही है। इसके अलावा इस पार्टी ने जनजीवन को ध्वस्त करके लोगों का ध्यान खींचने के अराजक तौर-तरीके को स्थापित करने की कोशिश की है, उसे जायज करार दिया है, और इससे भी लोग थके हुए हैं। इस पार्टी ने देश के नियम-कायदों, और दूसरे देशों के साथ भारत के संबंधों के प्रति एक भारी हिकारत दिखाते हुए सड़क और फुटपाथ पर अपनी मर्जी के अदालती फैसले सुनाने का काम किया है, और उसने भी इसकी संभावनाओं को घटाया है। 
आम आदमी पार्टी या इस किस्म के दूसरे विकल्प, ऐसी दूसरी संभावनाओं की बात करें, तो इनका अस्तित्व किसी राज्य या देश में स्थापित राजनीतिक दलों के कुकर्मों से बने एक बड़े शून्य की वजह से पैदा होता है। दिल्ली में केजरीवाल का आना इसी तरह का था, और दूसरे भी कुछ राज्यों में समय-समय पर नए राजनीतिक दल, नए नेता, स्थापित राजनीतिक दलों के गलत कामों की वजह से आते रहे हैं, और फिर जनता के बीच की एक तात्कालिक लोकप्रियता को सम्हाल न पाने की वजह से जाते भी रहे हैं, या फिर वे अपने चाल-चलन को बदलकर एक और स्थापित दल बनकर गलत कामों में जुट जाते रहे हैं। 
आम आदमी पार्टी के साथ एक दिक्कत यह है कि उसका कोई इतिहास नहीं है, उसका कोई अनुभव नहीं है, उसका कोई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय अस्तित्व नहीं है, और इन्हीं वजहों से उसकी कोई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय सोच नहीं है। कुछ हफ्तों पहले हमने इसी जगह लिखा था कि वह दिल्ली की एक म्युनिसिपल की तरह काम कर रही है जिसके जिम्मे पानी और बिजली जैसी स्थानीय जरूरतें हैं, और इस स्थानीय मिजाज के चलते आम आदमी पार्टी न किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी समझ देश के सामने रखती, और अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर उसकी सोच की तो अभी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जिस तरह वायुमंडल में बन गए एक शून्य में समुद्री हवा तेजी से पहुंचकर मौसम को बदल देती है, कहीं बारिश ले आती है, तो कहीं कुछ और, ठीक वैसे ही भ्रष्ट पार्टियों, भ्रष्ट सरकारों के पैदा किए हुए शून्य में आम आदमी पार्टी पहुंच गई। इस पहुंचने में इसकी खुद की कोई ताकत इस्तेमाल नहीं हुई, क्योंकि शून्य बाहर से हवाओं को खींचता है, दिल्ली के चुनावों में इस पार्टी को खींच लिया। 
लेकिन हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े मानवाधिकारवादी वकील प्रशांत भूषण जैसे लोगों के इस पार्टी के प्रमुख नेता रहते हुए, इस पार्टी के मन में भारत में रह रहे विदेशियों के प्रति, महिलाओं के प्रति, एक भारी हिकारत है, और इसकी सोच महिला विरोधी है, अलोकतांत्रिक है, नक्सलियों की तरह मौके पर खड़े होकर मनमर्जी का फैसला सुनाने की है। इस तरह यह पार्टी अपनी तस्वीर और अपने कामों के बीच एक भारी विरोधाभास का शिकार है। बहुत जल्दी बहुत कुछ कर गुजरने की हड़बड़ी इसे सोचने-विचारने का वक्त भी नहीं दे रही है। हम आज यहां पर इस पार्टी के बारे में नहीं लिख रहे, हम इसे एक मिसाल मानकर लिख रहे हैं, और इसलिए लिख रहे हैं कि ऐसा विकल्प बनना सिर्फ केजरीवाल का एकाधिकार नहीं है, आगे-पीछे देश में जगह-जगह ऐसे स्थानीय विकल्प बन सकते हैं, और ऐसी संभावना आने पर उनको यह समझना होगा कि वे सिर्फ नाली, बिजली, पानी की सोच से एक राजनीतिक दल खड़ा नहीं कर सकते, और न ही वे फुटपाथ पर अदालती इंसाफ का ढोंग कर सकते। 

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