6 फरवरी 2014
संपादकीय
लोकसभा का यह आखिरी सत्र शुरू हुआ है, और शायद अपनी जिम्मेदारी पूरी किए बिना खत्म भी हो जाएगा। दरअसल कई मुद्दों को लेकर संसद में जैसा हंगामा चल रहा है, वैसा हंगामा भारत जितने बड़े लोकतंत्र में साल के हर दिन चल सकता है। कभी तेलंगाना पर, तो कभी किसी आतंकी हमले पर, तो कभी सरहद पर किसी फौजी की शहादत को लेकर, किसी न किसी मुद्दे को लेकर संसद को रोका जा सकता है। लेकिन ऐसे हंगामों के बीच अगर देखें कि सचमुच में रूक क्या रहा है, तो यह संसद नहीं रूक रही है, क्योंकि ये पन्द्रहवीं संसद तो चलाचली की बेला में है ही, उसका कार्यकाल खत्म हो ही रहा है। रूक रहा है तो महिला आरक्षण रूक रहा है, भ्रष्टाचार के खिलाफ कहीं कोई प्रस्तावित कानून रूक रहा है, और कई किस्म के दूसरे जरूरी काम रूक रहे हैं। हम यह देखकर हक्का-बक्का हैं कि संसद में जो प्रमुख विपक्षी दल भाजपा है, और उसके साथ एनडीए के उसके दूसरे साथी दल हैं, वे भी संसद के भीतर के हंगामों में शामिल होकर ऐसे कानूनों को रोक रहे हैं जो कि बरसों से संसद में खिंचते चले आ रहे हैं। महिला आरक्षण तो तब से चले आ रहा है जब एनडीए की सरकार थी, और लोकसभा में आज विपक्ष की नेता एक महिला है, फिर भी इसे हकीकत बनाने में सुषमा स्वराज का हाथ नहीं दिख रहा।
लोकतंत्र लोगों को इतनी आजादी देता है कि वे कोई भी काम अमूमन कहीं भी कर सकते हैं। लोग दफ्तरों में काम करने के बजाय सो सकते हैं, बगीचों में घूमने के बजाय वहां सिगरेट पी सकते हैं, साफ जगहों को थूककर गंदा कर सकते हैं, हर कोने पर पेशाब कर सकते हैं, और हर खुली जगह पर पखाना कर सकते हैं। लोकतंत्र में लोग स्टेडियम में जाकर कानून बना सकते हैं, सरकार चलाने के बजाय आंदोलन कर सकते हैं, जेल में रहते हुए राजनीतिक दल के मुखिया रह सकते हैं, बड़े-बड़े जुर्म के दाग लगने के बाद भी विधानसभा और संसद में जा सकते हैं। ऐसे में संसद के भीतर कानून बनाने के जिम्मेदार लोग, बहुत थोड़े से बचे वक्त में भी अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय हंगामा कर सकते हैं। इस देश में लोकतंत्र इतनी आजादी देता है कि सांसद सोच की जगह पर जाकर, रियायती खाकर, बिना कोई काम किए, महज शौच करके वापिस आ सकते हैं, और मोटा भत्ता ले सकते हैं, विशेषाधिकारों की जिंदगी जी सकते हैं। हमको यह भी हैरानी होती है कि अपनी बुनियादी जिम्मेदारी को पूरा करने के बजाय, बाकी हर किस्म के गैरजरूरी हंगामे खड़े करने के बाद लोग लौटकर चैन से किस तरह सो जाते हैं? शायद मुफ्त के बंगले, मुफ्त के गद्दे, मुफ्त का ऐशोआराम उनको ऐसे सोने में मदद करता होगा, और उनके सीने पर कोई बोझ भी नहीं आने देता होगा।
आज दिक्कत यह है कि संसद के भीतर ऐसी गैरजिम्मेदारी की तोहमत किस पर लगाई जाए, और किस पर नहीं, यह तय कर पाना कुछ मुश्किल लगता है। लेकिन हम चूंकि सत्ता की बेंचों, और विपक्ष की बेंचों, दोनों से परे बैठे हैं, इसलिए हमको इन दोनों पर मिला-जुलाकर इस तोहमत को डालने में कोई दिक्कत नहीं है। संसद हो या विधानसभाएं, ये न सत्ता की जागीर होतीं, न ही विपक्ष की। और हम इस बात को भी नहीं मानते कि किसी प्रस्तावित विधेयक को कानून बनवाना अकेले सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है। यह जिम्मा ऐसे सदनों में बैठे हुए हर किसी का होता है, और यह संसद विपक्ष को भी यह हक देती है कि वे भी वहां कोई प्रस्ताव रख सकते हैं, जिस पर चर्चा हो सकती है, मतदान हो सकता है। ऐसा अधिकार सिर्फ इसलिए नहीं मिलता कि विपक्ष वहां हंगामा करते रहे, और जरूरी काम रूका रह जाए। आज अगर लोकसभा के इस आखिरी सत्र में भी महिला आरक्षण जैसे विधेयक कानून और हकीकत नहीं बन सकते, तो हम देश की इस आधी आबादी की तरफ से ही नहीं, देश में इंसाफपसंद हर किसी की तरफ से ऐसी संसद के भीतर के लोगों को धिक्कारते हैं। अपना जिम्मा पूरा किए बिना इस गरीब देश की गरीब जनता के पैसों से खाना, इसके लिए हिन्दी, ऊर्दू, और बाकी जुबानों में भी एक गाली है। सांसद खुद ही डिक्शनरी में अपने लिए इस शब्द को ढूंढ लें।

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