20 अगस्त 2026
राजस्थान के बाद उत्तरप्रदेश सरकार ने आदेश निकाल दिया है कि बाहरी लोग स्कूल पहुंचकर कोई वीडियो नहीं बना सकेंगे। सरकारों के अपने तर्क रहते हैं, चूंकि सरकारी स्कूल सरकार की अपनी सम्पत्ति रहती है, इसलिए वहां बाहर के लोगों के आने, या वीडियो बनाने पर रोक लगाने का अधिकार तो उसे है, लेकिन पहली बार ऐसी नौबत क्यों आ रही है? आज राजस्थान में जाने कितने ही जिलों के दर्जनों या सैकड़ों गांवों के स्कूलों के छात्र-छात्राओं के आंदोलन सडक़ों पर उतर आए हैं। बात सिर्फ राजस्थान की नहीं है, उत्तर भारत और हिन्दी प्रदेशों में जगह-जगह यह हाल है। हम भी अपने अखबार में, और अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर लगातार इस बारे में सच सामने रखते रहते हैं, जो कि खासा असुविधा का रहता है। एकाएक जिस तरह देश भर में सरकारी स्कूलों के बच्चों के भीतर अपने बुनियादी हक के लिए एक जागरूकता आ गई है, उन्हें सडक़ों पर निकलना जरूरी लग रहा है, वे कई जगहों पर कलेक्टरों को बुलाने पर आमादा हुए जा रहे हैं, और जंतर-मंतर से सहमा हुआ यह देश, खासकर सहमी हुई सरकारें बच्चों की बातें सुन भी रही हैं। जंतर-मंतर पर जेन-जी कही जाने वाली 1995 के बाद की पैदाइश आंदोलन कर रही थी, लेकिन अभी तो शायद 2010 के बाद की पैदाइश स्कूली पोशाक में ही आंदोलन कर रही है। इस एकदम ताजा, गैरमतदाता पीढ़ी के आंदोलन से सरकारें ऐसी सहमी हैं कि स्कूलों की बदहाली पर वीडियो बनाना कुछ दिनों में राजद्रोह करार दे दिया जाए, तो भी हैरानी नहीं होनी चाहिए।
स्कूल तो सरकारों के हैं, उनकी हालत को लेकर ऐसी बदहवासी की नौबत क्यों आनी चाहिए? कोई अमरीकी राष्ट्रपति, या ब्रिटिश प्रधानमंत्री तो आ नहीं रहे कि कलकत्ता शहर से सारे फुटपाथजीवियों, और भिखारियों को बाहर कर दिया जाए, या अहमदाबाद की सडक़ किनारे की झुग्गीबस्तियों के सामने दीवार खड़ी कर दी जाए। यह तो गांव-गांव तक बिखरी हुई सरकार की अपनी स्कूलें हैं, उनमें देश के ही बच्चे पढ़ रहे हैं, देश के ही कॉकरोच वहां जाकर कुछ वीडियो बना रहे हैं, जिनमें उस बदहाली को दिखा रहे हैं जो सरकार को पहले से न सिर्फ मालूम होनी चाहिए थी, बल्कि जो होनी भी नहीं चाहिए थी। वे कोई रहस्य की बात तो बता नहीं रहे हैं। वैसे भी देश में कई जगहों से स्कूलों का यह हाल सामने आते ही रहता है कि वहां बैठकर मास्टर शराब पी रहे हैं, नशे में धुत्त फर्श पर पड़े हुए हैं, छत गिर रही है, पानी टपक रहा है, और घुटनों तक पानी में बच्चे आजादी का झंडा फहरा रहे हैं। अब ऐसे वीडियो पर तो सरकार को प्रोत्साहन देना चाहिए कि उसे जमीनी हकीकत की खबर लग रही है, ऐसे में सरकारी हुक्म निकालकर बाहरी लोगों के स्कूल जाने, और वीडियो बनाने पर रोक ऐसे लगाई जा रही है मानो वे इसरो में घुसकर किसी अंतरिक्ष रहस्य को चुरा रहे हैं। हकीकत जब इस हद तक छुपाने लायक हो जाए, तो पारदर्शिता, और जनभागीदारी के खिलाफ इस तरह के आदेश निकालना सरकार की अपनी नाकामयाबी पर पर्दा डालने के अलावा कुछ नहीं है।
भारत के सरकारी स्कूलों में कमियों और खामियों की लंबी फेहरिस्त है। और ये दोनों बातें मिलकर गरीबों की नई पीढ़ी को नाकाबिल बनाने का काम कर रही हैं। आज अधिकतर सरकारी स्कूलों में सिर्फ गरीबों के ही बच्चे पढ़ रहे हैं। सत्ता-विपक्ष, किसी भी तरह के और ओहदे, संपन्न और उच्च-मध्यम वर्ग के परिवार, और अब तो मध्यम वर्ग के भी परिवार अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेज रहे हैं। जिस तबके पर सरकार चलाने, सरकारी व्यवस्था बनाने, और बदइंतजामी को सुधारने का जिम्मा है, उनके कोई बच्चे इन गरीब स्कूलों में नहीं पढ़ते जहां पहुंचने वाले बच्चों को नदी-नाले पार करके आना पड़ता है, टपकती और गिरती हुई छत के नीचे गीली फर्श पर बैठना पड़ता है, पांच-पांच क्लासों के बच्चों को एक कमरे में पढऩा पड़ता है, कई विषयों के शिक्षक न होने पर बच्चों को सडक़ों पर उतरना पड़ता है। यह सब इसलिए है कि देश में किसी ताकतवर तबके के कोई बच्चे गरीब सरकारी स्कूल में शायद ही जाते हैं। कई बरस पहले का इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज का एक फैसला हमें याद पड़ता है जिसमें उन्होंने नेताओं, और अफसरों के बच्चों को अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूल में भेजने की बात कही थी। हमने कानूनी आधार पर उस वक्त लिखा था कि यह आदेश कमजोर है, और किसी भी तबके पर अनिवार्य रूप से लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन हम इस बात के हिमायती थे कि सरकारी स्कूलों में अगर तमाम नेताओं, और अफसरों के बच्चे पढ़ेंगे, तो शायद उनमें कुछ सुधार आ सकेगा। किसी भी दफ्तर में अगर बड़े अफसरों के शौचालय अगर रहते हैं, और छोटे कर्मचारियों के अलग रहते हैं, तो यह गारंटी हो जाती है कि छोटे कर्मचारियों के शौचालय गंदे रहेंगे। जब वे एक साथ रहते हैं, तो खींचतान कर, मजबूरी में ही सही, शौचालयों को साफ-सुथरा रखा जाता है।
आज जिन लोगों को सत्ता या अदालत पर बैठकर फैसले लेने पड़ते हैं, उन्हें अपने घर के बच्चों से पता ही नहीं चलता कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर क्या है। धीरे-धीरे ये स्कूल गरीब, कम पढ़े हुए, दलित, आदिवासी, और दूर-दूर गांवों में बसे हुए कमजोर तबकों के बच्चों के लिए ही रह गए हैं। इन बच्चों की भी अधिक आवाज नहीं रहती, इनकी माँ-बाप की तो बिल्कुल भी नहीं रहती। लेकिन अब भारतीय लोकतंत्र में कॉकरोच-युग आने से एक नई युगचेतना स्कूली बच्चों तक पहुंची है, और वे भी एकजुट होकर अपनी दिक्कतों के नारे लगाने लगे हैं। हमारा मानना है कि सरकारें अपने खुद के भले के लिए स्कूल सुधारो अभियान में जुट जाएं, वरना टूटी छतों से कॉकरोच टपकने लगेंगे, टूटी फर्श से तिलचट्टे निकलने लगेंगे, और नारे लगने लगेंगे। सरकारी आदेश स्कूलों के भीतर जाकर वीडियो बनाने से ही तो रोक सकते हैं, जब स्कूलों के बाहर सडक़ों पर, और जिला प्रशासन के दफ्तरों में बच्चों के प्रदर्शन होने लगेंगे, आज हो ही रहे हैं, तो सरकारें कितने कैमरे रोक लेंगी?
सरकार को कैमरों के बजाय यह परवाह करना चाहिए कि टैक्स के पैसों से बने हुए स्कूल भवन ऐसे खंडहर क्यों हुए जा रहे हैं, फर्नीचर पहुंचते ही क्यों टूटने लगे हैं, पढ़ाई का स्तर इतना खराब क्यों है, और बिजली, इंटरनेट, कम्प्यूटर बंद क्यों हैं? क्यों सुप्रीम कोर्ट को देश भर के प्रदेशों को झिडक़ना पड़ रहा है कि हर स्कूल में अलग से छात्रा-शौचालय बनाया जाए? क्या सत्ता हांकने वाले तबके के घरों में स्कूल जाने वाली बच्चियां नहीं हैं? क्या उनके किशोरावस्था में पहुंचने पर उनकी माहवारी शुरू नहीं होती? क्या उन्हें स्कूलों में पैड, पानी, शौचालय, और डस्टबीन की जरूरत नहीं पड़ती? क्या स्कूलों में जैसा दोपहर का खाना मिल रहा है, सत्ता की संतानें क्या दो दिन भी वैसा खाना खा सकती हैं? ऐसे बहुत सारे असुविधा के सवाल हैं, और कॉकरोचों का क्या है, वे तो न सरकारी नोटिस पढ़ सकेंगे, न ही कोई गेट उन्हें रोक सकेेंगे, वे तो कहीं से भी सरककर भीतर पहुंच जाएंगे, और नारे लगाने लगेंगे? पश्चिम बंगाल में एक व्यक्ति ने अभी अपने मोहल्ले या गांव की स्कूल की बदहाली को सुधारने की बात कही, तो उसे कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। अब अगर ऐसी हिंसा का बाकी देश में हिंसक जवाब देना शुरू हो जाएगा, तो उस बदहाली पर सरकारों को जवाब देना मुश्किल पडऩे लगेगा।
सरकारों को यह समझना चाहिए कि आज स्कूलों को सुधारने के लिए जो माहौल देश भर में बन रहा है, उसकी प्रतिबंध लगाने वाली आम सरकारी प्रतिक्रिया आत्मघाती होगी। देश भर में करोड़ों गरीब बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, और आज नहीं तो कल ये वोटर भी रहेंगे। इन बच्चों को जब तक गैरस्कूली बातों से बहलाना चलते रहा, तब तक तो सब कुछ खप गया। लेकिन अब बच्चों को समझ आ रहा है कि पढ़ाई का कोई दूसरा अंधविश्वासी विकल्प नहीं हो सकता, और वे पढऩे का अपना हक मांग रहे हैं। इस वक्त जिम्मेदारी से मुंह चुराने का कोई विकल्प सरकारों के सामने नहीं है। दूसरों पर प्रतिबंध लगाकर खुद नहीं बचा जा सकता, समय रहते सरकारें समझ लें, तो बेहतर होगा।
हमने अपनी बात लिखकर खत्म की ही थी कि छत्तीसगढ़ की कुछ जगहों से नई खबरें आ रही हैं कि कहां स्कूल की बदहाली को लेकर, तो कहां स्कूल के सामने सडक़ों की बदहाली को लेकर बच्चे आंदोलन पर बैठे हैं। सोशल मीडिया को देखें तो सैकड़ों अलग-अलग जगहों के असल वीडियो जमीनी बदहाली का नजारा दिखा रहे हैं। मुफ्त में मिले हुए इस फीडबैक की अनदेखी किसी भी सरकार को भारी पड़ सकती है, आज नहीं तो कल यह पीढ़ी भी वोटर बनेगी।
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