दूसरों के लिए अच्छी सोच भी आज बाकी है, जिंदा है

संपादकीय
1 फ़रवरी 2020

आज जब हिन्दुस्तान में चारों तरफ नफरत, हिंसा, अलगाव के फतवों और उनकी खबरों का सैलाब समंदरी खारे पानी की तरह आंखों से आंसू निकाल देता है तब देश के छोटे-छोटे गांव-कस्बे से इंसानों की ऐसी अच्छी खबरें भी आती हैं जो आंखों से एक दूसरे किस्म के आंसू निकाल देती हैं, और न सिर्फ हिन्दुस्तानियत पर, बल्कि इंसानियत पर भी एक बार फिर से भरोसा कायम करती हैं। उधर केरल के एक कस्बे में मुस्लिम समाज एक गरीब हिन्दू लड़की की शादी अपने खर्च से, अपनी मस्जिद में हिन्दू विधि-विधान से करवाता है, और उसी दक्षिण भारत में एक गांव की हिन्दू बहुल आबादी अपने गांव का सद्भाव दिखाने के लिए स्थानीय चुनाव में सोच-समझकर एक मुस्लिम को मुखिया बनाती है। सोशल मीडिया पर ऐसी सच्ची और खरी कहानियां भरी पड़ी हैं, और समाज के कुछ जिम्मेदार लोग इनको आगे भी बढ़ाते हैं। कहीं एक बेसहारा हिन्दू महिला को पूरी जिंदगी साथ रखने वाला मुस्लिम परिवार उसके गुजरने पर अपने बेटों से उसका हिन्दू रिवाज से अंतिम संस्कार करवाता है, तो किसी गांव में कोई भी मुस्लिम न रह जाने पर वहां की मस्जिद को कोई हिन्दू रोज झाड़ू लगाकर साफ करता है, और उसका रख-रखाव करता है। 

ऐसी तमाम कहानियों में, और जिंदगी की असली कहानियों में, एक बात एक सरीखी दिखती है कि ऐसे तमाम गांव, समुदाय, और लोग देश और प्रदेश की राजधानियों से दूर हैं, और उन पर किसी नेता का जहरीला असर अब तक नहीं हुआ है। लोग अगर भले हैं और अपनी जिम्मेदारियों से बहुत अधिक आगे जाकर बहुत भले काम कर रहे हैं, तो वे किसी नेता की प्रेरणा से ऐसा नहीं कर रहे हैं, वे ऐसे नेताओं के बावजूद, उनके असर से दूर रहकर अपने भीतर की इंसानियत के चलते ऐसा कर रहे हैं। दिल्ली में जामिया हो, या शाहीन बाग हो, वहां के आंदोलनों में लोगों को चाय पिलाने, या उन तक खाना पहुंचाने में सिक्ख समाज सबसे आगे जुटा हुआ है, यह एक अलग बात है कि सिक्खों की राजनीति करने वाला अकाली दल देश और दिल्ली में भाजपा के साथ है, और केन्द्र सरकार में ये दोनों भागीदार हैं। चाहे ऑस्ट्रेलिया के जंगलों की आग हो, या हिन्दुस्तान में कहीं ट्रेन और सड़क हादसा हुआ हो, चाहे हिन्दुस्तान के किसी भी कोने से कश्मीरी छात्र-छात्राओं को निकाला गया हो, सिक्ख समाज ने सबसे आगे आकर उनके लिए खाना, उनके लिए ट्रेन या प्लेन की टिकटें जुटाईं, और अभी कुछ समय पहले तो कश्मीरी छात्राओं को वापिस कश्मीर पहुंचाने की जिम्मेदारी उठाते हुए सिक्खों ने रकम का इंतजाम किया, और उनमें से कुछ लोग छात्राओं को हिफाजत से दूसरे प्रदेश से ले जाकर कश्मीर छोड़कर आए। शायद ही कोई ऐसा धर्म हो जिससे जुड़े हुए कुछ अच्छे लोगों की कहानियां सामने न आती हों, और धर्म से न जुड़े हुए लोगों की भलमनसाहत की बातें तो आती ही रहती हैं। 

अब एक दिक्कत यह हो गई है कि हिन्दुस्तान में आज जब तक भलमनसाहत की असली कहानी लोगों तक पहुंचने के लिए जब तक अपने जूतों के तस्में बांध पाती है, तब तक हैवानियत फैलाने के लिए झूठ शहर का फेरा लगाकर आ जाता है। हिन्दुस्तान में आज सोच-समझकर एक साजिश के तहत फैलाई जा रही नफरत में उस सोच के लोगों को आपस में जोडऩे की ताकत गजब की है। एक-दूसरे से मोहब्बत करने वाले लोग कभी ऐसी किसी ताकत की जरूरत महसूस नहीं करते, लेकिन नफरत तो मानो फेविकोल के मजबूत जोड़ को फैलाते चलती है, और सोशल मीडिया पर बेधड़क अपनी फौज के लिए भर्ती करती चलती है। नतीजा यह होता है कि बालिग होने के पहले इनके झांसे में आया हुआ किशोर बंदूकबाज हो जाता है, और किसी धर्म पर हमला बोलते हुए गोलियां चलाने लगता है, उसे अपने ईश्वर की भक्ति भी मान लेता है, और देश से प्रेम भी। 

आज भले लोगों के कुछ और सक्रिय हो जाने की जरूरत है, क्योंकि सोशल मीडिया साजिश में जुटे हुए सामाजिक-मुजरिमों से भरा हुआ है, वहां पर नफरतजीवी हिंसक लोगों का राज है। मुख्य धारा के मीडिया में भी जिन लोगों ने देश और समाज के प्रति, इंसानों और अगली पीढ़ी के प्रति जिम्मेदारी की भावना है, उन्हें भी समाज की सकारात्मक बातों को कुछ अधिक हद तक आगे बढ़ाना होगा जिससे लोगों को यह भी लगे कि चारों तरफ हवा में बस जहर, नफरत, और हिंसा ही नहीं है, ऐसी हवा के बीच धड़कते दिलों में दूसरे इंसानों के लिए अच्छी सोच भी आज बाकी है, जिंदा है।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

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