आवारा मवेशियों को लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे ग्रामीणों की समस्या से सीखने की जरूरत

 14 अगस्त 2026  

 

छत्तीसगढ़ के सरगुजा मुख्यालय, अम्बिकापुर कलेक्ट्रेट में पास के एक गांव के किसान सौ से अधिक आवारा मवेशी लेकर पहुंचे, और उन्हें ले जाकर कलेक्टर दफ्तर के बाहर अपनी दिक्कत बताई कि शहरी म्युनिसिपल अधिकारी जानवरों को पकडक़र गांवों में छोड़ दे रहे हैं, और वे फसल खा रहे हैं। उनका कहना है कि स्थानीय किसान और ग्रामीण तो अपने जानवर को बांधकर रखते हैं, लेकिन बाहर से छोडक़र लाए गए जानवर बेकाबू बर्बादी कर रहे हैं। म्युनिसिपलों की दिक्कत यह है कि जब हाईकोर्ट या नागरिकों का दबाव बढ़ता है, तो कभी सडक़ों पर से, तो कभी शहरी आबादी के इलाकों से जानवरों को पकडक़र बाहर छोड़ दिया जाता है। शहर के आसपास के गांव ऐसे मवेशियों, और कई बार कुत्तों के भी शिकार होते हैं। 

अधिकारी, और बहुत हद तक भारत के लोग भी, अपने हिस्से का बोझ दूसरे पर डाल देने में महारथ हासिल लोग हैं। अपने घर-दुकान के सामने झाड़ू लगाकर कचरा या तो नाली में फेंक देते हैं, या सडक़ के दूसरी तरफ, सबसे पसंदीदा जगह आसपास का कोई खाली प्लाट रहता है, जो जब बहुत भर जाता है, तो फिर उसमें आग लगाकर सब निपटा दिया जाता है। समस्या का समाधान समस्या को दूसरे पर डाल देने, या जला देने की शक्ल में निकाला जाता है। जैसे ही कोई दुधारू जानवर दूध देना बंद करते हैं, लोग उन्हें सडक़ों पर छोड़ देते हैं, ताकि वे घूरों पर जिंदा रह लें। हाईवे पर तो तेज रफ्तार गाडिय़ोंतले कुचलकर बहुत से जानवर जल्दी छुटकारा पा जाते हैं, लेकिन शहरी घूरों पर खाने के फेर में पॉलीथीन निगल-निगलकर गौमाता और उसके कुनबे के बाकी जानवर पेट में 40-40 किलो प्लास्टिक इकट्ठा कर लेते हैं, और मुश्किल और धीमी मौत मरते हैं। कहने के लिए गायों के भावनात्मक और धार्मिक-राजनीतिक सम्मान का दिखावा होता है, उसे राजमाता बनाने की मांग होती है, लेकिन राजमाता घूरों पर पूरे राज परिवार के साथ किस तरह जिंदा रहती है, यह भी सबको दिखता है।

यह दिक्कत देश भर में है। पशुओं को ले जाते लोगों को जगह-जगह मारा जाता है, कई जगह उनका कत्ल कर दिया जाता है। अभी एक जगह ट्रांसफॉर्मर के पास बिजली के करंट से एक गाय मर गई, तो आसपास के लोगों ने ट्रांसफॉर्मर तोडफ़ोड़ दिया। किसी गाड़ी से गौवंश के किसी भी मवेशी को चोट भी लग जाए, तो उस गाड़ी में तोडफ़ोड़, ड्राइवर को पीट-पीटकर मार डालना, कुछ भी हो सकता है। जगह-जगह से ऐसी खबरें आती हैं, ऐसे वीडियो आते हैं। जाहिर तौर पर राज्य सरकारों ने कहीं भी गौवंश, या दूसरे कुनबे के मवेशियों को रखने के कोई इंतजाम नहीं किए हैं, नतीजा यह है कि वे सडक़ों पर खतरा बने हुए खुद भी मरते हैं, और दूसरों की मौत का सामान भी बनते हैं। सरकारें अपनी इस बुनियादी जिम्मेदारी को छूने के लिए भी तैयार नहीं हैं, और हाईकोर्ट इस मुद्दे पर सरकारों से हलफनामे लेते रह जाते हैं। 

हिन्दुस्तान एक कृषिप्रधान देश रहते आया है, हालांकि अब वह धर्मप्रधान होकर रह गया है। खेती के काम के लिए जानवरों की जरूरत रहती थी, और लोग गाय-बैल पालते थे, उनका उपयोग जब तक रहता था उन्हें रखते थे, उम्रदराज हो जाने पर उन्हें बेचकर नए जानवर ले लेते थे। यही ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था का चक्र था। अब बीते दशकों में एक-एक कर कई राज्यों में गायों से जुड़े कानून इतने कड़े हो गए हैं कि अब बूढ़े गौवंश को बेचना मुमकिन नहीं है, न ही उसे खरीदकर किसी दूसरी जगह ले जाना। अपनी जान गंवाने की जोखिम उठाकर ही कोई ऐसा कर सकते हैं। नतीजा यह हुआ है कि गांव-शहर सभी जगह गौवंश के मवेशियों की खरीदी-बिक्री ठप्प हो गई है, और यह एक रहस्य ही है कि योगी के उत्तरप्रदेश में कैसे देश के सबसे बड़े मीट कारखाने चलते हैं, जहां से एक्सपोर्ट करके भारत विश्व रिकॉर्ड बनाते चलता है। अब चूंकि बूढ़े पशुओं को बेचना तकरीबन नामुमकिन हो गया है, इसलिए धीरे-धीरे गाय पालना भी कम होने लगेगा, और अनुपयोगी हो चुके गौवंश को सडक़ों पर बेसहारा छोड़ देना ही सबसे सुरक्षित रह गया है। जिस तरह शहरों में अब श्राद्ध का भोजन खिलाने के लिए कौवे नसीब नहीं होते, कुछ दिनों बाद गोग्रास की रोटी के लिए गाय भी नसीब नहीं होगी क्योंकि फिलहाल तो अनुपयोगी गौवंश की मौजूदगी बढ़ती जा रही है, लेकिन उसे पालना घटते जा रहा है। उसके बजाय दूध के कारोबार के लिए भैंस पालना न सिर्फ अधिक फायदेमंद है, बल्कि वह अधिक सुरक्षित भी है। 

सडक़ों से लेकर गांवों के खेतों तक, हाईवे से लेकर शहर के भीतर की सडक़ों तक गौवंश का खतरा बना हुआ है, और बढ़ते ही चल रहा है। म्युनिसिपल अपने इलाके से छुटकारा पाने के लिए पशुओं को पकडक़र पास के गांवों में छोड़ देती हैं, और लोग हैं कि उन्हें सडक़ों और घूरों पर छोड़ देते हैं। भारत की ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था में गौवंश के उपयोग की वजह से लोगों के बीच उनके उपयोगी रहने तक जो सम्मान रहता था, वह अब बोझ बन चला है। गौवंश इस देश की अर्थव्यवस्था के एक हिस्से के बजाय धार्मिक उन्माद का एक हिस्सा बना दिया गया है, और हवा में ऐसी उत्तेजना के रहते हुए गौवंश अर्थव्यवस्था में न पुरानी, और न नई कोई जगह पा या बना सकता। ऐसे में खेतों, और सडक़ों को, सार्वजनिक जगहों को गौवंश से बचाने के लिए सरकारों को ही योजना बनानी होगी, और उनके लिए सुरक्षित अहाते बनाकर भीड़ की हिंसा को भी टालना होगा, हादसा मौतों को भी घटाना होगा, और जिसे माँ कहकर उसके बछड़े के हक का भी दूध पी लिया जाता है, उसे रोजाना घूरे के भंडारे से हटाकर चारा देना होगा। 

भारत एक अजीब से दौर से गुजर रहा है। इसकी आज की भावनात्मक उत्तेजना का पेट भरने के लिए बहुत से राज्यों में जो कानून बन गए हैं, उन पर अमल के लिए सरकारों को ही गौवंश के मरने तक उन्हें पालना होगा, और उसके अलावा कोई चारा नहीं है। अदालतों को यह भी गारंटी करनी होगी कि अगर सरकारें अपने कानून पर कायम हैं, और अदालतों को ऐसे कानूनों में कोई दिक्कत नहीं लगती है, तो इनकी वजह से समाज में हिंसा न हो पाए। कानून बनाकर छोड़ देना, उत्तेजना बढ़ाकर छोड़ देना, किसी समस्या का समाधान नहीं है। आज महाराष्ट्र के गांवों में पशु व्यापार कानून की कड़ाई की वजह से बूढ़े बैल किसानों के घर के बाहर, खेत में मरने तक बैठे रहते हैं, और किसान नए बैल खरीदने की हालत में भी नहीं हैं। देश की पशु अर्थव्यवस्था धार्मिक उन्माद में चौपट हो गई है। इन सबके नुकसान सरकारों को ही उठाने होंगे।

(Daily Chhattisgarh)   

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