बलात्कारी के परिवार की यातना देख लोग संभलें

24 फरवरी 2014
संपादकीय
देश भर से रोज बलात्कार की इतनी खबरें आती हैं कि दिल दहल उठता है। जब बलात्कार हो चुका रहता है तब मुजरिम या मुजरिमों की पकड़़-धकड़ शुरू होती है। कई मामलों में गिरफ्तारी होती है, कुछ मामलों में सजा। लेकिन इसे रोकने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है?
बलात्कार के बाद गिरफ्तारियों के आंकड़ें देखें तो पता लगता है कि काफी मामले परिवार के जानकार लोगों के ही किए हुए हैं या कामकाज के जानकार लोगों ने बलात्कार किए। बहुत से मामलों में दोस्त ने या उसके साथ मिलकर उसके दोस्तों ने बलात्कार किए। ऐसे मामलों को पुलिस कैसे रोक सकती है? किसी सुनसान जगह पर किसी लड़की या महिला को अकेले पाकर कोई बलात्कार करे, तो ऐसी हर अकेली लड़की या सुनसान जगह की निगरानी दुनिया की कोई भी पुलिस नहीं कर सकती। तो फिर बलात्कार रोकने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है, या कुछ भी नहीं?
यह मुद्दा लिखने के लिए बहुत आसान और सीधा नहीं है। इसके तार हर तरफ दूर तक जुड़े हुए हैं, फिर भी कुछ पहलुओं पर बात की जानी चाहिए, और हो भी सकती है। इनमें से कुछ बातें सरकार और अदालत के जिम्मे की हैं कि सरकार को लड़कियों और महिलाओं के लिए घर, समाज, और कामकाज की जगहें महफूज बनानी चाहिए। मामूली छेडख़ानी की शिकायत पर भी गंभीरता से कार्रवाई हो, तो भी ऐसे लोग बलात्कारी बनने से रूक सकते हैं। इसके बाद पुलिस की जांच, तेज रफ्तार सुनवाई और जल्द फैसला हो, तो भी उसका असर समाज के आगे बलात्कारी बनने वालों के हौसले पर पड़ सकता है। लेकिन जाहिर तौर पर दिखने वाली इन बातों से परे की कुछ बातों की चर्चा के लिए आज हम यहां इस मुद्दे पर लिख रहे हैं। 
बलात्कार करने वालों को अपने जुर्म से कुछ देर के लिए हो सकता है कि देह-सुख मिलता हो, एक अंदाज यह भी है कि बलात्कारी सेक्स-सुख के अलावा, या उसके बजाय, मर्दानी-हिंसा का सुख पाते हैं। इनमें से जो भी बात लागू होती हो, या कोई तीसरी-चौथी बात इसके पीछे हो, यह समझने की जरूरत है कि इस हिंसक-जुर्म के बाद खुद बलात्कारी का क्या होता है, उसके परिवार का क्या होता है? शायद ही कोई ऐसा बलात्कार होता होगा जिसमें परिवार के लोग इस जुर्म में बलात्कारी का साथ देते होंगे। और बलात्कारी अपने जिस किस सुख के लिए यह हिंसा करता है, उस सुख का कोई हिस्सा भी बलात्कारी के परिवार को नहीं मिलता। इसलिए एक तरफ बलात्कारी इस जुर्म के बाद बरसों के जेल, बरसों की कैद, और उसके बाद का अंधकार भरा भविष्य पाता है, उसका परिवार भी इन पूरे बरसों में निजी तकलीफ, सामाजिक अपमान की प्रताडऩा, आर्थिक तकलीफ, अदालत और जेल, मुकदमे के खर्च, इन सबको झेलता है।
यहीं पर हमारा मानना है समाज के भीतर एक जागरूकता की जरूरत है। जिन लोगों के बलात्कारी होने का खतरा रहता है, तकरीबन हर मामले में मर्द, उनके बीच खतरों को ठीक से पेश करने की जरूरत है। ऐसा नहीं लगता कि खतरों का पूरा अंदाज रहते हुए भी बलात्कारी यह जुर्म करेंगे। अधिकतर बलात्कारी शायद यह मानकर चलते हैं कि न तो शिकायत होगी, और न ही पुलिस कभी उन तक पहुंच पाएगी। इस खुशफहमी को भी तोडऩे की जरूरत है। और बलात्कारी शायद अपनी इसी खुशफहमी के चलते यह हौसला करते हैं। लेकिन शायद ही बलात्कारी उस मुसीबत और तबाही का अंदाज लगा पाते होंगे जो उनके परिवार पर इस जुर्म के बाद टूटना तय होता है। ऐसी आर्थिक, सामाजिक, और दिल-दिमाग की तबाही की तस्वीर अगर समाज के सामने पेश की जाए, तो शायद अधिकार संभावित बलात्कारी जुर्म के पहले ही थम जाएंगे। समाज के भीतर की तबाही की ऐसी कहानियों को बिना नाम के सबके सामने रखना जरूरी है। आज बलात्कार की खबर गिरफ्तारी, मुकदमे, और सजा के बाद खत्म हो जाती हैं। बलात्कारी के परिवार की यातना और तबाही की मिसालें, बिना शिनाख्त के, लोगों के सामने रखनी चाहिए। इससे पैदा होने वाली जागरूकता लोगों को पटरी पर बने रहने में मदद मिल सकती है। 

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