बिना राजनीतिक परहेज बाकी राज्य भी दिल्ली सरकार की इस पहल पर अमल करें...

संपादकीय
3 जून 2018


दिल्ली सरकार अपनी स्कूलों के दसवीं के छात्रों को अंग्रेजी बोलना सिखाने के लिए एक अभियान शुरू कर चुकी है। इसमें वह ब्रिटिश काउंसिल और भारत और ब्रिटेन के कुछ दूसरे संगठनों के साथ मिलकर सरकारी स्कूलों के अमूमन वंचित तबकों के छात्र-छात्राओं के लिए यह कर रही है। इस बारे में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कहना है कि सरकारी स्कूलों में गरीब और अभावग्रस्त बच्चे आते हैं, और उनके मन में अंग्रेजी पढऩे की बात रहती है। ऐसे में स्पोकन इंग्लिश के कोर्स से उनकी महत्वाकांक्षा और जरूरत दोनों पूरी हो सकेंगी। 
दिल्ली सरकार ने पिछले बरसों में देशी-विदेशी मदद से अपनी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर बहुत ऊपर किया है। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया शिक्षामंत्री भी हैं, और उन्होंने योरप के कुछ सबसे कामयाब स्कूल-शिक्षा वाले देशों में जाकर, और वहां से विशेषज्ञों को लाकर यह कामयाबी पाई है। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले दिल्ली के उपराज्यपाल ने ऐसी ही एक सलाहकार को दिल्ली के शिक्षा विभाग के साथ काम करने से हटा भी दिया था। इनमें दिल्ली की पढ़ी हुई और बाद में विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त एक ऐसी हिन्दुस्तानी महिला भी थी जो कि पिछले तीन बरस से एक रूपए महीने की तनख्वाह पर दिल्ली शिक्षा विभाग के साथ काम कर रही थी। मनीष सिसोदिया ने इस बर्खास्तगी पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा था कि यह दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में क्रांति को पटरी से उतारने की साजिश है। यहां यह उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों सीबीएसई (बोर्ड) के जो नतीजे आए, उनमें दिल्ली सरकार की स्कूलों का रिजल्ट बड़ी-बड़ी और बहुत महंगी स्कूलों से भी बहुत बेहतर निकला था। और यह बोर्ड दिल्ली सरकार का नहीं, बल्कि केन्द्र सरकार का है।
अभी हम दिल्ली सरकार के साथ केन्द्र सरकार और केन्द्र के नियुक्त उपराज्यपाल (एलजी) के टकराव पर लिखना नहीं चाह रहे हैं, बल्कि हम दिल्ली की स्कूलों को लेकर, खासकर सरकारी स्कूलों को लेकर केजरीवाल सरकार की कामयाब कोशिशों पर लिखना चाह रहे हैं। जो नतीजे साबित हो चुके हैं, वे तो सबके सामने हैं ही, लेकिन सरकारी स्कूलों के गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों को अंग्रेजी बोलना सिखाना एक बहुत ही जरूरी और महत्वाकांक्षी अभियान है। भारत में अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजी संपर्क की एक सबसे बड़ी भाषा है। और अंग्रेजों के गुलाम रहने की वजह से यह देश दुनिया में अंग्रेजीभाषी देशों के साथ ही जुड़ा रहा, अधिक जुड़ा हुआ है, और अंतरराष्ट्रीय संपर्क-भाषा अंग्रेजी ही है। ऐसे में जो बच्चे अंग्रेजी बोलना नहीं जानते, वे हीनभावना में भी जीते हैं, और अपनी सारी संभावनाओं को छू भी नहीं पाते। कहने के लिए राष्ट्रभाषा से प्रेम बहुत अच्छा है, लेकिन इसका मतलब किसी दूसरी जरूरी भाषा से नफरत नहीं होना चाहिए। अंग्रेजी के खिलाफ आंदोलन करने वाले लोगों ने बहुतेरे ऐसे पाखंडी हैं जिनके अपने बच्चे तो महंगी अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं, लेकिन जो दूसरे बच्चों को इस जरूरी काबिलीयत से दूर रखते हैं। 
भाषा को लेकर एक अनावश्यक भावनात्मक उत्तेजना ठीक नहीं है। भाषा एक औजार है, और जब जहां जिस भाषा की जरूरत हो, उसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए, और उसे किसी राष्ट्रवाद से, किसी देशभक्ति से जोड़कर गरीबों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी को कामयाबी से दूर नहीं रखना चाहिए। आज हिन्दुस्तान से जो लोग बाकी दुनिया में जाकर काम करते हैं, उनके लिए अंग्रेजी भाषा एक पहला औजार है। इसके बिना यहां के कामगार किसी पश्चिमी देश में जाकर कुछ नहीं कर सकते। और विदेशों से परे भी, दिल्ली जैसे महानगर में अंग्रेजी भाषा के साथ काम करने वाले लोगों के लिए रोजगार और कामयाबी की संभावनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं। मातृभाषा को मां के दूध की तरह समझना चाहिए जो कि जरूरी है, सेहत के लिए बहुत अच्छी चीज है, लेकिन बच्चे के बड़े होने पर उसे इससे परे की भी जरूरी चीजें लगती हैं। अंग्रेजी भाषा ठीक उसी किस्म की है। आज अगर दक्षिण भारत के राज्यों में रोजगार और कामयाबी की हालत उत्तर भारत से बेहतर है, तो उसमें कुछ दूसरी बातों के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा का योगदान भी है। जो लोग नफरतजीवी हैं, और उग्र राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करते हुए किसी भी विदेशी भाषा के खिलाफ माहौल खड़ा करते हैं, वे इस देश की नौजवान पीढ़ी की संभावनाओं को पीछे धकेलने की सोची-समझी साजिश भी करते हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम कई बरस से छत्तीसगढ़ में भी सरकार से स्कूल-कॉलेज की इमारतों के खाली घंटों में अंग्रेजी, कम्प्यूटर, और व्यक्तित्व विकास के शिक्षण-प्रशिक्षण की मांग करते आए हैं। छत्तिसगढिय़ा सबसे बढिय़ा का नारा किसी को दो कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकता, आज की मुकाबले वाली दुनिया में आगे बढऩे के लिए लोगों को हुनर की जरूरत है, और अंग्रेजी भाषा आज दुनिया के सबसे बड़े हिस्से का एक हुनर है। इसके बिना नौजवान पीढ़ी अपने ही इलाके में सीमित रह जाएगी। देश के बाकी राज्यों को भी बिना किसी राजनीतिक-परहेज के दिल्ली सरकार की इस पहल पर अमल करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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