संपादकीय
18 जून 2018

लंदन की एक रिपोर्ट है कि किस तरह वहां शहर के बीच एक शॉपिंग सेंटर में करीब सौ लोगों को सोने और रहने की कानूनी इजाजत मिली है। क्योंकि इनके पास रहने के लिए कोई और जगह नहीं है। बस इन लोगों को लोहे की जाली की एक आड़ लगाकर शॉपिंग सेंटर के ग्राहकों से अलग रखा जाता है, और इन्हें वहां से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक वे ग्राहकों के लिए कोई परेशानी खड़ी न करें। लेकिन अधिक चौंकाने वाली बात यह भी है कि ऐसे बेघर लोगों में रिटायर्ड फौजी भी शामिल हैं। वैसे तो इस बात से हिन्दुस्तान जैसे देश का अधिक लेना-देना नहीं है क्योंकि यहां तो देश के हर स्टेशन पर, शहर की हर सार्वजनिक जगह पर बेघर लोग, बीमार और विचलित लोग, बूढ़े और घर छोड़ चुके बच्चे देखे जा सकते हैं। लेकिन आज सुबह लंदन की इस खबर के साथ-साथ भारत के सरकारी टीवी, दूरदर्शन, पर भारतीय राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का एक किसी दूसरे देश में दिया गया भाषण आ रहा था जिसमें वे बता रहे थे कि किस तरह 2025 तक भारत दुनिया का तीसरे नंबर का ग्राहकी वाला देश हो जाएगा।
देश की कमाई या देश के लोगों की ग्राहकी की ताकत के आंकड़े प्रति व्यक्ति के औसत आंकड़े रहते हैं। इनमें अंबानी या अदानी की कमाई और एक फुटपाथी बेघर की कमाई का औसत निकलता है, और ये आंकड़े महज आंखों में धूल झोंकने का काम करते हैं, उनका और किसी हकीकत से कुछ लेना-देना नहीं रहता। लोगों को याद होगा कि बहुत पहले पश्चिम के एक नेता ने कहा था कि झूठ तीन किस्म के होते हैं, झूठ, सफेद झूठ, और आंकड़े। इसलिए सरकार के गिनाए गए आंकड़े बहुत से मामलों में एक झूठी तस्वीर पेश करने के काम आते हैं, और शायद उसी मकसद से उनका इस्तेमाल भी किया जाता है। कल दिल्ली में नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री ने देश की औसत विकास दर 10 फीसदी से ऊपर ले जाने का इरादा जाहिर किया है। इससे हो सकता है कि पूरा देश एक अधिक संपन्नता की ओर बढ़े, लेकिन ऐसे आंकड़ों के साथ-साथ अनिवार्य रूप से यह तस्वीर भी पेश करना चाहिए कि देश के सबसे कमजोर तबके की हालत कितनी सुधरी है, और सबसे संपन्न तबके की हालत कितनी? ऐसी तुलना के खिलाफ कई किस्म के तर्क दिए जा सकते हैं, लेकिन ऐसी तुलना से ही सरकार को एक ऐसी तस्वीर पर सोचने की मजबूरी आ सकती है जिसमें समाज के सबसे कमजोर तबकों के बारे में फिक्र करनी ही होगी।
गांधी से लेकर दूसरे कई नेताओं और चिंतकों ने समय-समय पर समाज के सबसे कमजोर लोगों के बारे में कई अलग-अलग शब्दों में फिक्र जाहिर की है। गांधी ने दरिद्रनारायण कहा, तो किसी और ने पंक्ति में खड़े हुए आखिरी इंसान की बात की। अब दरिद्र को नारायण कहते हुए उसे दरिद्र ही बनाकर रखा जाए, यह बहुत बड़ी बेइंसाफी है। देश की अर्थव्यवस्था और विकास के जितने आंकड़े होते हैं, उनमें से बहुत कम आंकड़े सबसे कमजोर तबके पर केन्द्रित रहते हैं। ऐसा इसलिए भी किया जाता है कि उदार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की फिक्र करते हुए हिन्दुस्तान के शासकों को कोई दिक्कत न हो, और दुविधा न हो। अगर अमीरों और गरीबों के बीच फासले पर अधिक चर्चा होगी, अगर यह देखा जाएगा कि देश की पूंजी किस तरह महज कुछ गिने-चुने हाथों में केन्द्रित हो चुकी है, और यह सिलसिला बढ़ते भी चल रहा है, तो यह बात अधिक लुभावनी नहीं रह जाएगी, और राजनीतिक असुविधा की भी होगी। इसलिए आज लंदन की जैसी तस्वीरें यहां सामने आई हैं जिनमें महंगे शॉपिंग मॉल में महंगी खरीददारी करते लोगों से कुछ कदम दूर जाली से अलग रखे गए गरीब और बेघर लोग दिख रहे हैं, वैसी तस्वीरें हिन्दुस्तान के आंकड़ों से भी सामने आ सकती हैं। भारत जैसे असमानता वाले देश में यह बात जरूरी है कि देश के औसत आंकड़ों से परे सबसे गरीबों के आंकड़े अलग तैयार किए जाएं, उनको अलग से पेश किया जाए, और यह देखा जाए कि आसमान छूती इमारतों में रहने वाले लोग अपने आसपास की झोपड़पट्टियों के मुकाबले हर बरस कितने ऊपर हुए चले जा रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में उसकी जगह के आंकड़े देश के भीतर की हकीकत को नहीं बताते, इसके लिए वर्गभेद करके गरीबों का एक अलग दर्जा बनाना ही होगा। (Daily Chhattisgarh)
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