हिंदुस्तानी फौज की मर्दाना सोच बदलने की जरूरत

संपादकीय
5 फ़रवरी 2020

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि थलसेना के मोर्चों पर महिला अधिकारियों को मुखिया तैनात करना व्यावहारिक नहीं होगा क्योंकि फौज मेें सैनिक ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और वे किसी महिला अफसर से हुक्म लेने की संस्कृति के नहीं रहते हैं। इसके अलावा सरकार ने कुछ और तर्क भी महिला कमांडिंग ऑफिसर बनाने के खिलाफ गिनाए हैं। सरकार का कहना है कि महिला अफसरों की पारिवारिक जिम्मेदारियां भी उन्हें मोर्चों पर तैनात करने में बाधा बन सकती हैं। सरकार ने समाज की वर्तमान सोच को गिनाया है और कहा है कि थलसेना के सैनिक अभी दिमागी रूप से महिला को मुखिया देखने के लिए तैयार नहीं है। सरकार का कहना है कि अगर उन्हें किसी दूसरे देश में युद्धबंदी बना लिया तो वह एक अलग किस्म का खतरा रहेगा। इसलिए सरकार लड़ाई के सीधे मोर्चे से महिला अधिकारियों को दूर रखती है।

अब यह मामला बड़ा दिलचस्प, लेकिन बड़ा ही निराशाजनक भी है। हिंदुस्तानी फौज आजादी की पौन सदी में भी अगर पुरुषप्रधान सोच से इस तरह लदी हुई है कि वह महिला कमांडर के मातहत काम नहीं कर सकती, तो यह सोच लड़ाई के सरहदी मोर्चे से परे भी फौज में जगह-जगह असर रखती होगी। यह भूलना नहीं चाहिए कि भारतीय सेनाओं में कई अफसरों को इस बात के लिए कड़ी सजा भी मिली है कि वे मातहत अफसरों की पत्नियों पर बुरी नजर रखते थे, और उनका देहशोषण करने की कोशिश करते थे। हम फौज से जरा नीचे अद्र्धसैनिक बलों में जाएं जहां कि बड़ी संख्या में महिलाएं काम करती हंै, तो वहां भी सिपाही ऐसी ही पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते होंगे, और उनमें भी मर्दाना सोच भरी हुई होगी। और नीचे आएं तो राज्यों की पुलिस में भी ऐसा होगा, और ऐसा है भी। इसलिए इसे महज फौजी-सरहदी मोर्चे की बात न मानें, बल्कि वर्दियों की तमाम जगहों पर मर्दाना सोच के दबदबे की समस्या मानकर उसे दूर करने की बात सोचें।

देश में बात सिर्फ फौजी कमांडरों की वर्दियों की नहीं है, देश में दसियों लाख दूसरी वर्दियों में भी महिलाएं हैं जो कि गैरबराबरी झेल रही हैं, संभावनाओं से दूर रखी जा रही हैं। लेकिन हम सुप्रीम कोर्ट में सरकार की कही हुई बात को इस सरकार की नाकामयाबी मानने के बजाय पिछली तमाम सरकारों के सारे कामकाज के मिलेजुले असर और समाज की व्यापक सोच मानना बेहतर समझेंगे। समाज की हकीकत, हिंदुस्तानियों की दिमागी हालत के बारे में सोचे बिना अगर सीधे एक सरकारी फैसला लेकर लड़ाई के मोर्चे पर एक घरेलू टकराव खड़ा कर दिया जाता है तो यह ठीक नहीं होगा। लेकिन इसी सांस में हम यह तर्क भी रखना चाहेंगे कि सामाजिक-संस्कृति की आड़ लेकर कोई भी सरकार अपनी बुनियादी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती, जो कि हिंदुस्तानी आदमी और औरत में बराबरी उपलब्ध कराने की है। सरकार को तुरंत ही ऐसी सामाजिक सोच, ऐसी संस्कृति, और ऐसे दिमाग को सेना जैसी नियंत्रित और अनुशासित संस्था में खत्म करने के बारे में एक ठोस योजना तुरंत ही सुप्रीम कोर्ट के सामने रखनी चाहिए, या सुप्रीम कोर्ट को केंद्र सरकार से ऐसी योजना मांगनी चाहिए। एक वक्त हिंदुस्तान में महिलाओं को उनके मृत पति के साथ सती बनाने की भी सोच थी, और उसके खिलाफ कोई कानून भी नहीं था। सामाजिक सोच को तोड़ते हुए कानून भी बनाया गया और उसे समाज सुधार के रास्ते लागू भी किया गया। इसलिए अगर हिंदुस्तानी फौज की सोच में इतना पाखंड भरा हुआ है, तो इसकी आड़ लेकर महिलाओं को संभावनाओं से दूर रखना बहुत गलत बात होगी, और इस पाखंड को बदलने के लिए फौज के मर्दों को सामाजिक-मनोवैज्ञानिक परामर्श देने की जरूरत है, उनका दिमाग बदलने की जरूरत है। हमने छत्तीसगढ़ के नक्सल मोर्चे पर देखा है कि किस तरह महिला कमांडो उन नक्सलियों के खिलाफ लड़ रही हैं जो पहले बहुत बार पुलिस का अपहरण भी कर चुके हैं। जरूरत हो तो केंद्र सरकार बस्तर के मोर्चे से कुछ सीखे।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

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