संपादकीय
2 फ़रवरी 2020

महाराष्ट्र के शिवसैनिक मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा है कि एनआरसी नामक नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप को महाराष्ट्र में लागू नहीं किया जाएगा क्योंकि उससे हिन्दू और मुस्लिम दोनों के लिए नागरिकता साबित करना बड़ा मुश्किल हो जाएगा। हालांकि उद्धव ने नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन किया है, लेकिन एनआरसी का विरोध करते हुए महाराष्ट्र में इसे लागू न करने की बात कही है। अब तक देश में दर्जन भर अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री नागरिकता संशोधन या एनआरसी लागू न करने की बात कर चुके हैं, और छत्तीसगढ़ सहित कुछ राज्यों में इसके लिए मंत्रिमंडल या विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके केन्द्र सरकार को भेजा भी है। दूसरी तरफ भाजपा और उसके समर्थक दलों के नेता जगह-जगह यह बयान भी दे रहे हैं कि संसद में जो कानून पास हो चुका है, उसे लागू करना, न करना राज्यों की पसंद पर निर्भर नहीं है, और वह पूरे देश में लागू है ही।
केन्द्र और राज्यों के बीच अधिकारों के बंटवारे का यह एक बड़ा मुद्दा बनते दिख रहा है जिसमें देश की एक तिहाई या अधिक आबादी के राज्य केन्द्र सरकार के नागरिकता संशोधन के खिलाफ हैं, और उसे लागू न करने की घोषणा कर चुके हैं। यह टकराव आज तो तब दिख रहा है जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सिर्फ असम में ही नागरिकता साबित करनी पड़ रही है, और उसी में लोगों की जिंदगी हराम हो चुकी है। जो देश सड़कों और फुटपाथों पर जीता है, जो देश बेघर है, जिसके नाम कोई जमीन नहीं है, जिसके लोगों के पास बैंकों में खाते नहीं हैं, जहां पर लोग अपने जिंदा होने का सर्टिफिकेट मांगते बरसों तक सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते हैं, जहां जिंदा इंसान की तनख्वाह या पेंशन रोक दी जाती है कि उसके पास जिंदा होने का सुबूत नहीं है, जहां पुरानी पीढ़ी निरक्षर है, बिना कागजात है, जिनके घर बाढ़ में डूबकर सब कुछ खो चुके हैं, वैसे लोग कहां से नागरिकता साबित करेंगे? यह एक हैवानियत की सोच है कि गरीबों को मजदूरी से अलग करके, बूढ़ों और बीमारों को बिस्तरों से बाहर घसीटकर अंतहीन कतारों में खड़ा कर दिया जाए, और उन पर ही उनके हिन्दुस्तानी होने, उनके मां-बाप के हिन्दुस्तानी होने को साबित करने का बोझ डाल दिया जाए।
केन्द्र सरकार ने नागरिकता संशोधन के एक अकेले मुद्दे पर पूरे देश की आम जनता के बीच, राज्य सरकारों के साथ, और राजनीतिक दलों के साथ इतना बड़ा टकराव खड़ा कर लिया है, और देश पर इतना बड़ा आर्थिक बोझ डालने का फैसला लिया है कि उसके चलते यह देश केन्द्र-राज्य संबंधों के सबसे बुरे दिन देखने जा रहा है। जहां तक नागरिकता संशोधन के हिमायती लोगों के तर्क हैं कि संसद में लागू किया गया कानून लागू करना राज्यों की मजबूरी है, तो यह ताजा-ताजा बात है कि सड़कों पर ट्रैफिक के जो नए नियम लागू किए गए हैं, उन्हें खुद भाजपा के ही कई राज्यों ने लागू नहीं किया है, और उसका जमकर विरोध किया है। ये नियम भी पूरे देश के लिए संसद में बनाए गए कानून के तहत ही लागू किए गए हैं, जिन्हें आज शायद ही कोई राज्य लागू कर रहा है, या उसके मुताबिक पहाड़ जितना जुर्माना कर रहा है। इसलिए अगर कोई कानून है तो उसे लागू करना किसी राज्य सरकार की बेबसी है, यह सोचना एक बेवकूफी है। लेकिन इसके साथ-साथ यह बात भी गौर करने की है कि अगर केन्द्र सरकार अपनी जिद पर अड़ जाएगी, और आधार कार्ड से लेकर पासपोर्ट तक, और बैंक खातों से लेकर सिमकार्ड तक के साथ अगर नागरिकता साबित करने की बंदिश जोड़ देगी, तो देश की दसियों करोड़ आबादी दूसरे दर्जे की नागरिक बनकर रह जाएगी, और केन्द्र और राज्यों के बीच एक ऐसा भयानक टकराव खड़ा होगा कि जिसका कोई हल नहीं निकलेगा। और देश में कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इससे गृहयुद्ध जैसी नौबत आ सकती है। हमारा ख्याल यह है कि केन्द्र सरकार ने यह एक निहायत ही गैरजरूरी और नाजायज टकराव खड़ा किया है जिसका अपार नुकसान सत्तारूढ़ पार्टी को होगा। आज केन्द्र सरकार जिस दर्जे की जिद पर अड़ी हुई है, वह पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, और भारत की संसदीय व्यवस्था को एक बाहुबली फिल्म साबित करने पर उतारू है। लोकतंत्र इस तरह नहीं चलता है, और लोगों को केन्द्र सरकार के बारे में अपनी पसंद इस्तेमाल करने में अभी पूरे चार साल बाकी हैं। लेकिन ये चार बरस अगर केन्द्र और राज्यों के ऐसे बुनियादी टकराव से भरे हुए रहेंगे, तो उसका नतीजा कल आए हुए केन्द्र सरकार के बजट में दिख रहा है, और आगे यह बर्बादी बढ़ते ही चलेगी। किसी भी देश या प्रदेश की सरकार अपनी आबादी के इतने बड़े हिस्से की दुश्मन बनकर लंबे समय तक नहीं चल सकती। इस बात को न समझना, न मानना, गंभीरता से न लेना मोदी सरकार को भारी पडऩा तय है। आज देश भर में राज्य जिस तरह केन्द्र के खिलाफ खड़े हो रहे हैं, वह नौबत केन्द्र की ही जिंदगी को तकलीफदेह अधिक बनाएगी।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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