पुलिस-परिवारों से बात न करना सरकार की चूक

संपादकीय
25 जून 2018


छत्तीसगढ़ में रमन सरकार बहुत सा अच्छा काम करने के बाद भी अलग-अलग लोगों की चूक से एक के बाद दूसरी परेशानी में फंस रही है। महासमुंद में निर्दलीय विधायक डॉ. विमल चोपड़ा को पुलिस ने जिस तरह लाठियों से पीटा है, और उनके अलावा वहां के खिलाड़ी बच्चों को भी मारा है, उससे पूरे राज्य में सरकार के खिलाफ नाराजगी है। खिलाड़ी स्कूल और कॉलेज के छात्र-छात्राएं ही होते हैं, और जब उनकी हड्डियां तोड़ी जा रही हैं, तो फिर उनकी बिरादरी के बाकी बच्चों के बीच, खिलाडिय़ों के बीच, और शिक्षकों के बीच एक नाराजगी जायज है। और यह पूरा मामला छेडख़ानी की शिकायत को लेकर शुरू हुआ, बददिमागी के लिए पहले से बदनाम एक नौजवान आईपीएस अफसर की चलवाई लाठियों पर जाकर खत्म हुआ। यह हैरानी की बात है कि एक प्रशिक्षु अफसर पहले बिलासपुर अब महासमुंद में इस तरह की हिंसा करने की छूट पाता है, और उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती। महासमुंद से बहुत दूर, सरगुजा के भाजपा नेता और राज्यसभा सदस्य रामविचार नेताम ने इस पर साफ-साफ कहा है कि लोकतंत्र में ऐसे अफसरों की कोई जगह नहीं है। 
सरकार की गलती या उसके गलत कामों की एक दूसरी मिसाल भी पुलिस से ही जुड़ी हुई है। पुलिस कर्मचारियों के काम की बेहतर स्थितियों को लेकर उनके परिवार आंदोलन कर रहे हैं, और इसे राजद्रोह करार दिया जा रहा है। गृहमंत्री अपने मातहत इस विभाग की बुनियादी दिक्कतों को दूर करने के बजाय एक लापरवाह बयान दे रहे हैं कि न मांगें पूरी होंगी, न आंदोलन करने दिया जाएगा। जबकि मुख्यमंत्री के तेवर इस आंदोलन को लेकर समझदारी के हैं, गृहमंत्री और कुछ अफसर इसे संवेदनाशून्य तरीके से निपटा रहे हैं। सरकार पूरी ताकत लगाकर पुलिस-परिवारों को आंदोलन तक पहुंचने से तो रोक सकती है, लेकिन क्या इन परिवारों को चुनाव के दिन मतदान केंद्र तक पहुंचने से भी रोक सकेगी?
अधिक वक्त नहीं हुआ है जब सरगुजा के पत्थरगड़ी आंदोलन को लेकर भी छत्तीसगढ़ के अकेले केंद्रीय मंत्री सहित राज्य के कुछ मंत्रियों और कुछ नेताओं ने इसकी तोहमत चर्च पर डालने की कोशिश की, कुछ ने इसे नक्सलियों से जोडऩे की कोशिश की, और कुछ ने इसे राजद्रोह करार दिया। अब अगर बात-बात में राजद्रोह का कानून इस्तेमाल होने लगेगा, तो लोगों को यह भी लगेगा कि अगर वे देश के गद्दार ही करार दिए जा रहे हैं, तो फिर वे सचमुच ही इस राष्ट्र से द्रोह न सही, कम से कम इस राज से द्रोह तो कर ही दें। हमने इसी जगह कुछ दिन पहले ही पुलिस-परिवारों के आंदोलन के पीछे की वजहों पर लिखा है, इसलिए उन तमाम बातों को आज फिर दुहराना ठीक नहीं है। लेकिन सरकार अगर महज पुलिस की लाठियों से पुलिस-परिवारों को, औरतों और बच्चों को काबू करना चाह रही है, उनकी मांगों पर बातचीत तक मुनासिब नहीं समझ रही है, तो यह सरकार का जनकल्याणकारी रूख नहीं है। सरकार को अपनी जनता से हर हाल में बातचीत के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में बातचीत से अधिक लोकतांत्रिक और कोई जरिया नहीं है। अभी तक तो छत्तीसगढ़ में पुलिस वर्दीवाले किसी ने कोई बगावत नहीं की है जैसा कि उत्तरप्रदेश या बिहार में अलग-अलग वक्त पर हो चुका है। लेकिन सरकार को इस रूख को समझना चाहिए, और इसे एक खराब मौसम के आसार मानकर पुलिस-परिवारों से बात करनी चाहिए। इसी प्रदेश में कांगे्रस पार्टी आमजनता से, अलग-अलग तबकों से राय मांग रही है कि वह अपने चुनावी घोषणा-पत्र में किन मुद्दों को शामिल करे, ऐसे में भाजपा अगर एक सरकार के रूप में न सही, एक पार्टी के रूप में भी तकलीफ से गुजर रहे पुलिस-परिवारों से बात नहीं करेगी, तो इसमें उसका ही नुकसान है। (Daily Chhattisgarh)

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