बिना घुसपैठ किए दुनिया के एक सबसे बड़े एप्लीकेशन को झांसा

संपादकीय
3 फ़रवरी 2020

दस-बीस बरस पहले एक अमरीकी फिल्म आई थी जिसमें कम्प्यूटरों में घुसपैठ करने वाले मुजरिम किसी बड़े अमरीकी शहर के ट्रैफिक को नियंत्रित करने वाले कम्प्यूटर-सिस्टम में घुसकर उसे अपने हिसाब से बदल देते हैं, मुजरिमों की गाडिय़ों को तेजी से निकल भागने के लिए पूरे रास्ते बत्तियां हरी कर देते हैं, और पीछा करती पुलिस की गाडिय़ों को हर जगह लालबत्ती का सामना करना पड़ता है। अब ऐसी रेडलाईट पार करके आगे बढ़ती पुलिस गाडिय़ां दूसरी गाडिय़ों से टकराती भी रहती हैं, और अपने कम्प्यूटर पर बैठे मुजरिम अपने साथियों के लिए रास्ता साफ करते चलते हैं। सार्वजनिक कम्प्यूटरों पर ऐसा काबू बहुत सी फिल्मों में दिखाया गया है, और यह एक असल खतरा है जो कि कम्प्यूटरों की हिफाजत के सरकारी इंतजाम के जरा भी कमजोर होने पर जमीन पर उतर सकता है। 

अभी एक कम्प्यूटर-जानकार ने इतने आसान तरीके से बिना किसी छेडख़ानी के दुनिया के सबसे बड़े कम्प्यूटर-नक्शे गूगल पर ट्रैफिक को बदलकर रख दिया कि उसकी तरकीब ने बड़े-बड़े कम्प्यूटर-सुरक्षा विशेषज्ञों को भी हक्का-बक्का कर दिया है। गूगल-मैप जैसे मोबाइल-एप्लीकेशन किसी सड़क पर ट्रैफिक के बोझ को आंककर उस हिसाब से सड़क को खाली, भरा, या जाम बताते हैं। गूगल-मैप इसके लिए उस सड़क पर उसका इस्तेमाल करते हुए चलने वाले मोबाइल फोन के डेटा को मिलाकर इस्तेमाल करता है, और सड़क पर ट्रैफिक के बोझ का हिसाब लगा लेता है। यह बात आमतौर पर तो सही होनी चाहिए, लेकिन गूगल के पूरे दिमाग को बेवकूफ बनाने का एक इतना आसान तरीका एक हैकर ने निकाला है कि उसके लिए उसे किसी फोन की हैकिंग भी नहीं करनी पड़ी। उसने 99 स्मार्टफोन लिए, और उन सबको एक ठेले पर रखकर, गूगल-मैप शुरू करके धीरे-धीरे चलने लगा। नतीजा यह हुआ कि गूगल-मैप को अचानक उस सड़क पर धीमी रफ्तार से चलने वाली 99 गाडिय़ां समझ में आने लगीं, और उसने उस सड़क को मैप पर बहुत व्यस्त दिखाने वाले लाल रंग से दिखाना शुरू कर दिया, और दूसरे लोगों को उस सड़क के बजाय दूसरी सड़क सुझाना शुरू कर दिया। एक जरा सी तरकीब से दुनिया के सबसे बड़े मैप-एप्लीकेशन को इस तरह झांसा दे दिया गया कि उसने मैप देखकर रास्ता तय करने वाले दूसरे लोगों को दूसरे रास्तों से भेजना शुरू कर दिया। 

जो लोग आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर बहुत भरोसा करते हैं, जो गूगल जैसे कम्प्यूटर-एप्लीकेशन को दैवीय ताकत से भी अधिक बड़ा मानते हैं, वे अपने कम्प्यूटरों को किसी हैकिंग या घुसपैठ से तो बचा सकते हैं, लेकिन ऐसे चतुर इंसानी दिमाग से कैसे बचा सकते हैं? इसलिए कम्प्यूटरों पर सार्वजनिक जीवन से जुड़ी सरकारी या कारोबारी बातों पर एक सीमा से अधिक निर्भरता में एक बड़ा खतरा मौजूद है। इंसान का दिमाग कम्प्यूटरों के मुकाबले अधिक कल्पनाशील है, और वह बहुत सी बातों में कम्प्यूटर को पछाड़ भी सकता है। आज बैंकों के जितने तरह के फ्रॉड सामने आते हैं, उनमें हिन्दुस्तान में सबसे अधिक मामले झारखंड के एक गांव से शुरू होते हैं जहां के लोग मोबाइल फोन पर लोगों को झांसा देकर उनके बैंक खातों में घुसपैठ करते हैं, और यहां से रकम दूसरे, तीसरे, और चौथे खातों में ले जाकर गायब कर देते हैं। झारखंड के इस गांव की जानकारी बरसों से खबरों में चली आ रही है, लेकिन भारत सरकार अपनी सारी ताकत और तकनीकी क्षमता के बावजूद ऐसे बैंक फ्रॉड रोक नहीं पा रही है। दूसरी तरफ भारतीय रेलवे की टिकट रिजर्वेशन की वेबसाईट को धोखा देने के लिए एक स्कूल-फेल नौजवान ने ऐसा एप्लीकेशन बनाया है जिसने दुनिया की सबसे बड़ी रेलवे की वेबसाईट को तोड़कर रख दिया है, उसे धोखा देकर मनमाना रिजर्वेशन करवा रहा है। अब खुद रेलवे ने चेतावनी जारी की है कि लोग किस-किस फर्जी वेबसाईट से बचें, जो कि रिजर्वेशन करवाने के नाम पर धोखा देती हैं। रेलवे ने ऐसे मोबाइल नंबर भी जारी किए हैं जो कि धोखा दे रहे हैं। यह सामान्य समझ के लोगों के लिए भी एक मुश्किल बात है कि सरकार की जानकारी में रहते हुए भी ये वेबसाईटें, और ये फोन किस तरह काम करते हैं, इनको पकड़ा क्यों नहीं जा सकता? यह पूरा सिलसिला बताता है कि भारत सरकार की साइबर-सुरक्षा की बड़ी-बड़ी बातें बहुत ही दलदली और पोली जमीन पर खड़ी हुई हैं, और उनमें कोई मजबूत हिफाजत नहीं है। इसके साथ-साथ यह भी समझना है कि आज दुनिया जिन लोकप्रिय एप्लीकेशनों पर निर्भर हो गई है, वे कितने नाजुक हैं, और उनके साथ कितने खतरे जुड़े हुए हैं। इन दोनों बातों को देखते हुए लोगों को अपनी खुद की जरूरतों की हिफाजत खुद भी करनी चाहिए। यह पूरी नौबत बताती है कि राज्य सरकारों को भी अपने-अपने इलाकों में लोगों को साइबर-सुरक्षा के प्रति जागरूक और शिक्षित करने की कितनी जरूरत है।   

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

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