संपादकीय
16 जून 2018

पिछले एक बरस में शायद सौ से अधिक बार डीजल और पेट्रोल के दाम बढ़े हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों से इसे जोड़ दिया गया है, और वहां भाव बदलते हैं तो हिन्दुस्तान में सरकार कई किस्म के अपने टैक्स और ड्यूटी कम-ज्यादा करके लोगों की जेब से अधिक से अधिक उगाही करने की तरकीब निकाल लेती है। इसके बाद राज्यों के टैक्स की बारी आती है और कुल मिलाकर पेट्रोल डीजल को सीधे या सामानों के लिए इस्तेमाल करने वाली जनता की कमर टूट रही है। लेकिन इस सिलसिले के चलते हुए भी जो दूसरी बड़ी परेशानी है, वह है रोजाना बदलने वाले रेट की। जो लोग पेट्रोल पंप पर जाकर ईंधन डलवाना चाहते हैं, उन्हें खुद यह पता नहीं होता कि उस दिन का रेट क्या है, और सीमित पैसों वाले लोग लीटर के बजाय रकम का पेट्रोल डलवाते हैं।
इस सरकारी बेवकूफी को खत्म करके एक आसान रास्ता निकालने की जरूरत है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार के भाव कम-ज्यादा होने से भारत में खुदरा बिक्री के रेट बदलने हैं, तो उसके लिए हफ्ते का एक दिन तय कर देना चाहिए। हर सोमवार उस हफ्ते के लिए नए रेट आ जाएं, और लोग शनिवार-इतवार के खाली वक्त में चाहें तो पेट्रोल पम्प हो आएं। पेट्रोलियम से नफा-नुकसान रोजाना की बिक्री से जुड़ी हुई बात नहीं है। कई लाख करोड़ रूपए का एक आईलपूल पहले से चले आ रहा है जिसमें नफा या नुकसान इक_ा होते रहता है। सरकार को यह चाहिए कि एक हफ्ते के लिए रेट तय करना शुरू करे, और इस पर भी केन्द्र और राज्य के टैक्सों का ढांचा ऐसा होना चाहिए कि वह कुछ-कुछ पैसे कम-ज्यादा होने के बजाय सीधे रूपयों में कम-ज्यादा हो। अगर सरकार को इससे बचत होती हो, तो अगले हफ्ते रेट कम बढ़ें, और अगर इस हफ्ते नुकसान हो गया हो, तो अगले हफ्ते रेट ज्यादा बढ़े।
रोज डीजल-पेट्रोल के रेट बढ़ाना-घटाना एक परले दर्जे की बेवकूफी के अलावा और कुछ नहीं है। लोगों को, खासकर गरीब लोगों को अपने खर्च का अंदाज नहीं लगता, जेब में रखे हुए सीमित पैसे बार-बार टटोलने होते हैं। देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज डीजल-पेट्रोल का सीधा ग्राहक है। ऐसे में जनता की सुविधा को देखते हुए भी सरकार अपनी कमाई जारी रख सकती है। समझदार सरकार तो तेल कंपनियों को महीने में एक बार भाव घटाने-बढ़ाने के लिए कहती, और हर महीने अगले-पिछले महीनों का नफा-नुकसान बराबर कर लिया जाता।
आज देश की जनता को एक होकर यह मांग भी करनी चाहिए कि राज्य सरकारें डीजल-पेट्रोल पर अपना टैक्स घटाएं। केरल ने ऐसा किया है, और हर राज्य ऐसा कर सकते हैं। आज दिक्कत यह है कि सस्ते तेल पर भी केन्द्र सरकार लूट के अंदाज में टैक्स-ड्यूटी लगा रही है, और उसके लग जाने के बाद जो रेट बनता है, उस पर राज्य सरकार का टैक्स लग जाता है, और राज्यों को बिना किसी कोशिश के, बिना किसी जायज हक के, यह अतिरिक्त टैक्स मिल जाता है। गरीबों से ईंधन पर इतना टैक्स लेने के बजाय महंगी गाडिय़ों और दुपहियों पर खरीदी के वक्त ही इतना सालाना टैक्स तय कर देना चाहिए जो कि उनकी औसत खपत के आधार पर हो। महंगी गाडिय़ों को पेट्रोल पंप से तो डीजल-पेट्रोल महंगा अलग से बेचना मुमकिन नहीं है, लेकिन उनसे गाड़ी खरीदते समय ही अधिक टैक्स लिया जा सकता है। इसे लेने का एक दूसरा तरीका उन महंगी गाडिय़ों पर आयकर की छूट को खत्म करके निकाला जा सकता है जो ईंधन का खर्च बताकर आयकर में छूट पाती हैं। आयकर में छोटी गाडिय़ों पर ही ईंधन छूट मिलनी चाहिए, और बड़ी गाडिय़ों को इससे बाहर कर देना चाहिए। इससे भी सरकार बड़ी गाडिय़ों से ईंधन पर एक किस्म से वसूली कर सकेगी। डीजल और पेट्रोल की बिक्री की जगहों पर कोई फर्क करना मुमकिन नहीं है, लेकिन लाखों रूपए दाम की मोटरसाइकिलों को छोटे दुपहियों के दाम पर ईंधन क्यों दिया जाए? केन्द्र सरकार आज मनमाने तरीके से डीजल-पेट्रोल से उगाही कर रही हैं। इसे अधिक युक्तिसंगत और न्यायसंगत बनाने की जरूरत है।(Daily Chhattisgarh)
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