संपादकीय
16 फ़रवरी 2020

आज एक हिन्दी अखबार की दो-तीन पन्नों पर छाई हुई सुर्खियां देखना भी भयानक है, उनके भीतर की जानकारी पढऩा तो और अधिक भयानक होगा ही। खबरों की हैडिंग्स हैं- शराबी पति ने इतना पीटा कि मौत, बेटे-बेटी के सामने बीवी को मौत के घाट उतारा, चरित्र पर संदेह हुआ तो मार डाला पत्नी को, बेटी करती थी मोबाइल पर ज्यादा बात, दूसरी जात में शादी के डर से बाप ने कर दी हत्या, अवैध संबंध के शक में बीवी को मार डाला (ऊपर की खबर से अलग, दूसरे शहर की खबर)। छत्तीसगढ़ में एक दिन में एक अखबार के एक संस्करण की इन खबरों से परे दूसरे इलाकों तक सीमित संस्करणों में और भी ऐसी खबरें हो सकती हैं। लेकिन इसमें एक अजीब और हैरान करने वाली बात यह है कि ये सारे जुर्म, ये तमाम हिंसा, अपने ही परिवार के लोगों के खिलाफ है। मतलब यह कि परिवार में एक की मौत, और दूसरे को जेल। ऐसे में घर पर अगर बच्चे ही बच गए, तो उनकी जिंदगी जीते जी ही खत्म सरीखी, और समाज की हिंसा को न्यौता देती हुई रह जाएगी।
पारिवारिक हिंसा के बारे में अभी कुछ दिन पहले ही हमने इसी जगह पर लिखा भी था जब एक आदमी ने अपनी बीवी की हत्या कर दी, जेल चले गया, और दो, चार, और छह बरस की तीन बेटियों को कचरा बीनने वाले रिश्तेदारों के साथ रहने के अलावा और कोई चारा नहीं रहा। इसी अखबार में इन बच्चियों की खबर छपने के बाद ऐसे बेसहारा बच्चों के लिए चलने वाले एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के स्थानीय केन्द्र के लोग इन बच्चियों की मदद को पहुंचे, लेकिन गरीब परिवार ने उन्हें इस सुविधाजनक केन्द्र में भेजने से भी मना कर दिया। परिवार के भीतर हिंसा से नुकसान दोहरा होता है, एक या अधिक की मौत, और एक या अधिक को कैद। फिर हिन्दुस्तान में जिस तरह अदालतों का हाल है, परिवार के बचे हुए लोग उनमें तबाह हो जाते हैं। अब सवाल यह उठता है कि परिवार के भीतर होने वाली ऐसी हिंसा को पुलिस भी कैसे रोक सकती है, अगर पहले से उसके पास पारिवारिक तनाव या हिंसा की शिकायत न आई हो, और पहली बार में ही इतनी बड़ी हिंसा हो जाए, तो पुलिस के करने का कुछ नहीं रहता।
लेकिन समाज में हिंसा पर काबू तो लगना ही चाहिए, इसलिए यह सोचने की जरूरत है कि इसे कम कैसे किया जा सकता है। सबसे पहले तो परिवार के भीतर ही दूसरे लोग इस तनातनी को घटा सकते हैं, और बीच-बचाव कर सकते हैं। अगर परिवार के भीतर ऐसी क्षमता नहीं है, तो अड़ोस-पड़ोस के लोग या साथ में काम करने वाले लोग, लोगों की हिंसक सोच को रोक सकते हैं। लेकिन जो एक बात ऐसी तमाम हिंसा के पीछे हावी दिखती है वह नशे की है। ऐसे अधिकतर मामले नशे में होते हैं, और गरीबों के बीच अपनी तमाम गरीबी के बावजूद अधिक नशा करने का चलन अधिक दिख रहा है। अब किसी की नशे की लत तो रातों-रात लगती नहीं है, इसलिए घर-परिवार, सहकर्मी और पड़ोस के लोग, लोगों को नशे से रोकने की कोशिश कर सकते हैं। इन दिनों समाज में बहुत सारे संगठन तरह-तरह से लोगों की मदद करते दिखते हैं, और ऐसे लोग भी अलग-अलग बस्तियों में जाकर, या शराब दुकानों पर जाकर लोगों को नशे के नुकसान समझा सकते हैं, हो सकता है कि कुछ लोग धीरे-धीरे समझ की तरफ लौटें।
समाज और सरकार की यह मिलीजुली जिम्मेदारी रहनी चाहिए कि परिवार के भीतर नौबत हिंसा तक पहुंचने, या नशे की लत खतरनाक हद तक पहुंचने के खिलाफ परामर्श की सहूलियत उपलब्ध कराई जाए। आज तो देश में मनोचिकित्सक, परामर्शदाता इतने कम हैं कि वे अपने चैंबरों में मोटी फीस देने वाले लोगों को भी मुश्किल से नसीब हैं। विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे सामाजिक-पारिवारिक, या वैवाहिक परामर्श के कुछ छोटे कोर्स भी चलाए जिन्हें पूरा करने वाले लोग चाहे उससे कमा-खा न सकें, आसपास कुछ लोगों की मदद तो कर सकें। एक बात यह भी लगती है कि आज हिन्दुस्तान की हवा में जितने किस्म की हिंसा फैलाई जा रही है, फिर चाहे वह किसी धर्म या जाति के लोगों के खिलाफ क्यों न हों, उस हिंसक सोच का असर लोगों की दिमागी हालत पर होता है, और जब मारने को दूसरे धर्म के लोग न मिलें, तो हो सकता है कि लोग घर पर भी अपनी हिंसक सोच को पूरा करते हों। सजा पाने लायक हिंसा करने वाले लोगों के दिल-दिमाग पर सजा का खतरा कम दिखता है, और उनकी हिंसक भावना अधिक हावी दिखती है। आज समाज के जिम्मेदार लोगों को आसपास के ऐसे पारिवारिक तनाव में दखल देकर बीच-बचाव की कोशिश करनी चाहिए। आज की यह बात बहुत विचारोत्तेजक नहीं है, लेकिन यह गंभीर बात करना बहुत जरूरी है क्योंकि इसके बारे में अखबारी सुर्खियों से परे सोचना शुरू हो, कुछ करना शुरू हो।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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