नवबर्बरतावाद जिन्हें सामान्य लग रहा है, उनके कुनबों का कल...

संपादकीय
23 जून 2018


दुनिया के इतिहास में कई ऐसे आंदोलन हुए जिनका नाम किसी पुराने आंदोलन के नाम के साथ नव शब्द जोड़कर बनाया गया। एक वक्त नाजी सोच योरप में लाखों लोगों को कत्ल कर रही थी, आज भी उसी सोच के लोग जहां पर सड़कों पर उतरते हैं, अपनी विचारधारा सामने रखते हैं, उसे नवनाजीवाद कहा जाता है। ऐसी नई बातों के लिए नए नाम कहीं कला में इस्तेमाल होते हैं, कहीं साहित्य में, और कहीं संस्कृति में भी। हिन्दुस्तान में इन दिनों एक ऐसी सार्वजनिक सोच सामने आ रही है जिसे नवबर्बरता कहा जाना ठीक होगा। लोकतंत्र आने के बाद में कानून का राज चलना चाहिए था, लेकिन हाल के बरसों में लोगों की भीड़ जिस तरह सड़कों पर हिसाब चुकता कर रही है, या बिना किसी हिसाब के भी कत्ल कर रही है, भीड़ न महज खुद इंसाफ कर रही है, बल्कि जानते-समझते हुए बेइंसाफी भी कर रही है, और कत्ल को हक मान रही है। ऐसे में यह दुनिया की सभ्यता शुरू होने के और पहले की बर्बरता का एक नया आंदोलन है जो कि बहुमत की बुनियाद पर, या कि भीड़ की ताकत की बुनियाद पर खड़ा हो रहा है। 
इस नवबर्बरतावाद की मिसालें उन दर्जनों वारदातों में सामने आई हैं जिनमें भीड़ ने कहीं गाय मारने की तोहमत लगाने, कहीं गोमांस घर में रखने की तोहमत लगाकर, तो कहीं बच्चे उठाने की तोहमत लगाकर किसी बेकसूर को, अमूमन अकेले, अल्पसंख्यक, कमजोर, या विचलित को सड़कों पर मार डाला। और यह सिलसिला बेलगाम बढ़ते चल रहा है, और अब शायद हर कुछ हफ्तों में हिन्दुस्तान में नवबर्बर भीड़ किसी न किसी का कत्ल कर रही है। बात यहीं तक होती तो भी ठीक रहता, तो भी इस शब्द को उछालने की जरूरत नहीं पड़ती। अभी चार दिन पहले उत्तरप्रदेश में जो हुआ, वह और भी भयानक था। दो मुस्लिमों को भीड़ ने इतना पीटा कि एक की मौत हो गई और दूसरे को जख्मी हाल में अस्पताल में रखा गया है। जब पुलिस मौके पर पहुंची तो तीन-तीन पुलिस अफसरों के साथ यह भीड़ उस जख्मी को हाथ-पैर से टांगकर ले जा रही थी, और पुलिस के चेहरे पर शिकन भी नहीं थी। ऐसी हिंसा और ऐसा बर्ताव अगर इस हद तक बर्दाश्त के लायक हो गया है, अगर यह एक सामान्य बात मान ली गई है, तो यह नवबर्बरता थमने वाली नहीं है। एक वक्त यह कहा जाता था कि अदालतों में देर की वजह से भीड़ ने सड़क पर ही सजा दे दी। ऐसी सजा किसी संदिग्ध को दी जाती थी। लेकिन अब भीड़ बिना किसी शक के भी किसी को छांटकर पीटती है, मारती है, और इसके वीडियो बनाकर फैलाती है, और इसके बाद अगर जेल भी जाना पड़े तो ऐसे लोग जेल से भी वीडियो बनाकर अपने जुर्म को जायज ठहराते हैं, उस वीडियो को खुलकर फैलाते हैं। ऐसी हिंसा बर्बरता है, लेकिन ऐसी हिंसा से गौरव हासिल करना और उसका महिमामंडन करना यह एक नवबर्बरता है जो कि लोकतंत्र के आधी या एक सदी पीछे चले जाने का मामला लगता है। 
आज समाज के एक बड़े तबके में अगर दूसरे धर्म के लोग, दूसरी जाति के लोग, दूसरे प्रदेश के लोग, या कि दूसरी सोच के लोग मारे जाने के खिलाफ बर्दाश्त इतना बढ़ गया है कि कहीं से कोई आवाज भी नहीं उठती, तो यह लोकतंत्र से पहले की एक पुरानी ऐसी हिंसा के पैदा हो जाने और पनपने का सुबूत है जो कि लोकतंत्र की नाकामयाबी है। यह नवबर्बरतावाद आज इस देश में धर्म, जाति, और क्षेत्रीयता के मुद्दों को लेकर बढ़ाई जा रही है, और दूसरी तरफ खानपान, पोशाक, संस्कृति, तहजीब, इन तमाम बातों को लेकर भी हिंसा को न्यायोचित ठहराया जा रहा है। यह सिलसिला जिन लोगों को आज ठीक लग रहा है, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि किसी दिन वे खुद, या उनके परिवार के लोग किसी ऐसी भीड़ के बीच फंस सकते हैं जिसकी सोच अलग हो, जिसकी जात अलग हो, जिसका धर्म अलग हो, और जिसे खानपान-पोशाक के कुछ दूसरे तरीके पसंद हों। हिंसा और बर्बरता का सिलसिला इस तरह अगर बढ़ते चलेगा तो यह थमने वाला नहीं है। इसे बढ़ावा देना आज अगर किसी समाज को अच्छा लग रहा है तो उन्हें याद रखना चाहिए कि वे अपनी मौजूदा पीढिय़ों और आने वाली पीढिय़ों के लिए एक बहुत खतरनाक कल छोड़कर जाएंगे। (Daily Chhattisgarh)

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