प्रेमी जोड़ों को मौत के लिए मजबूर करने वाला हिन्दुस्तान

संपादकीय
24 जून 2018


उत्तरप्रदेश की एक खबर है कि वहां एक परिवार में बारात पहुंचने वाली थी, और कुछ घंटे पहले ही दुल्हन ने अपने प्रेमी के साथ फांसी लगाकर जान दे दी। उन्हें लड़की के घरवालों ने शादी की इजाजत नहीं दी थी, और लड़की का रिश्ता कहीं और तय कर दिया था। इधर मानो इसी घटना की कार्बन कॉपी करते हुए छत्तीसगढ़ के मैनपुर में एक प्रेमी जोड़े ने एक साथ फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली क्योंकि परिवार उन्हें शादी नहीं करने दे रहे थे। भारत में होने वाली आत्महत्याओं में निराश प्रेमियों की आत्महत्या का एक बड़ा हिस्सा रहता होगा। लेकिन फिर भी खुदकुशी के आंकड़े तो पुलिस के रिकॉर्ड में आते हैं, और देश भर में गिने जाते हैं, पर आत्महत्या न करके घुट-घुटकर जीने वाले निराश प्रेमियों की निराशा की कोई गिनती नहीं हो सकती। 
एक तरफ तो भारत में सरकार ने आधी-पौन सदी पहले आर्य समाज नाम की संस्था को शादी करवाने का अधिकार दिया गया, और इस संस्था द्वारा करवाई शादियों में से बड़ी संख्या में ऐसी शादियां होती हैं जो कि अंतरजातीय होती हैं, या दूसरे धर्म के लोगों में होती है। इसलिए एक तरफ तो कानून बनाकर बालिग जोड़ों को मर्जी से शादी करने की ऐसी छूट दी गई जिसमें परिवार के लोगों की अनुमति, सहमति, या मौजूदगी कुछ भी जरूरी नहीं है। सामाजिक रूप से भेदभाव और छुआछूत के शिकार दलित तबके के लोगों से गैरदलितों की शादी पर सरकार ने नगद पुरस्कार भी रखा हुआ है जो कि जाहिर तौर पर अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए है। लेकिन ऐसी तमाम बातों को शुरू हुए लंबा समय हो चुका है, और समाज है कि सुधरने का नाम भी नहीं लेता। आज भी हरियाणा और उसके आसपास के इलाकों में खाप पंचायतें गोत्र के भीतर या जाति के बाहर शादियों पर हिंसक फैसले देती हैं, उत्तर भारत में जगह-जगह प्रेम विवाहों की सजा देने के लिए एक परिवार दूसरे परिवार की महिलाओं से बलात्कार पर भी उतर आता है। कुल मिलाकर देश का माहौल प्रेम के लिए नफरत का है। 
देश में कानून में बालिग लड़के-लड़कियों को साथ रहने की इजाजत दी है, लेकिन हम छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं कि किस तरह पुलिस जाकर छात्र-छात्राओं की नुमाइश लगा देती है, और उनकी तस्वीरों के साथ यह जानकारी फैलाती है कि वे लिव-इन-रिलेशनशिप में रहते हैं, मानो यह कोई जुर्म हो। बाग-बगीचों में बैठे हुए लड़के-लड़कियों को पुलिस पीटती है, मानो मोहब्बत कोई खतरा हो, और नफरत एक बहुत बड़ी हिफाजत हो। यह सिलसिला इस देश को कई किस्म से गड्ढे में ले जा रहा है। दुनिया में वही देश आगे बढ़ते हैं जहां की नौजवान पीढ़ी को एक स्वस्थ वातावरण में आजादी के साथ जीने मिलता है। हिन्दुस्तान में सरकार के नुमाइंदे अपनी ही सरकार के कानूनों के खिलाफ जाकर बालिग प्रेमियों को अलग करने में हिंसा में जुट जाते हैं। मां-बाप धर्म और जाति को लेकर हिंसा करने लगते हैं। कई परिवार लड़के-लड़कियों को खुद की मर्जी से कुछ करने के खिलाफ उनको मार डालना बेहतर समझते हैं, और इसे ऑनर-किलिंग (सम्मान हत्या) कहा जाता है। 
कृष्ण के श्रंृगार रस के इतिहास से भरे हुए इस देश में आज प्रेम से लोगों को दहशत होने लगी है। आज अगर कृष्ण होते भी, तो भी वे न रास रचा पाते, न गोपियों के साथ तालाब किनारे या पेड़ों पर बैठ पाते, वे कुछ भी नहीं कर पाते। इस देश ने अपने ही एक रसभरे पुराण और इतिहास को भूलकर एक ऐसा पाखंड बढ़ाना शुरू कर दिया है जिसमें प्रेम को हिंसा से भी बुरा करार दिया जाता है, और प्रेम को कुचलने के लिए कत्ल को गौरव मान लिया जाता है। ऐसे देश के नौजवान अपनी हसरतों के जख्मों के साथ भला किस तरह आगे बढ़ सकते हैं? ऐसी हिंसा ने देश की नौजवान पीढ़ी की मानसिकता को कुंठा और भड़ास से भरकर रखा है, और ऐसे में किसी तरह की कोई उत्पादकता देश को नहीं मिल सकती। इस देश के पाखंड का यह हाल है कि धर्म और आध्यात्म के नाम पर, बाबा और गुरू नाबालिग बच्चियों से बलात्कार करते हैं, और सजा पाने के बाद भी पूजे जाते हैं। ऐसे देश में एक स्वाभाविक प्रेम के लिए, जायज और बालिग प्रेम के लिए जो सालाना पर्व फैशन में हैं, वैसे वेलेंटाइन डे को पश्चिमी करार देते हुए बलात्कारी बापू उसे मातृ-पितृ दिवस में बदलने का फतवा देते हैं, और उनके भक्तों के साथ-साथ सरकारें भी इस फतवे को मान लेती हैं। अब तो कम से कम इस बलात्कारी के सजा पाने के बाद इस पाखंड को खत्म करना चाहिए, और सरकार को ऐसी हरकत से अपने हाथ खींचने चाहिए कि बालिग प्रेमी जोड़ों को प्रेम से रोके, और उस दिन को मां-बाप को समर्पित करे। जिंदगी में मां-बाप की अपनी जगह है, लेकिन उसका मतलब यह नहीं है कि बालिगों को अपनी पसंद के जीवनसाथी चुनने के लिए उनके साथ प्रेम करने की कोई जरूरत ही नहीं है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और प्रेमियों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाला यह हिंसक समाज न सिर्फ बेकसूर जिंदगियां खो रहा है, बल्कि उस पीढ़ी की राष्ट्रीय उत्पादकता की संभावनाओं को भी खो रहा है। (Daily Chhattisgarh)

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