संपादकीय
9 फ़रवरी 2020

दिल्ली विधानसभा चुनाव के वोट गिर जाने के बाद किए गए एक्जिट पोल के नतीजे बहुत चौंका तो नहीं रहे हैं लेकिन हर किसी के लिए यह सोचने को मजबूर करने वाले जरूर हैं, अगर ये सही उतरते हैं। आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सत्ता पर वापिसी के आसार या गारंटी, सभी सर्वे एजेंसियों ने बताए हैं। अगर किसी टीवी चैनल या सर्वे एजेंसी का पूर्वाग्रह उसके एक्जिट पोल पर हावी भी होगा, तो भी घोर साम्प्रदायिक और मोदीभक्त हिंदी और अंग्रेजी चैनल भी भाजपा की शिकस्त और आम आदमी पार्टी की वापिसी बता रहे हैं। ऐसे में इन एक्जिट पोल नतीजों के सामने रहते हुए क्या आज किसी और मुद्दे पर लिखा जा सकता है?
दिल्ली विधानसभा के ये चुनाव केजरीवाल सरकार के कामयाब पांच बरसों की समाप्ति पर और मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले बरस में हो रहे हैं। मोदी देश भर में कामयाब रहे हैं, लेकिन केजरीवाल पिछले विधानसभा चुनाव में मोदी से अधिक कामयाब थे। उन्होंने दिल्ली से कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था और भाजपा को हाशिए पर धकेल दिया था। इस बार केजरीवाल दिल्ली की जनता को अपनी दी गई नेमतों को लेकर सामने थे। सस्ती बिजली सस्ता पानी, बहुत अच्छे स्कूल अस्पताल, महिलाओं को मुफ्त सफर जैसी नेमतें। इसके अलावा केजरीवाल जमीन से जुड़े जनसेवक भी रहे।
दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी, अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने दिल्ली का चुनाव प्रधानमंत्री के चेहरे पर लडऩा शुरू किया, और फिर जैसे-जैसे मतदान करीब आया भाजपा केजरीवाल को अरबन नक्सली, आतंकवादी, पाकिस्तान से समर्थन प्राप्त, शाहीनबागी साबित करने में लग गई। केजरीवाल को गद्दार साबित करने के लिए भाजपा उन्हें शाहीन बाग के आंदोलनकारियों को बिरयानी खिलाने वाला भी साबित करती रही। इन दोनों पार्टियों के बीच कांग्रेस के नेता संसदसे सड़क तक ऐसी प्रसंगहीन, बेतुकी, नाजायज, और अवांछित बातें करते रहे जिनसे मोदी के हाथ मजबूत होते गए और दिल्ली में धार्मिक ध्रुवीकरण शायद दिल्ली के इतिहास में सबसे अधिक हुआ।
लेकिन केजरीवाल की वापिसी महज इतने से नहीं हुई। दिल्ली देश भर से आकर पढऩे वाले छात्र-छात्राओं का महानगर भी है। इनको अमित शाह की मातहत दिल्ली पुलिस ने मवालियों के अंदाज में मारा, पीटा, पिटवाया और जेल में भी डाला। इनमें से दसियों हजार नौजवानों के परिवार भी दिल्ली के वोटर हैं। हमारा पुख्ता मानना है कि छात्रों से दुश्मनी निकालने, छात्राओं को पीटने में शाह की पुलिस ऐसी जुटी कि वह वोटर भी भाजपा से दूर भागती चली गई। एक्जिट पोल में भाजपा की सीटें बढ़ती दिख रही हैं लेकिन वे पाकिस्तान, मुस्लिम, अरबन नक्सल टुकड़े-टुकड़े गैंग, आतंकवादियों को बिरयानी जैसे आरोपों से हुए ध्रुवीकरण के कारण बढ़ी लगती हैं। एक और बात भूलना नहीं चाहिए कि दिल्ली देश की कारोबारी राजनीति भी है। व्यापारियों को नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक आर्थिक मंदी से लेकर निराशाजनक बजट से लेकर खराब बैंकिंग तक से घोर निराशा रही है। लोकसभा चुनाव में तो वोटरों के सामने मोदी के मुकाबले कोई विकल्प नहीं था, लेकिन विधानसभा में तो केजरीवाल बिना कुछ गलत किए महज अच्छा करने वाले विकल्प थे, इसलिए वोटरों ने मोदी-शाह को बेहतर नहीं माना।
अब एक आखिरी बात यह रह गई है कि केजरीवाल से पूछने को जी चाहता है कि पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? देश में जलते-सुलगते मुद्दों के प्रतीक दिल्ली में केन्द्रित हैं। जेएनयू से जामिया तक, और शाहीन बाग से सुप्रीम कोर्ट तक यह देश लोकतांत्रिक आंदोलनों पर अलोकतांत्रिक सरकारी जुल्म का इतिहास लिख रहा है। लेकिन केजरीवाल और उनकी पार्टी एक सरकारी विभाग की तरह काम कर रहे हैं जो कि किसी भी राजनीति से दूर हैं। देश की राजधानी चलाते हुए केजरीवाल एक गैरराजनीतिक अफसर की तरह काम कर रहे हैं। वे एक गैरराजनीतिक म्युनिसिपल चलाते अधिक लग रहे हैं। लेकिन सीमित अधिकारों वाली यह राज्य सरकार शायद केन्द्र सरकार के काबू वाली एक बड़ी म्युनिसिपल ही है।
दो दिन बाद नतीजे सामने आएंगे, तब कुछ और पहलुओं पर...।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें