27 फरवरी 2014
संपादकीय
भारतीय नौसेना की दो पनडुब्बियों के साथ साल भर में हुए दो हादसों के बाद नौसेना प्रमुख एडमिरल वी.के. जोशी ने कल कुछ घंटों के भीतर ही इस्तीफा दे दिया, और केन्द्र सरकार ने बिजली की रफ्तार से उसे सीधे-सीधे मंजूर भी कर लिया। नौसेना के जानकार बताते हैं कि एडमिरल जोशी अपने मातहतों से ऊंची उम्मीदें रखते थे, और कड़ी कार्रवाई के लिए जाने जाते थे। उन्होंने शायद अपने उसी ऊंचे पैमाने के तहत यह इस्तीफा दिया है, लेकिन उसे जिस रफ्तार से मंजूर किया गया, वह कुछ हैरान करता है।
केन्द्र और राज्य सरकारों में मंत्रियों या अफसरों के ऐसे इस्तीफे पुरानी कहानियां बन गए हैं। एक बार एक रेल दुर्घटना के बाद रेलमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इस्तीफा दिया था, एक बार माधव राव सिंधिया ने एक विमान दुर्घटना के बाद इस्तीफा दिया था, और ऐसे कुछ और मामले भी बहुत पहले नैतिकता के आधार पर होते थे। लेकिन हाल के बरसों में नैतिकता के आधार पर इस्तीफे तो दूर रहे, अब तो लोग भ्रष्टाचार के लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार होने के बाद भी जेल के भीतर पहुंच जाने पर भी मंत्री बने रहने की हसरत रखते हैं। इसलिए विभाग के मुखिया होने के नाते नैतिकता का इस्तीफा अब पुराने फैशन की बात हो गई है।
लेकिन हम ऐसे इस्तीफों के बहुत हिमायती भी नहीं हैं। सरकार चलाने में मंत्री या अफसर का एक महत्व होता है, और उनकी निरंतरता सरकार में अधिकतर जगहों पर मायने भी रखती है। एकाएक मुखिया मंत्री या अफसर छोड़कर निकल जाएं, तो उससे एक छोटा या बड़ा शून्य पैदा होता है, और काम रूकता है। इसलिए जब तक कोई जिम्मेदारी न बने, हम महज नैतिकता के आधार पर इस्तीफे के पक्ष में नहीं हैं। होना तो यह चाहिए कि जब तक दूसरे लोग, कोई जांच, सरकार के मुखिया, अदालत, किसी विभाग के मुखिया मंत्री-अफसर को जिम्मेदार न पाएं, तब तक हादसे पर इस्तीफे ठीक नहीं हैं।
सरकार में बहुत अधिक स्थायित्व, और निरंतरता भी कुछ खतरे की बात होती हैं, लेकिन निरंतरता न होना भी खतरे की बात होती है। भारत जैसे लोकतंत्र में जब अलग-अलग राज्यों में हर कुछ बरस में लोकसभा, विधानसभा, पंचायत-म्युनिसिपल के चुनाव होते हैं, और उनमें मंत्रियों से लेकर अफसरों तक, और निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधियों तक में फेरबदल होता है, तो उससे नीतियों, फैसलों, और उनके अमल पर फर्क पड़ता है। कभी निर्वाचित प्रतिनिधि बदलते हैं, कभी उनकी पसंद और नापसंद के आधार पर अफसर बदलते हैं, और कभी पूरी की पूरी निर्वाचित संस्था बदल जाती है। हर बरस दो बरस में अगर ऐसे बड़े बदलाव होते हैं, तो उसका नुकसान इसलिए होता है क्योंकि वे मतदाताओं की पसंद-नापसंद से लेकर निर्वाचित नेताओं और बड़े अफसरों की पसंद-नापसंद से होने वाले बदलाव होते हैं। इसलिए इसके साथ-साथ अगर नैतिकता के आधार पर बड़े नाजुक और अहमियत वाले ओहदों पर बैठे लोग तुरंत इस्तीफा दे दें, तो उनको उसी रफ्तार से मंजूर करना हमारे हिसाब से एक गलत फैसला है।
फौज के बहुत से मामले ऐसे होते हैं, जिनमें चाहकर भी हादसों को रोकना हर वक्त मुमकिन नहीं होता। हम तो छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में नक्सल मोर्चे पर तैनात पुलिस को देखते हैं, जिनके साथ में कई केन्द्रीय सुरक्षा बल काम कर रहे हैं, और तमाम सावधानियों के बावजूद नक्सलियों के हाथ बहुत से लोग शहीद होते हैं। लेकिन ऐसे में हर बार बड़े या छोटे, मंत्री या अफसर अगर इस्तीफा देने लगें, तो उससे कोई हल नहीं निकलेगा। जो जिम्मेदारी के काम करते हंै, उन्हीं के मातहत तो चूक या हादसा हो सकता है। और ऐसे में मुखिया को डटकर खड़े रहना चाहिए, जब तक कि मुखिया की खुद की लापरवाही, चूक में हिस्सेदारी का सीधा जिम्मा उस पर न आता हो। हमने बात की शुरुआत नौसेनाध्यक्ष के इस्तीफे से की है, लेकिन हमारा मकसद इसे भारत जैसे देश में केन्द्र और राज्य के बाकी नेताओं-अफसरों के बारे में भी अपनी राय रखना है। ऐसे इस्तीफे कोई इलाज नहीं हैं, और गैरजरूरी भी हैं।

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