संपादकीय
4 जून 2018

झारखंड की राजधानी रांची की खबर है कि सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में डॉक्टर-नर्सों की हड़ताल के चलते वहां 14 मरीजों की मौत हो गई है। ऐसा पहले भी कई राज्यों में हुआ है, और छत्तीसगढ़ भी अभी-अभी नर्सों की हड़ताल से गुजरा है। लेकिन दूसरी तरफ एक अजीब सी तस्वीर सामने आती है कि छत्तीसगढ़ में पिछले कई महीनों से जो तबके लगातार हड़ताल पर रहे, वे स्कूली पढ़ाई और इलाज से जुड़े हुए रहे। स्कूलों का बड़ा बोझ जो पौने दो लाख शिक्षाकर्मी उठाते हैं, उनका आंदोलन पिछले आधे बरस से अधिक से चले आ रहा है, और अब तक किसी किनारे पहुंचा नहीं है। इन शिक्षाकर्मियों के सामने मध्यप्रदेश की मिसाल है जहां शिक्षाकर्मियों को नियमित सरकारी सेवा में शामिल किया गया है, और वही छत्तीसगढ़ में एक बड़ी मांग है। छत्तीसगढ़ में तो शिक्षाकर्मियों का आंदोलन शुरू ही हुआ था, और अफसरों ने उसे सुलझा लेने का दावा करते हुए आंदोलनकारियों को सीधे मुख्यमंत्री से मिलवाकर मिलवाने की चूक भी की थी, और सरकार अब तक उससे उबर नहीं पाई है। दूसरी तरफ इस राज्य में मितानिनें आंदोलन कर रही हैं जो कि गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं का एक बड़ा बोझ उठाती हैं, और जिनके काम को देखने के लिए केन्द्र सरकार से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक के लोग पहुंचते हैं। इन्हीं मितानिनों की मेहनत से छत्तीसगढ़ में शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में बड़ी गिरावट भी पिछले बरसों में आई है। ये महिलाएं पूर्णकालिक सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, लेकिन ये एक मामूली भत्ता पाती हैं, और उसमें बढ़ोत्तरी की मांग कर रही हैं। इनके अलावा आंगनबाड़ी कार्यकर्ता महिलाएं भी हड़ताल पर थीं, और आंगनबाडिय़ों में गर्भवती महिलाओं से लेकर छोटे बच्चों तक को पोषण आहार वहां से मिलता है। यह एक अच्छी बात है कि उनका आंदोलन सरकार के साथ बातचीत के बाद खत्म हो गया।
इन अलग-अलग बातों की चर्चा जरूरी इसलिए है कि किसी भी जिम्मेदार देश-प्रदेश में खाने के हक के तुरंत बाद इलाज और पढ़ाई के हक की बात आती है। इसके साथ-साथ रहने के लिए मकान जुड़ जाते हैं। लेकिन तमाम विकसित देशों या जिम्मेदार लोकतंत्रों में पढ़ाई और इलाज के बजट काफी रखे जाते हैं, और उन्हें लोगों का बुनियादी हक माना जाता है। छत्तीसगढ़ में जो सबसे अच्छी बात हुई है वह खाने के अधिकार की है, और उसका बड़ा फायदा भी देखने मिला है कि यहां कुपोषण बहुत घट गया, और भूख से मौतें तो बरसों से बंद हो चुकी हैं। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि स्कूली शिक्षा, चिकित्सा, और पोषण आहार जैसे कार्यक्रमों से जुड़े हुए छोटे कर्मचारियों के वेतन-भत्ते सुधारे जाएं। आज हालत यह है कि पढ़ाई और इलाज, और पोषण आहार कार्यक्रमों का सारा बोझ बहुत ही कम मेहनताना पाने वाले लोगों के कंधों पर है। यह जाहिर है कि आज एक जैसे काम के लिए अलग-अलग किस्म का वेतन देना नाजायज करार दिया जा चुका है, और ऐसे में शिक्षाकर्मियों से लेकर मितानिनों तक, या आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से लेकर नर्सों तक की जायज मांगों पर सरकार को हमदर्दी के साथ सोचना चाहिए, और अपनी क्षमता के भीतर उनको पूरा भी करना चाहिए।
हम भारत में राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालय और कॉलेज के प्राध्यापकों के वेतन जब देखते हैं तो लगता है कि स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक उनके मुकाबले मेहनत तो उतनी ही करते हैं, लेकिन तनख्वाह उनसे एक चौथाई भी नहीं पाते। बहुत से विकसित देश ऐसे हैं जहां पर किसी दूसरे सरकारी कर्मचारी के मुकाबले स्कूल शिक्षकों को अधिक तनख्वाह मिलती है, बड़े-बड़े अफसरों से भी अधिक। हमारा ख्याल है कि छत्तीसगढ़ सहित बाकी प्रदेशों को ऐसे तबकों के कामकाज की एहमियत को जानते हुए, समझते हुए उन्हें अधिक सहूलियतें देनी चाहिए। और जब तक ऐसी मांगों पर फैसला नहीं होता, तब तक कम से कम सरकार में बैठे लोग, और सत्तारूढ़ पार्टी के लोग जली-कटी बातें बोलना तो बंद कर ही सकते हैं।(Daily Chhattisgarh)
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