19 अगस्त 2026
पिछले कुछ महीनों से दुनिया में पुरानी ऐतिहासिक किताबों को चाहने वाले लोगों की छाती पर उस वक्त लात पड़ी जब पता लगा कि एआई कंपनियां अपने कम्प्यूटरों का ज्ञान बढ़ाने के लिए दुर्लभ किताबों को खरीद रही हैं, उन्हें काटकर पन्ने अलग कर रही हैं, फिर उन्हें स्कैन करके अपनी मशीनों की ट्रेनिंग में इस्तेमाल कर रही हैं। यह नौबत अंतरराष्ट्रीय बाजार से दुर्लभ किताबों को रफ्तार से खत्म कर रही है क्योंकि एआई कंपनियां खुद यह जहमत उठाने के बजाय कई एजेंट कंपनियों को तैनात करके इस काम को तेजी से कर रही हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि इंटरनेट पर पहले से मौजूद सारा ज्ञान एआई कंपनियां अपनी मशीनों के दिमाग में पहले ही भर चुकी हैं। अब इंटरनेट पर जो सामग्री आ रही है उसके साथ एक बहुत बड़ा खतरा यह है कि उसमें से बहुत सारी तो अलग-अलग एआई कंपनियों, और मशीनों की ही बनाई हुई है। फिर एक खतरा यह भी है कि आज एआई जितनी जानकारी उगलता है, उसमें से बहुत सारी तो गलत भी निकल जाती है, और कई जानकारियां तो एआई अपनी कल्पना से गढक़र पूरी तरह झूठी दे देता है, जिसे वह पूरी तरह सच्ची दिखने वाली भी बना देता है। आज एआई का हमारी तरह के जो लोग भरपूर इस्तेमाल करते हैं, वे जानते हैं कि एआई के साथ अगर सावधान न रहा जाए, तो वह एक पूरी की पूरी कहानी गढक़र उसमें तारीखें, जगहें, नाम सब भरकर एक भरोसेमंद दस्तावेज की तरह पल भर में पेश कर देता है। इसलिए आज एआई कंपनियां मौजूदा इंटरनेट को अपनी ट्रेनिंग के लिए सावधानी के साथ और एक सीमा तक ही इस्तेमाल कर रही हैं। फिर यह भी है कि आज हासिल ज्ञान से ऊपर अगर जाना है, अगर उससे परे की चीजें अपनी मशीनों को बतानी है, तो इसके लिए इंटरनेट से परे के दुर्लभ ज्ञान तक जाना जरूरी रहेगा, और इसीलिए बड़ी कंपनियां, बड़ी रफ्तार से, बड़ी संख्या में दुर्लभ किताबें अपनी मशीनों में चारे की तरह डाल रही हैं।
अब दुनिया में ऐतिहासिक, संग्रहणीय, और दुर्लभ चीजों के महत्व को जानने वाले लोग सदमे में हैं कि सिर्फ एक आधुनिक तकनीक को और अधिक ज्ञान-संपन्न बनाने के लिए क्या इतिहास को इस बेरहमी से मिटाया जा सकता है? क्या इसके खिलाफ दुनिया में कोई कानून नहीं है? क्या विश्व विरासत की फिक्र करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी एआई कंपनियों के इस बाजारू हमले को रोकने की फिक्र नहीं हो रही है? ऐसे कई सवाल हमारे दिमाग में भी उठते हैं। अभी विश्वकप फुटबॉल के बाद नार्वे के एक स्टार खिलाड़ी ने उसे मिले हुए दर्जनों करोड़ रूपयों में से एक बड़ी दुर्लभ किताब खरीदी, और अपने शहर या कस्बे की लाइब्रेरी को तोहफे में दे दी। एक फुटबॉल खिलाड़ी से किताब के प्रति ऐसी संवेदनशीलता कई लोगों को अनोखी लग सकती है, लेकिन एरलिंग हालांड ने 1594 में छपी किताब को करीब सवा करोड़ रूपए में खरीदकर अपने बचपन की सार्वजनिक लाइब्रेरी को उपहार में दिया। इसके साथ-साथ उसने सैकड़ों बच्चों के लिए लाइब्रेरी की फीस भी भरी। अब सवाल यह उठता है कि अगर एआई कंपनियां इस किताब को पहले खरीद लेतीं, तो वे इसके पन्ने फाडक़र, स्कैन करके अपनी मशीनों के दिमाग में तो डाल देतीं, लेकिन यह किताब फिर खत्म हो जाती।
अब हम किसी एआई कंपनी की वकील की तरह भी थोड़ी सी देर के लिए सोचना चाहते हैं, क्योंकि दूसरा नजरिया भी तो समझ में आए। आज दुनिया में जहां कहीं भी दुर्लभ किताबें हैं, वे आम लोगों की पहुंच से मोटेतौर पर बाहर हैं। वे किसी बहुत रईस, गैररईस के निजी संग्रह में हैं, या किसी किताब दुकान में दबी हुई हैं, या किसी लाइब्रेरी की आलमारी में बंद हैं। आम लोगों की पहुंच दुर्लभ किताबों तक बहुत कम रहती है, इतना जरूर है कि यूनेस्को के एक प्रोजेक्ट के तहत ऐसी लाखों-करोड़ों दुर्लभ किताबों की पीडीएफ कॉपी इंटरनेट पर मुफ्त उपलब्ध है। अब अगर एआई कंपनियां इन किताबों की जानकारी को अपने कम्प्यूटरों में भरकर, उन्हें मुहैया कराएंगी, उनके आधार पर अपनी जानकारी और विश्लेषण में संपन्नता लाएंगी, तो क्या इससे दुनिया के ज्ञान का कुछ भला भी हो सकेगा? आज एंथ्रोपिक नाम की एआई कंपनी ने लाखों किताबें खरीदकर अपने कम्प्यूटरों पर भर डालीं, और उन्हें खत्म कर दिया। वे किताबें लोगों को आसानी से हासिल नहीं थीं, लेकिन अब इस एआई कंपनी से पूछने पर इन किताबों की जानकारी मिल सकती है। यह सोचना एक शैतान के वकील की तरह का है, लेकिन फिर भी हम विचार-विमर्श के लिए यह सोचना चाहते हैं।
आज दुनिया में बहुत पुरानी किताबें ऐसी भी हैं जो कि दुबारा प्रकाशित नहीं हो रही हैं, क्योंकि उनके ग्राहक अधिक नहीं होंगे। ऐसी किताबें दुबारा दुनिया के सामने आने का और कोई जरिया नहीं है। यूनेस्को के जिस प्रोजेक्ट की हमने बात की है, वह एक जरिया जरूर है, लेकिन उससे परे की भी कई चीजें हो सकती हैं। अभी-अभी भारत में केन्द्र सरकार के कहे हुए देश के हर जिले में पुरानी पांडुलिपियों को डिजिटल करके उनकी कॉपी संभालकर रखी जा रही है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण, और अलग तरह का प्रोजेक्ट है। यह अभी तक बाजार व्यवस्था से परे का है, लेकिन क्या ऐसी जानकारी भी किसी एआई कंपनी को बेची जा सकती है, या सार्वजनिक, और सामाजिक उपयोग के लिए यूनेस्को को दी जा सकती है? फिर सवाल यह भी उठता है कि यूनेस्को ने सार्वजनिक उपयोग के लिए जो जानकारी सामने रखी है, वह तो एआई कंपनियों को वैसे भी हासिल थी। वे तो ऐसी ही किताबें खरीद रही होंगी जो कि यूनेस्को की वेबसाइट पर नहीं होंगी।
अब बाजारू के अलावा एक दूसरा नैतिक सवाल उठ खड़ा होता है कि किसी दुर्लभ किताब की जानकारी पर एकाधिकार पाने वाली एआई कंपनी अपने कम्प्यूटरों में इस ज्ञान को किस तरफ मोडक़र कैसा इस्तेमाल करे, यह तो वह तय कर सकती है। हो सकता है कि गोरी सोच रखने वाली ऐसी कोई कंपनी काले गुलाम लोगों के इतिहास की किसी दुर्लभ किताब को कॉपी करने के बाद, नष्ट करने के बाद उसे अपने कम्प्यूटरों की याददाश्त में ताला डालकर रख दे। बाजार कुछ भी कर सकता है, व्यापार, और नैतिकता ये दोनों कभी भी एक सिक्के के दो पहलू नहीं हो सकते। ऐसे में किसी दुर्लभ ज्ञान पर बाजारू कंपनी के एकाधिकार, और फिर उसे नष्ट कर देने के खतरे धरती के इतिहास के एक हिस्से को हमेशा के लिए खत्म कर देने से कम खतरनाक, और कम नुकसानदेह नहीं है। इसलिए इस पूरे मुद्दे पर लोगों को बारीकी से सोचना चाहिए कि दुनिया के इतिहास के एक हिस्से को बाजार के एकाधिकार के हवाले करना कितना जायज है, कितना नाजायज है। हम इस खुली बहस को छेडक़र लोगों से सोचने की उम्मीद करते हैं।
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