संपादकीय
15 फ़रवरी 2020

हिन्दुस्तान की 21वीं सदी 18वीं सदी से भी अधिक पाखंड से भरी हुई है। देश के पौराणिक इतिहास को देखें तो सदियां शुरू होने के पहले की कहानियां बताती हैं कि किस तरह कृष्ण और राधा का प्रेम था जो कि विवाह से परे का था, किस तरह कृष्ण गोपियों के साथ श्रंगार रस में डूबी रासलीलाएं करते थे, और किस तरह हर पौराणिक काल में प्रेम की कहानियां भरी हुई थीं। आज झंडा-डंडा गिरोह प्रेम के पर्व, वेलेंटाइन डे पर जिस तरह हिंसा करते घूमता है, वही गिरोह इस देश में स्टेशनों के नाम संस्कृत में लिखने की मांग करता है, उर्दू में लिखे गए नाम हटाने की मांग करता है, और इस बात को अनदेखा करता है कि हिन्दुस्तान का संस्कृत-साहित्य किस तरह प्रेम और देह के श्रंगार रस से भरा हुआ रहा है।
प्रेम की देसी कहानियों से भरे हुए इस देश में आज प्रेम किसी कुंवारी लड़की की अवैध कही जाने वाली, और अवांछित समझी जाने वाली संतान की तरह का अनचाहा काम हो गया है। आज नफरत का बोलबाला है, और प्रेम को देशनिकाला है। ऐसे देश में महाराष्ट्र के अमरावती जिले में कल प्रेमपर्व वेलेंटाइन-डे पर एक कॉलेज में छात्राओं को इक_ा करके उनको सार्वजनिक रूप से यह शपथ दिलवाई कि वे कभी प्रेम नहीं करेंगी, और प्रेम-विवाह भी नहीं करेंगी, वे माता-पिता की मर्जी से ही शादी करेंगी। कॉलेज का यह फैसला और उसकी हरकत देश के आज के माहौल में बड़ी तारीफ की हकदार है क्योंकि यह माहौल कट्टरता और नफरत से भरा हुआ है, और इसमें प्रेम की कोई गुंजाइश छोड़ी नहीं गई है। यह एक अलग बात है कि केन्द्र सरकार के बनाए हुए कानून देश में सवर्णों के दलित-आदिवासियों से शादी पर लाखों का नगद पुरस्कार देते हैं, और समाज यह सोचता है कि ऐसी शादियां बिना प्रेम के ही हो जाएंगी। यह पूरा पाखंड सिर्फ धिक्कार के लायक है, और नौजवान पीढ़ी में ऐसी अवैज्ञानिक सोच भरने वालों के खिलाफ देश-प्रदेश के मानवाधिकार आयोगों को, महिला आयोगों को कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे कॉलेजों की मान्यता खत्म करनी चाहिए।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ऐसा दुराग्रह महज हिन्दुस्तान में हो। इस देश के लोगों की नजरों में जो असली पश्चिम है, उस अमरीका में भी ऐसा देखने मिलता है, और वहां ईसाई बिरादरी के बड़े-बड़े जलसे किए जाते हैं जिनमें किशोरियां अपने माता-पिता की मौजूदगी में ऐसी कसमें खाती हैं कि शादी के पहले तक वे अपना कौमार्य बनाए रखेंगी, और उनके पिता उनकी हिफाजत करेंगे, वे अपने पिता के प्रति जवाबदेह रहेंगी। यह सोच खुद अमरीका के भीतर एक बहुत ही छोटे तबके की सोच है, और वहां के आज के सामाजिक वातावरण के भीतर इसे एक बीमार सोच भी माना जाता है, लेकिन यह सोच वहां है तो सही। यह सोच किसी लड़के को ऐसी कसम नहीं दिलाती, न अमरावती में, न अमरीका में। कौमार्य का सारे का सारा बोझ महज लड़कियों पर है, और लड़के तो मानो अंगूठी में लगे हुए हीरे की तरह हैं जिनका कि कुछ नहीं बिगड़ सकता। हिन्दुस्तानी समाज की यही सोच बलात्कार की शिकार लड़की के बारे में लिखती है कि उसकी इज्जत लुट गई। समाज यह नहीं कहता कि जुर्म करने वाले बलात्कारी की इज्जत लुटी है जो कि सजा पाएगा, जेल जाएगा, और अपने परिवार को मुसीबत में छोड़ जाएगा, एक बेकसूर लड़की या महिला के साथ ऐसी हिंसा कर चुका है। बलात्कारी की इज्जत नहीं लुटती, बलात्कार की शिकार लड़की की इज्जत लुटना कहा जाता है! ऐसी ही मर्दाना सोच लड़कियों को प्रेम करने से रोक रही है, प्रेम विवाह करने से रोक रही है। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले अपने आपको बापू कहने वाला आसाराम छत्तीसगढ़ आया था, और उस वक्त वह बड़ा इज्जतदार माना जाता था। उस वक्त उसने रमन सिंह की भाजपा सरकार पर असर डालकर वेलेंटाइन-डे को मातृ-पितृ दिवस में बदलवा दिया था, और सरकारी स्कूल-कॉलेज में भी यह नया त्यौहार मनाया जाने लगा था। यह एक अलग बात है कि बाद में यही बलात्कारी बापू अपने एक भक्त परिवार की नाबालिग लड़की से बलात्कार के बाद कैद भुगत रहा है, और वैसा ही जुर्म उसके बलात्कारी बेटे ने भी किया, और जेल गया। नौजवान पीढ़ी की प्राकृतिक भावनात्मक और देह की जरूरतों को कुचलकर इस किस्म की एक पाखंडी नैतिकता को थोपकर लोगों को लगता है कि वे हिन्दुस्तान का भला कर रहे हैं। वे दरअसल सड़कों पर हिंसा बढ़ा रहे हैं, नौजवान पीढ़ी को अपनी मर्जी की जिंदगी जीने से रोक रहे हैं। ऐसे बीमार दिमागवाले कॉलेज संचालकों के खिलाफ अदालतों में केस चलना चाहिए कि उन्होंने संविधान के किस प्रावधान के तहत ऐसी शपथ दिलवाई है।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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