ठोस कचरा निपटारा में कामयाबी बाकी देश में दोहराने की जरूरत

संपादकीय
9 जून 2018


दिल्ली में देश के सबसे बड़े पर्यावरणवादी-संगठन, सीएसई, ने अभी शहरों के ठोस कचरे के निपटारे पर एक दिन का एक कार्यक्रम रखा जिसमें उन शहरों को बुलाया गया था जहां कचरा उठाने के साथ-साथ उसे अलग-अलग किस्मों में बांटने का काम चल रहा है। इसमें छत्तीसगढ़ के दो म्युनिसिपल शामिल थे, अम्बिकापुर, और राजधानी रायपुर से लगा हुआ बीरगांव। इन दोनों के म्युनिसिपल अफसरों के साथ-साथ अम्बिकापुर में ठोस कचरा प्रबंधन की शुरूआत करने वाली कलेक्टर रहीं रितु सेन को भी बोलने का मौका मिला। हालांकि दक्षिण और पश्चिमी भारत के शहर-कस्बों को कचरे के निपटारे में बेहतर पाया गया, और उन्हें पुरस्कार मिले, लेकिन छत्तीसगढ़ के प्रयोगों की भी तारीफ हुई।
इस आयोजन से जो बात निकलकर सामने आई वह भारी दिलचस्प बात है, और यह लोगों की उम्मीदों से कहीं बेहतर है। पहली बात तो यह कि ठोस कचरे का योजनाबद्ध निपटारा खर्च बढ़ा नहीं रहा है, बल्कि घटा रहा है, और म्युनिसिपलों को उससे कमाई हो रही है, या बचत हो रही है। दूसरी बात यह कि भारत के बड़े शहरों में कचरा ठिकाने लगाने के लिए खाली जगह या बंद खदानें ढूंढी जा रही थीं, और अब देश भर में दर्जनों शहरों में कामयाब प्रयोग करके यह साबित कर दिया है कि कचरे को बचाकर नहीं रखना है, उसका निपटारा करना है, और इसके लिए किसी जगह की जरूरत नहीं है। इसे आसान शब्दों में समझे तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जिस तरह कचरा-मैदान, यानी ट्रेंचिंग ग्राउंड की जगह तलाश की जाती है, और फिर आसपास के लोग जिस तरह विरोध करते हैं, उस सबकी कोई जरूरत ही नहीं है अगर म्युनिसिपल अक्ल से काम करे। थोड़ी सी समझ और थोड़ी सी योजना मिलकर किसी भी कस्बे या शहर का कचरा-खर्च कई गुना घटा सकती हैं। ये दो बातें पर्यावरण के हिसाब से इसलिए बहुत अच्छी हैं कि कामयाब शहर-कस्बों ने यह साबित कर दिया है कि कचरे को शहर के बाहर ले जाने की जरूरत ही नहीं है, और उसे शहर के भीतर कई जगहों पर निपटाया जा सकता है जिससे कि ट्रांसपोर्ट का खर्चा घटकर कई गुना कम हो गया है। इसके साथ-साथ जब गाडिय़ां गैरजरूरी दूरी नहीं चलेंगी, तो डीजल का धुआं भी घटेगा और ट्रैफिक जाम भी घटेगा। देश भर के शहरों की कामयाबी के साथ यह बात भी जुड़ी रही कि कचरा उठाने वाले हजारों-लाखों लोगों का रोजगार छीने बिना ही यह काम किया गया है, और किसी शहर में किसी बड़ी कंपनी को कचरे का ठेका देने से कामयाबी नहीं मिली है। देश में सबसे साफ शहर ठहराए गए इंदौर में भी कचरे का ठेका नहीं दिया गया है, और म्युनिसिपल खुद उसे उठाती है।
दुनिया में कचरे को लेकर जो दहशत फैली हुई है, उसे हिंदुस्तान में कम से कम कुछ दर्जन शहरों ने तो घटाने का काम किया है। दो दर्जन से अधिक जिन शहरों को सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरामेंट ने इस सर्वे में शामिल किया था, उन सबकी बड़ी कामयाब कहानियां हैं, और इन सबने पिछले दो-चार बरस के भीतर ही कचरे के निपटारे पर काबू पा लिया है। कामयाबी की इन कहानियां को देखकर लगता है कि छत्तीसगढ़ के नगरीय प्रशासन विभाग या यहां के म्युनिसिपलों को भी कचरा-ठेकेदार कंपनी तय करने के बजाय ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे पूरी जिंदगी से कचरा बीनकर शहरों को जिंदा रखने वाले लोगों को भी रोजगार मिलना जारी रहे, और कचरा खदानों और मैदानों को न भरे, बल्कि उसका निपटारा हो, और वह धरती के दुबारा काम आ जाए। आमतौर पर पर्यावरण से जुड़े हुए मुद्दे निराशा पैदा करते हैं, और दहशत भरते हैं कि आने वाला कल और बुरा होगा। लेकिन ठोस कचरा निपटारा में दर्जनों शहरों की बड़ी कामयाबी बाकी देश में दोहराने की जरूरत है। देश के हर राज्य और उनके भीतर की म्युनिसिपलों को चाहिए कि बिना देर किए हुए ऐसे कामयाब प्रयोगों से सीखे, और अपने-अपने लोगों को कचरे से बचाए। (Daily Chhattisgarh)

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन चौधरी दिगम्बर सिंह और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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