पेपर बेचने वाले प्रोफेसर के लिए मौजूदा सजा कम, कानून में संशोधन जरूरी..

22 अगस्त 2026  

 

देश भर में जगह-जगह इम्तिहानों के पर्चे लीक होने को लेकर साल-दो साल से बवाल चल रहा है। मेडिकल दाखिले के लिए होने वाली नीट इम्तिहान के पेपर लीक की वजह से तो विश्व इतिहास में पहली बार पर्चों को दुबारा इम्तिहान में एयरफोर्स के विमानों से भेजा गया। देश भर में एक असाधारण ऐतिहासिक आंदोलन पर्चे आउट होने के खिलाफ चला, और एक  बहुत कड़ा कानून इसके लिए 2024 में बनाया गया था जिसमें तीन से पांच साल तक की जेल, और 10 लाख रूपए तक के जुर्माने का इंतजाम किया गया, और अगर मैनेजमेंट की भागीदारी साबित होती है तो 3 से 10 साल की कैद, और एक करोड़ रूपए तक जुर्माना लगाया गया था। इस कानून को गैरजमानती, और गैरसमझौता योग्य बनाया गया था। अब 2026 में पिछले ही महीने इसमें एक संशोधन पेश किया गया है जो कि लोकसभा में विचाराधीन है जिसमें पर्चों से जुड़े मैनेजमेंट पर पांच करोड़ रूपए तक जुर्माने, और आठ साल तक प्रतिबंध के कड़े प्रावधान किए गए हैं। व्यक्तियों को व्यक्तिगत अपराध के लिए 5 से 10 साल की कैद, और 50 लाख तक जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। इसके बाद भी अभी जब छत्तीसगढ़ में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय का एक पर्चा लीक होकर धड़ल्ले से चारों तरफ फैला, तो यह समझ आया कि कागजों पर कड़ी सजा किसी को जुर्म से नहीं रोक पाती है। लोगों का भारतीय न्याय प्रक्रिया की कमजोरी पर इतना पुख्ता भरोसा है कि वे बड़े से बड़ा जुर्म करके बच जाने की उम्मीद रखते हैं। 

अभी पुलिस ने छत्तीसगढ़ के इस मामले में दुर्ग जिले के भारती एग्रीकल्चर कॉलेज नाम के निजी कॉलेज के एक प्रोफेसर सहित आधा दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया है। विश्वविद्यालय ने इस इम्तिहान के लिए प्रदेश के 28 सरकारी, और 4 निजी कॉलेजों को छांटा था, और वहां पर पर्चे समय से पहले पहुंचाए जाते थे। अभी जिस प्रोफेसर योगेश सोनकेसरिया को गिरफ्तार किया गया है वह अपने कॉलेज से रायपुर के कृषि विश्वविद्यालय तक कॉपियां लाने ले जाने, प्रश्नपत्र लाने का काम करता था। उसने इसमें से एक लिफाफे के कोने में बारीक छेद करके भीतर एक छोटा कैमरा डालकर प्रश्नपत्र की फोटे खींची थीं, और फिर 11 हजार रूपए में बेच दी थी। खरीदने वाले छात्र ने इसे कुछ और लोगों को दिया। अब सवाल यह उठता है कि 2019 से जो एक कॉलेज में प्राध्यापक है, वह 11 हजार रूपए के लिए एक इम्तिहान को चौपट करने का काम कर रहा है, और अपने ही कॉलेज के छात्रों को पर्चा बेच रहा है। 

आज हिन्दुस्तान में नौजवान आबादी का एक बड़ा हिस्सा बेरोजगार है। लेकिन जिन लोगों को रोजगार मिला हुआ है, उनमें से कई शिक्षक शराब पिए हुए स्कूलों में पड़े रहते हैं, बहुत से लोग नौकरी की परवाह किए बिना रिश्वत लेने में लगे रहते हैं, और एक कॉलेज प्राध्यापक इस तरह की आपराधिक साजिश करके एक मामूली सी रकम के लिए इतना बड़ा खतरा मोल ले रहा है। यह 11 हजार रूपए की रकम एक कॉलेज प्राध्यापक की तनख्वाह के मुकाबले कुछ भी नहीं होगी। देश में कड़ा कानून बनने की चर्चा और लोगों में न सही, स्कूल-कॉलेज के लोगों में तो हुई ही होगी। आज जंतर-मंतर से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, संसद से लेकर सडक़ तक पर्चे आउट होने को लेकर जनता की अभूतपूर्व नाराजगी सामने आ ही रही है, बड़े-बड़े आंदोलन चल रहे हैं। ऐसे में भी लोगों को पर्चे आउट करके बेचने का उत्साह बना हुआ है। यह तो यह हरकत पकड़ में आ गई। मान लें कि नहीं आई होती, तो पर्चे खरीदने वाले छात्र दूसरे ईमानदार छात्रों के मुकाबले कई तरह के फायदे पा सकते थे, पाते ही। इसलिए इम्तिहानों में, नौकरी के साक्षात्कार में बेईमानी सिर्फ खुद के फायदे की बात नहीं होती, वह दूसरों के हक छीनने की बात भी होती है। कड़े कानून की जरूरत भी इसीलिए थी कि समान अवसरों से वंचित रह जाने वाले तबके इस तरह के जुर्म से इतने विचलित होते हैं कि खुदकुशी भी कर लेते हैं। जिस नीट इम्तिहान को लेकर देश हिल गया, उसके दुबारा होने से पहली बार के कामयाब बच्चों में से 20 से अधिक बच्चों ने खुदकुशी कर ली थी। एक प्रदेश के एक विश्वविद्यालय के ऐसे एक इम्तिहान के एक पर्चे से शायद कुछ सौ, या कुछ हजार लोग ही जुड़े होंगे, लेकिन जब किसी संस्थान के इंतजाम की विश्वसनीयता खत्म होती है, तो मुकाबला करने वाले सभी बच्चों, और नौजवानों का विश्वास भी खत्म होता है। लोगों में एक निराशा छा जाती है कि उनकी मेहनत से क्या फायदा, क्योंकि उनके मुकाबले कमजोर लोग तो पर्चे खरीदकर, या किसी और तरीके से लिस्ट में ऊपर आ जाएंगे। 

कानून में पांच-दस बरस की कैद के बाद ऐसे लोगों का पढऩा, और पढ़ाना खत्म ही हो जाएगा, लेकिन इन लोगों को सजा मिलने से परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता जल्दी नहीं लौट पाएगी। यही छत्तीसगढ़ है जहां बीते बरसों में राज्य लोकसेवा आयोग बेरोजगारों के हक की सरकारी कुर्सियों को पैसेवालों, और नेता-अफसरों के रिश्तेदारों को देते आया है, आज पीएससी के चेयरमैन सहित बहुत से लोग जेलों में पड़े हैं, जिनमें करोड़पति-अरबपति उद्योगपतियों के परिवारों के लोग भी हैं जिन्होंने 50-50 लाख में एक-एक कुर्सी खरीदी थी। आज देश में इम्तिहानों की बेईमानी, दाखिले, और नौकरी के मुकाबलों में बेईमानी एक बहुत बड़ा मुद्दा है। देश के सारे बेरोजगार, चाहे वे प्रतिभा के आधार पर चयन सूची में आने के लायक न हों, वे भी निराश हो जाते हैं कि सलेक्शन में बेईमानी चल रही है। यह सिलसिला टूटना चाहिए। जहां बाकी लोगों के हक छीनकर कुछ लोगों के बीच पढ़ाई या नौकरी की कुर्सी बेची जाती है, वहां पर इन लोगों को और कड़ी सजा मिलनी चाहिए, और लोकसभा में जो संशोधन अभी है, उसे भी कानून बनाया जाना चाहिए। इस बीच यह उम्मीद तो जायज ही होगी कि इम्तिहान और इंटरव्यू लेने वाले सभी संस्थान अपने इंतजाम और पुख्ता करते चलें, क्योंकि पेपर आउट करने का बड़ी कमाई का धंधा तो मुजरिम चलाते ही रहेंगे, और उसे रोकने की तरकीबें भी जारी रखनी होगी।

(Daily Chhattisgarh)   

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