दिल्ली-स्कूलों के ब्लैकबोर्ड और गांधी, नेहरू, पटेल नाम के डस्टर

संपादकीय
14 फ़रवरी 2020

हिन्दुस्तान इन दिनों बड़ी दिलचस्प बहसों से गुजर रहा है। गांधी ने भगत सिंह को फांसी से बचाने के लिए कोशिशें नहीं की थीं, क्या किया था, क्या नहीं किया था। एक और बहस चल रही है कि  नेहरू सरदार पटेल को अपने मंत्रिमंडल में लेना नहीं चाहते थे। केन्द्र की मोदी सरकार के विदेश मंत्री, और सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार पिछले दो दिनों में इन बहसों को आगे बढ़ाते दिखे हैं, और इतिहास के दूसरे बेहतर जानकार लोग ऐसे निष्कर्षों को खारिज करते हुए इन्हें बदनीयत का बता रहे हैं, और इतिहास की बेहतर किताबों को पढऩे की सलाह दे रहे हैं। लेकिन मीडिया का कुछ समय, और पन्नों पर कुछ जगह तो इन पर खर्च हो ही रही है, और मोदी सरकार-भाजपा को इससे एक फायदा यह हो रहा है कि दिल्ली के चुनावी नतीजों का सदमा भूलने में मदद मिल रही है, और चर्चा केजरीवाली-कामयाबी से हटकर गांधी और नेहरू की नाकामयाबी या बदनीयत पर आकर टिक गई है। 

आज हिन्दुस्तान में जलते-सुलगते इतने मुद्दे हैं कि वे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। और तो और भाजपा के एक सबसे पुराने सहयोगी, अकाली दल के मुखिया ने कल ही मोदी-सरकार को धर्मनिरपेक्षता की याद दिलाई है, और सभी अल्पसंख्यकों को साथ रखने की नसीहत दी है। देश में बेरोजगारी, गरीबी से लोगों का बहुत बुरा हाल है। देश के बड़े-बड़े तबके अपने को खानपान के मुद्दे पर, नागरिकता के मुद्दे पर, धर्म और जाति के मुद्दे पर खतरे में पा रहे हैं, और हिन्दुस्तान के इतिहास में यह पहला मौका है कि जनगणना के आंकड़े जुटाने जा रहे लोगों में से कुछ पर कहीं-कहीं हमले भी हुए हैं। पिछले दो बरस में जितने राज्यों में चुनाव हुए हैं, उनमें से सात राज्यों में भाजपा हार चुकी है, और दिल्ली की इतनी बड़ी हार उसके सामने है जिसके बारे में कल गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि गोली मारो सालों को जैसे नफरती नारों से भाजपा को नुकसान हुआ दिखता है। लेकिन जगह-जगह भाजपा के नेताओं के तेवर उसी किस्म के दिख रहे हैं, और योगीराज में उत्तरप्रदेश के एक सरकारी डॉक्टर, डॉ. कफील की रिहाई के ठीक पहले उन पर एनएसए लगा दिया गया है। उधर कश्मीर में दो-दो भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों की रिहाई के ठीक पहले उन पर जनसुरक्षा कानून लगाने के लिए बहुत ही फूहड़ किस्म के आरोप लगाए गए हैं, बहुत ही अलोकतांत्रिक किस्म से अधकचरी-कानूनी कार्रवाई की गई है। 

ऐसे माहौल में जब देश में आज के असल मुद्दे हर मोड़ पर पोस्टर लेकर खड़े हैं, तब गांधी और नेहरू को लेकर बहस छेड़कर उन पर तोहमतें लगाना मोदी सरकार को किसी किनारे नहीं पहुंचा रहा है। हिन्दुस्तान की जनता अच्छी तरह जानती है कि गांधी का अल्पसंख्यकों की हिफाजत के बारे में क्या सोचना था, सरदार पटेल का आरएसएस के बारे में क्या सोचना था, और नेहरू और पटेल इतने बड़े नेता थे कि उनकी सोच में कई जगह मतभेद होना बहुत जायज और जरूरी था, लेकिन दोनों के बीच परस्पर सम्मान इतना था कि तीन हजार करोड़ की प्रतिमा बनाकर भी उतना सम्मान नहीं दिखाया जा सकता। जब दो नेता आजादी के लिए लडऩे वाले, जेल जाने वाले, कुर्बानी देने वाले, और महान सोच वाले होते हैं, तो उनके बीच मतभेद तो होगा ही, मतभेद कभी औसत दर्जे के, चापलूस-पसंद नेताओं के बीच तो हो भी नहीं सकता। लेकिन आज हिन्दुस्तान के तमाम मोर्चों पर गांधी, नेहरू, और पटेल की सोच के ठीक खिलाफ काम करते हुए बात-बात पर संदर्भों से परे उनका हवाला देना, उनको स्वर्ग में आपस में लड़वाना, एक बहुत ही नाजायज हरकत है, और देश की अधिक आबादी इस झांसे में नहीं आएगी। दिल्ली चुनाव के नतीजों को खबरों से और नजरों से दूर कर देना भाजपा के लिए एक मजबूरी हो सकती है, लेकिन दिल्ली की स्कूलों के ब्लैकबोर्ड पर इतने बड़े-बड़े अक्षरों से लिखे गए जनमत को मिटा देने के लिए गांधी, नेहरू, सरदार को डस्टर की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। 

आज देश में एक तबका हफ्ते दस दिन तक बिना खाए-पिए महज नफरत पर जिंदा रह सकता है। ऐसा तबका ऐसे काल्पनिक इतिहास के ऐसे टकराव को सोशल मीडिया पर बढ़ावा देने का काम करे, वह तो समझ आता है, लेकिन जेएनयू में पढ़े हुए मोदी सरकार के विदेश मंत्री जयशंकर भी इतिहास को लेकर पसंदीदा कल्पनाएं लिखने में लग जाएं, यह बात बड़ी शर्मिंदगी की है। हो सकता है कि मीडिया में कुछ घंटे, और कुछ पन्ने ऐसी कहानियों से रंग दिए जाएं, लेकिन बीते कल के नाम पर गढ़ी गईं ये कहानियां आज की हकीकत को हाशिए पर धकेलने में कोई मदद नहीं कर पाएंगी।  

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

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