संपादकीय
4 फ़रवरी 2020

दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में नागरिकता-संशोधन के खिलाफ 50 से अधिक दिनों से सर्द रात-दिन धरने पर बैठी महिलाएं एक अलग किस्म का लोकतांत्रिक इतिहास लिख रही हैं, लेकिन इनके बीच चार महीने के एक बच्चे की जिंदगी खत्म हो गई क्योंकि उसकी मां घरवालों के मना करने पर भी धरने पर आमादा थी, और उस छोटे से बच्चे को लेकर वहां बैठती थी। रात-दिन ठंड से सर्दी, और फिर तबियत बिगड़ते हुए वह गुजर गया। अब परिवार इस मौत के लिए नागरिकता-संशोधन को जिम्मेदार ठहरा रहा है।
किसी कानून के खिलाफ एक अहिंसक और लोकतांत्रिक आंदोलन का पूरी तरह महिलाओं पर इतने लंबे समय तक चलना, इतने मुश्किल हालात में चलना, और इतने दकियानूसी मुस्लिम समाज के बीच की महिलाओं के कंधों पर चलना एक अलग किस्म का इतिहास है। और जब भावनाएं भड़की हुई रहती हैं, तो जिंदगी और मौत की फिक्र कुछ कम हो जाती है। शाहीन बाग के प्रदर्शन में बढ़ते-बढ़ते देश के बहुत से शहरों में अपने बीज रोप दिए हैं, और कई जगहों पर ऐसा आंदोलन चल रहा है। लेकिन इस मौत से उठे सवाल नागरिकता-संशोधन के जटिल कानूनी सवालों से कुछ परे भी हैं, जिन्हें अनदेखा करना ठीक नहीं होगा।
आज देश में लोकतंत्र के लिए लड़ी जा रही एक बड़ी लड़ाई के चलते हुए मां-बाप की अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही की बुनियादी बात किनारे नहीं की जा सकती। दुनिया में कहीं भी मुश्किल लड़ाई वाले आंदोलन अगर चलते हैं, तो उनमें हिस्सा लेने के लिए ऐसे छोटे बच्चों के अपने बुनियादी हकों को अनदेखा नहीं किया जा सकता, और न ही उनकी हिफाजत की अनदेखी की जा सकती है। जब पूरा देश सर्द लहर का शिकार है, तब दिल्ली में खुले में रात-दिन किसी भी बच्चे को इस तरह आंदोलन में शामिल रखना उसके मानवाधिकार के खिलाफ भी है, और आंदोलन में शरीक बाकी लोगों को इसमें दखल देकर इस मौत को रोकने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी थी। जब किसी छोटे बच्चे का मामला है, तो उसके मां-बाप के फैसले गलत होने पर परिवार के बाकी लोगों को दखल देनी थी, उनका भी बस नहीं चल रहा था तो बिरादरी के लोगों को समझाना था, और खासकर धरने जैसे बैठे हुए आंदोलन में शामिल बाकी लोगों को तो ऐसी लड़ाकू मां को समझाना ही चाहिए था जो कि बच्चे की जिंदगी खतरे में डाल रही थी। पूरा का पूरा आंदोलन महिलाओं का है, इसलिए वहां मौजूद महिलाओं में से तकरीबन सभी मां बन चुकी होंगी, और बच्चों की जरूरत को अच्छी तरह समझती होंगी। यह मौत एक सामूहिक और सामुदायिक गैरजिम्मेदारी का नतीजा भी है, और इसकी तोहमत नागरिकता-संशोधन कानून पर थोपना अपनी जिम्मेदारी से बचने की बात भी होगी।
हिन्दुस्तान में गरीब या कम पढ़े-लिखे तबकों के बीच बच्चों के रख-रखाव को लेकर जिम्मेदारी में कई बार कमी नजर आती है। यही वजह है कि गरीब-अनपढ़ तबकों में लोग अपनी जरूरत और अपने फैसले से अधिक बच्चे पैदा करते हैं क्योंकि खानपान और इलाज के अभाव में, साफ-सुथरी जिंदगी के बिना उनके जिंदा रहने की संभावना औरों के मुकाबले कम रहती है। किसी भी धर्म में गरीबों के बीच बच्चे अधिक पैदा होते हैं क्योंकि वे कम बचते हैं। लेकिन शाहीन बाग में चल रहा आंदोलन वहां पर पहुंचने वाले बहुत से प्रमुख नेताओं का गवाह भी है, मीडिया का एक हिस्सा भी वहां लगातार मौजूद है, और आंदोलनकारियों के साथ बैठने वाले उनसे परे के जागरूक लोग भी हैं। ऐसे में देश भर के आंदोलनकारियों के बीच यह बात साफ होनी चाहिए कि आंदोलन के मुद्दे चाहे जो हों, छोटे बच्चों को उसमें झोंककर, उनको साथ रखकर, उनको खतरे में डालकर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। बच्चों की हिफाजत एक अलग ही मुद्दा है जिसे किसी भी मकसद के लिए, किसी भी आंदोलन के लिए दांव पर नहीं लगाया जा सकता। चाहे शाहीन बाग कितना भी बड़ा लोकतांत्रिक मुद्दा और आंदोलन क्यों न हो, हम इस मौत को एक शहादत का दर्जा देने के खिलाफ हैं, और मां-बाप, परिवार, बिरादरी, और आंदोलन, इन सबकी सामूहिक समझ की नाकामयाबी के एक बड़े सुबूत के अलावा यह और कुछ नहीं है। देश में किसी भी तरह के आंदोलन हों, उनकी एक पहली शर्त होनी चाहिए कि बच्चों को उससे परे रखा जाए, और बच्चों के अलावा बीमार-बूढ़ों को भी उससे परे रखा जाए। समझबूझ की नाकामी कभी किसी आंदोलन को कामयाब नहीं बना सकती। इस मासूम बच्चे की मौत से देश भर के आंदोलनकारियों को एक सबक लेना चाहिए।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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