जजों की कुर्सियां खाली, और एआई के इस्तेमाल से हिचक, कैसे जनता पा सकेगी इंसाफ?

16 अगस्त 2026  

 

अभी एक पखवाड़े पहले, जुलाई 2026 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हाईकोर्ट जजों के करीब एक तिहाई पद खाली पड़े हैं। कुल 1122 जज होने चाहिए, और अभी 781 ही हैं। जबकि जिस दिन कोई जज बनते हैं, उसी दिन उनकी रिटायरमेंट की तारीख तय हो जाती है, और मामूली से क्लर्क भी यह हिसाब मिनटों में सामने रख सकते हैं कि किसी तारीख को कितनी कुर्सियां खाली हो जाएंगी। जज नियुक्त करने वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम, और केन्द्र सरकार के लिए यह बड़ा आसान रहता है कि समय रहते जज नियुक्त हो जाएं, और बिदाई और स्वागत समारोह एक ही दिन हो जाएं। लेकिन जैसा कि भारत में आम सरकारी ढर्रा है, कई संवैधानिक पदों पर तो कार्यकाल खत्म हो जाने तक नियुक्ति नहीं होती है। आज सुबह जो आंकड़े हमने देखे हैं, उनके मुताबिक कई हाईकोर्ट तो ऐसे हैं जिनमें जजों के स्वीकृत पद से आधे भी जज नहीं हैं। देश के सबसे बड़े हाईकोर्ट इलाहाबाद का यही हाल है, पटना, राजस्थान, तेलंगाना, ओडिशा का यही हाल है। हर चौथा हाईकोर्ट ऐसा है जिनमें कोई नियमित मुख्य न्यायाधीश नहीं हैं। और फिर करीब 65 लाख मामले इन अदालतों में चल रहे हैं, जिनमें से 80 हजार से अधिक मामले तो ऐसे हैं जो 30 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। 

हाईकोर्ट में वही मामले पहुंचते हैं, जो अपनी एक इंसानी पीढ़ी जितनी उम्र निचली अदालतों में गंवा चुके हैं। अगली पीढ़ी की बारी हाईकोर्ट में आती है, और सुप्रीम कोर्ट पहुंचने तक कई मामलों में तीसरी पीढ़ी शुरू हो चुकी रहती है। इनमें से किसी भी अदालत में मुकदमा जब 15-20 साल चलता है, तो वह सिर्फ एक फाइल नहीं रह जाता, किसी मामले में जमीन नहीं बिक पाती, किसी में मकान पर ताला नहीं खुल पाता, कहीं कारखाने में पूंजीनिवेश रूक जाता है, बैंक का कर्ज नहीं मिलता, परिवार बंट जाते हैं, बड़े जुर्म के मामलों में जुर्म के पीडि़त, और जुर्म के आरोपी दोनों के परिवार दशकों तक असमंजस में जीते हैं, कई मामलों में कुछ सौ, या कुछ हजार रूपए की रिश्वत या भ्रष्टाचार के आरोप में किसी कर्मचारी की पूरी जिंदगी निलंबन में निकल जाती है। इसलिए अदालतों में किसी मामले के पेंडिंग रहने का मतलब सिर्फ उस मामले में सजा, या बरी, या जुर्माना, या मुआवजा नहीं होता, उनसे कई-कई जिंदगियां भी जुड़ी रहती हैं। 

अब यह देखें कि क्या जजों की 30 फीसदी कुर्सियों को खाली होने के पहले ही भरने की तैयारी करने से मामला कुछ आसान होगा? आसान तो होगा, लेकिन उससे पूरा इलाज नहीं निकलेगा। आज अदालत में एक फाइल किसी जज तक पहुंचने के पहले वह अदालती नौकरशाही के कई स्तरों से होकर गुजरती है, और जैसी नौकरशाही सरकारी कामकाज में रहती है, उससे अधिक बेअसर अदालती नौकरशाही रहती है। तेज-तर्रार, और घाघ वकीलों से बात करें, तो समझ पड़ता है कि जज के सामने किसी मामले के जाने के पहले अदालती दफ्तरों में ही तिकड़म से बहुत से मामलों को आगे-पीछे किया जा सकता है, धीमा या तेज किया जा सकता है। अब दुनिया के हाथ एक बहुत बड़ा औजार है, ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से इस तरह के बाबूगिरी के बहुत से काम पलक झपकते आसानी से किए जा सकते हैं, जिनमें घाघ अदालती-नौकरशाही मनमानी करती है। एआई किसी भी मामले की सॉफ्ट कॉपी को मिनट भर में पढक़र बता सकता है कि क्या उनमें दस्तावेजों की कुछ कमी है? वह एक किस्म के बहुत सारे मामलों को एक साथ निकालकर अदालत से कह सकता है कि ये एक ही कानून से संबंधित एक ही किस्म के मामले हैं, और इन्हें एक साथ सुना जाना बेहतर होगा, और सभी का वक्त भी बचेगा। एआई बड़ी अदालतों के लिए यह भी तय कर सकता है कि किन मामलों में पेश होने वाले कौन से वकीलों की किस दिन, और किस वक्त की पेशी पहले से किसी और अदालत में लग चुकी है, और तारीखों का ऐसा टकराव एआई बिना किसी मेहनत के टाल सकता है। 

आज न्यायपालिका में एआई को लेकर आशंकाएं भरी हुई हैं। बहुत से लोग यह मानते हैं कि वकील जब एआई की मदद से अपनी पिटीशन तैयार करते हैं, तो एआई कई बार अपनी कल्पना से कई नामौजूद मामलों में अदालतों के ऐसे फैसलों का हवाला दे देता है जो कभी हुए ही नहीं थे। लेकिन यह तो वकील या जज के स्तर पर मामले से जुड़ी बातें हैं, जहां एआई पर भरोसा करने के बजाय इन्हें अपनी बुद्धि का ही इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन मानवीय बुद्धि की अनिवार्य जरूरत वाले दायरों को अगर छोड़ दें, तो एआई अमानवीय, या महामानवीय क्षमता से लैस है, और वह किसी एक हाईकोर्ट में एक जैसे मामलों को निकालकर एक साथ रखकर सुझा सकता है कि अलग-अलग कई जज इनमें अलग-अलग समय बर्बाद करने के बजाय इन्हें एक साथ सुन सकते हैं। अदालती कार्रवाई चलते हुए भी एआई इतना कर सकता है कि वकीलों, और जजों की बातों को सुनते हुए उन बातों से संबंधित पुराने फैसलों के संदर्भ खुद ही निकाल-निकालकर कम्प्यूटर स्क्रीन पर रखते जा सकता है, और उन्हें किताबों में तलाशते हुए वकीलों, और जजों को घंटों या दिनों का लगने वाला वक्त बच सकता है। आज भी अदालतें किसी जटिल मामले में अपनी मदद के लिए किसी निष्पक्ष वकील को न्यायमित्र नियुक्त करती हैं, जो पूरे मामले को समझकर जज या जजों को समझने में मदद करते हैं। इसी तरह अब कम से कम सुप्रीम कोर्ट, और हाईकोर्ट एआई की काबिलीयत से लैस ऐसे वकीलों को न्यायमित्र बना सकते हैं जो संबंधित-संदर्भ सुनवाई के दौरान ही निकालते चलें, और पूछने पर पल भर में पेश कर सकें। इन्हें सुनने के बाद वकील अपने तर्क खुद तय करें, और जज अपने फैसले खुद लें। आज एआई के इस्तेमाल से बहुत से कामचोर लोग एक ऐसी तस्वीर पेश कर चुके हैं कि जिनमें एआई खलनायक दिख रहा है। एआई तो महज एक कलाकार है, उसे नायक बनाना है, या खलनायक, यह तो इंसानों के हाथ है। हम तो इसे एक ऐसे औजार की तरह देख रहे हैं जो कि अदालतों में थक चुकी पीढिय़ों के हाथ-पैर दबाने के काम आए।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति को अपने कॉलेजियम का एकाधिकार बना रखा है, और उसकी सिफारिशों पर केन्द्र सरकार आखिरी फैसला लेती है, नियुक्ति आदेश निकालती है। ऐसे में बड़ी अदालतों की कुर्सियां खाली रखने में सुप्रीम कोर्ट, और केन्द्र सरकार दो ही जिम्मेदार हैं, और कई बार ऐसा सुनाई पड़ता है कि अदालत से गई सिफारिश पर सरकार समय रहते फैसला नहीं लेती है, और सुप्रीम कोर्ट सरकारी वकील को चेतावनी देते रह जाती है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। न सिर्फ ये नियुक्तियां, बल्कि देश-प्रदेश के तमाम संवैधानिक आयोगों की नियुक्तियों को समय रहते पूरा करने का एक फैसला सुप्रीम कोर्ट को देना चाहिए, वरना कहीं सूचना आयोग की कुसियां खाली पड़ी हैं, कहीं महिला आयोग की, और कहीं मानवाधिकार आयोग की। यह बात अच्छी तरह समझने की जरूरत है कि अदालतों में फैसले तेज होने लगेंगे तो उसका सबसे अधिक नुकसान सरकारों को होगा, क्योंकि बहुत बड़ी संख्या में मामले सरकारी फैसलों और नीतियों के खिलाफ चलते रहते हैं। इसी तरह संवैधानिक आयोगों में तो अधिकतर मामले सरकारों के ही खिलाफ रहते हैं। इसलिए सरकारों को इन नियुक्तियों, और मनोनयन को तय करने में हितों का एक बड़ा टकराव आड़े आता है। जैसे ही ये कुर्सियां भरती हैं, सरकारों पर खतरा बढ़ जाता है। इसलिए सरकारें इन्हें खाली रखने में अधिक दिलचस्पी रखती हैं, और इसीलिए हम देश की ऐसी न्यायिक व्यवस्था चाहते हैं कि कोई कुर्सी खाली होने की तय तारीख के पर्याप्त पहले नए नाम तय और घोषित हो जाएं। देखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट अपने अधिकारों, और अपनी जिम्मेदारियों को लेकर इतना चौकन्नापन दिखा पाता है, या नहीं। यह भी हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को रिटायर होने के बाद की उन्हीं के तबके के लिए आरक्षित सरकारी मनोनयन की कुर्सियां दिखती हों, और वे कड़े फैसले न ले पाते हों।

(Daily Chhattisgarh)   

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