पुलिस-परिवारों का आंदोलन सरकार आनन-फानन नतीजे न निकाले, मुद्दों पर गौर करे

संपादकीय
19 जून 2018


छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव को बस कुछ ही महीने बाकी हैं, और कर्मचारियों के तमाम किस्म के संगठन अपनी मांगों को लेकर आंदोलन पर हैं क्योंकि यह किसी दूर की जगह जाने वाली रात की आखिरी बस जैसा हाल है, अभी नहीं, तो (इस सरकार में) कभी नहीं। मुख्यमंत्री ने भी कुछ दिन पहले यह कहा है कि चुनाव का साल है इसलिए सभी लोग आंदोलन तो करेंगे ही। लेकिन बाकी कर्मचारी-आंदोलनों से परे एक नए किस्म का आंदोलन एकदम से सुलग रहा है जो कि कुछ हैरान करने वाला है। पुलिस कर्मचारी चूंकि नियम-कानून के मुताबिक कर्मचारी संघ नहीं बना सकते, और आंदोलन नहीं कर सकते, इसलिए उनके परिवारों के लोग उनके हक की मांग करते हुए आंदोलन कर रहे हैं, और प्रदेश के कई शहरों में पुलिस कर्मियों की पत्नियों को धरना देते, मांग पत्र देते, नारे लगाते देखा गया है। राजधानी रायपुर में भी पुलिस-परिवारों ने धरने की इजाजत मांगी है। 
अब यह स्थिति कुछ जटिल है क्योंकि परिवारों के ऊपर तो कोई शासकीय सेवा नियम लागू होते नहीं हैं। और कल इस बारे में राज्य सरकार की एक सर्वोच्च स्तरीय बैठक के बाद गृहमंत्री ने यह बयान दिया है कि इस आंदोलन को कुछ बर्खास्त और कुछ निलंबित पुलिस वाले हवा दे रहे हैं। इतनी जल्दी गृहमंत्री का किसी नतीजे पर पहुंचकर, और ऐसा बयान देना कुछ अटपटा भी है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि इसी गृहमंत्री ने कुछ हफ्तों पहले सरगुजा के इलाके में शुरू हुए आदिवासियों के पत्थलगड़ी आंदोलन को लेकर भी आनन-फानन यह बयान दिया था कि यह धर्मांतरण करने वाले लोगों का शुरू किया हुआ आंदोलन है। लेकिन अब इन कुछ हफ्तों में ही आदिवासियों की एक व्यापक भागीदारी इस आंदोलन में सामने आई है जो कि ईसाई बने हुए आदिवासियों से परे की भी है। और इसे महज ईसाई-आदिवासियों का आंदोलन करार देना सही साबित नहीं हुआ है। आज पत्थलगड़ी आंदोलन को खुलकर ऐसे आदिवासी नेता सम्हाल रहे हैं जो कि गैरईसाई हैं। इसलिए राज्य सरकार में बैठे लोगों को इस बात से थोड़ा सा सबक लेना चाहिए कि बंद कमरे में उनके निष्कर्ष चाहे जो हों, उन्हें सार्वजनिक बयान देते हुए जटिल मुद्दों के अतिसरलीकरण से बचना चाहिए, और जहां पर कोई व्यापक समुदाय जुड़ा हुआ हो, वहां पर किसी छोटे से तबके को निशाना बनाते हुए सब पर तोहमत नहीं लगानी चाहिए। 
हो सकता है कि पुलिस के कुछ निलंबित और बर्खास्त कर्मचारी इस आंदोलन के पीछे हों, लेकिन राज्य सरकार को इस आंदोलन के मुद्दे देखना चाहिए, और पुलिस परिवारों की तकलीफों के बारे में भी देखना चाहिए। मुद्दों पर किसी चर्चा के बिना उनके पीछे के लोगों और उनकी नीयत भर की बात करना न तो राजनीतिक समझदारी है, और न ही किसी जिम्मेदार और जनकल्याणकारी सरकार को ऐसा करना चाहिए। यह बात जाहिर है कि देश के और बहुत से राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी पुलिस कर्मचारियों के काम की स्थितियां मुश्किल हैं, और अमानवीय हैं। वे अपने परिवारों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं, और बाकी देश की तरह यहां भी पुलिस परिवारों के बच्चे उपेक्षित रह जाते हैं, और बहुत से मामलों में बिगड़ भी जाते हैं। काम के घंटे असीमित रहते हैं, काम की स्थितियां खतरनाक रहती हैं, सड़कों पर धूल, धुआं, और धूप झेलते हुए काम करने से लेकर बस्तर में नक्सल-मोर्चे पर शहादत तक, अनगिनत ऐसी दिक्कतें और खतरे पुलिस कर्मचारी ही झेलते हैं, जो कि सरकार के किसी और दूसरे विभाग के लोग नहीं झेलते। इसलिए सरकार को पुलिस-परिवारों की मांगों पर आक्रामक होने के बजाय यह सोचना चाहिए कि राज्य शासन का गृहविभाग समय रहते इन दिक्कतों को अब तक सुलझा क्यों नहीं पाया, और आज जब ये मांगें सामने हैं, तो इनको न्यायसंगत और तर्कसंगत पैमाने पर तौलना चाहिए। 
यह एक अभूतपूर्व स्थिति है कि किसी कर्मचारी-तबके के परिवारों ने आंदोलन किया है। और जिन शहरों से यह शुरू हुआ है, उनमें मुख्यमंत्री का अपना चुनाव क्षेत्र राजनांदगांव भी शामिल है। हमारा ख्याल है कि सरकार को जवाबी बयान देने से बचना चाहिए, और आंदोलन के मुद्दों पर गौर करने के लिए तुरंत एक कमेटी बनानी चाहिए जो कि आंदोलनकारियों और उनके परिवार के पुलिसकर्मियों, दोनों को ही राहत दे सके। आज जनता से लेकर नक्सलियों तक, जिस किसी का पहला वार सरकार पर होता है, उसे झेलने के लिए पुलिस ही सामने रहती है। अभी कुछ समय पहले हमने इसी जगह पर पुलिस कर्मचारियों के बेजा इस्तेमाल के बारे में लिखा था कि किस तरह उन्हें नेताओं और अफसरों की निजी चाकरी में लगा दिया जाता है। जिस वक्त हमने यह बात लिखी थी, उस वक्त तो पुलिस-परिवारों की न कोई मांग थी, और न ही ऐसे आंदोलन के कोई संकेत थे। फिर भी हमने पुलिस की सामान्य स्थितियों को लेकर उनके साथ हो रही बेइंसाफी पर लिखा था। सरकारी बंगलों पर पुलिसकर्मियों से निजी नौकरों की तरह काम लेना एक बड़ी ही आम बात है। ऐसे अपमानजनक काम से उनका आत्मविश्वास भी खत्म होता है, और वर्दी का गौरव भी जाते रहता है। इसलिए सरकार को आंदोलनकारियों के मुद्दों से परे भी खुद होकर पुलिस की हालत सुधारनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

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