18 अगस्त 2026
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के बीच घनी आबादी में छोटा सा एक बच्चा घर के बाहर खेल रहा था। पांव फिसलने से वह बारिश के पानी से लबालब, और तेज बहाव वाली नाली में गिरा, और बहकर नाले में पहुंच गया। मुश्किल से उसे निकाला गया। इस खबर के साथ ही अखबारों ने हाल-फिलहाल में जगह-जगह, कहीं किसी बनती इमारत के गड्ढे में, तो कहीं और डूबकर मरने वाले बच्चों की जानकारी छापी है। कहीं पर बच्चे बिजली के करंट से मर रहे हैं, तो कहीं छत से गिरकर। ऐसे हादसों पर आमतौर पर विचारों के किसी गंभीर कॉलम में नहीं लिखा जाता, लेकिन हमें लगता है कि असल और जमीनी जिंदगी के ये मुद्दे सोचने को मजबूर करते हैं कि क्या जागरूकता से कोई बचाव हो सकता है?
सडक़ों पर कई बार दिखता है कि घनी आबादी के बीच से निकलती गाडिय़ों के सामने दौड़ते हुए बच्चे आ जाते हैं, कई बार वे पतंग लूटने दौड़ते रहते हैं, कभी किसी गेंद को लपकने के लिए, और कभी सडक़ पार के खाने-पीने के किसी ठेले की तरफ। ऐसी बहुत सी वजहें हो सकती हैं जिनसे बच्चों का ध्यान ट्रैफिक की तरफ न रहे, अपनी मंजिल की तरफ रहे। ऐसा सिर्फ बच्चों के साथ ही नहीं होता है, बड़ों के साथ भी होता है। शाम-रात को देखें, तो शराबी सडक़ के दूसरी तरफ की दुकान की तरफ जिस एकाग्रता से बढ़ते रहता है, तो उसका ध्यान किसी भी और चीज की तरफ नहीं रहता। वह मछली की आंख की तरफ बढ़ते हुए तीर की तरह शराब की तरफ बढ़ता है, और ले-लेने के बाद उसी एकाग्रता से, ट्रैफिक से बेखबर लौटता है। कमान से छूटे हुए इस तीर की राह में अगर कोई गाड़ी आती है, तो उस पर इंसान को कुचलने की तोहमत तुरंत लग सकती है। ऐसे में जब अनुभवहीन छोटे बच्चे लापरवाही से बिजली के किसी तार को छू लेते हैं, सडक़ से गुजरती किसी गाड़ी के सामने आ जाते हैं, किसी जहरीले बीज को खा जाते हैं, तो मौत बहुत आसान हो जाती है, या आसानी से हो जाती है।
सरकार इसमें कुछ नहीं कर सकती, लेकिन परिवार और समाज को अपने छोटे बच्चों का ख्याल रखना चाहिए। उन्हें समझ आए, तब तो उन्हें खतरों से बचने की नसीहत देकर सावधान किया जा सकता है, लेकिन जब वे बहुत छोटे रहते हैं, उस वक्त तो उन्हें सिखाया नहीं जा सकता। हमारे एक दोस्त परिवार में बहुत बड़ी उम्र हो जाने पर, बड़ी कोशिशों से संतान का मुंह देखने मिला। पत्नी बाथरूम में प्लास्टिक के एक छोटे से टब में पानी भरकर बच्चे को नहला रही थी, कि इसी बीच घर के दरवाजे की घंटी बजी। उसने टब पकडक़र खड़े हुए बच्चे को छोड़ा, और दरवाजा खोलने गई। एक-दो मिनट के भीतर वह वापिस लौटी, तो तब तक बच्चा टब में उलट चुका था, और पानी में डूबकर खत्म हो गया था। ऐसी घटना लोगों को एक-दूसरे को बतानी चाहिए ताकि दूसरे माँ-बाप अपने बच्चों के साथ सावधानी बरत सकें। आज तो सोशल मीडिया की मेहरबानी से मुफ्त की सार्वजनिक जगह इतनी मिली हुई है कि लोग ऐसे हादसों की चर्चा कर सकते हैं, और दूसरे लोग अपने बच्चों के बारे में सावधान हो सकते हैं।
सडक़ों के किनारे किसी सार्वजनिक जगह पर खाने-पीने का सामान लेकर चलते हुए छोटे बच्चों पर कुत्ते या दूसरे जानवर झपट सकते हैं, और उनके हमले से बच्चे जख्मी हो सकते हैं। बहुत से तीर्थस्थानों, और पर्यटन केन्द्रों पर बंदरों की भीड़ रहती है, जो न सिर्फ खाने-पीने के सामान झपटकर ले जाती है, बल्कि मोबाइल फोन, या चश्मे भी छीन लेती है। किसी की टोपी उठाकर ले जाते हुए, या कुछ और छीनने वाले बंदरों को रोकने की कोशिश पर वे नोंच भी सकते हैं, काट भी सकते हैं। कुछ लोग ऐसी जगहों पर बंदरों को अपने हाथ से चने खिलाते हैं, और उसमें भी बंदर कभी-कभी काट सकते हैं। कुत्तों के काटने पर जो एंटीरैबीज इंजेक्शन लगते हैं, वे ही इंजेक्शन चूहा, बिल्ली, बंदर, किसी भी और जानवर के काटने पर लगाने की नौबत आती है। कोई-कोई घटना चिकित्सा विज्ञान में ऐसी भी दर्ज हुई है कि एंटीरैबीज का पूरा कोर्स लगवाने के बाद भी लोग रैबीज से मरे हैं।
यह पूरी बात सुनने में बड़ी साधारण और महत्वहीन लग सकती है, लेकिन अगर सावधानी लोगों के मिजाज में आ जाए, तो बहुत सी मासूम जिंदगियां बच सकती हैं। हमें लगता है कि समाज के भीतर बच्चों को लेकर सावधानी बरतने के कुछ वर्कशॉप होने चाहिए, जिनमें कि परिवार के सभी लोगों को शामिल होना चाहिए। किस तरह चाकू, ब्लेड, या दूसरे धारदार सामान बच्चों से दूर रखे जाने चाहिए, किसी भी तरह की दवा उनकी पहुंच से बाहर रहनी चाहिए, किस तरह बिजली के तार, उपकरण उनसे दूर रहने चाहिए। उन्हें कैसे माचिस, गैस चूल्हे, मोमबत्ती या दीये से दूर रखना चाहिए, इस सावधानी के महत्व को शायद ही कोई समझें, लेकिन यह बच्चों के प्रति बड़ों की जिम्मेदारी का मामला है, और इसे गंभीरता से लेना चाहिए। हमारे एक मित्र परिवार में एक छोटी बच्ची को डॉक्टर ने कोई ऐसी गंभीर दवा दी थी जिसके बारे में कहा गया था कि उसे महज चार बूंद देना है, एक भी बूंद ज्यादा नहीं देना है। दवा का स्वाद शायद बच्ची को अच्छा लगा, बोतल उसकी पहुंच में थी, उसने ढक्कन खोला, और पूरी बोतल एक बार में खाली कर गई! जहां बूंदें चार से पांच नहीं होनी थी, वहां उसने जाने दो सौ या चार सौ कितनी बूंदें एक साथ पी लीं। ऐसा कोई ओवरडोज जानलेवा भी हो सकता है। लेकिन कितने लोग हैं जो कि दवाओं को बच्चों की पहुंच से पर्याप्त दूर रखने की सावधानी रखते हैं? इन दिनों कई जगहों पर बिजली के प्लग प्वाइंट बच्चों की पहुंच के भीतर होते हैं। और वे बुनाई की सलाई जैसी कोई भी धातु की चीज ऐसे प्लग के भीतर डाल सकते हैं, और बहुत बुरी तरह बिजली के झटके के शिकार हो सकते हैं।
ऐसी मिसालें अंतहीन हो सकती हैं, लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि इसी देश में हर दिन कहीं न कहीं बच्चा चोरी की घटना होती है। चुराए गए बच्चों को बेचने का एक बड़ा बाजार है जिसमें बेऔलाद माँ-बाप से लेकर भीख मंगवाने वाले लोगों के गिरोह तक हैं। इसलिए किसी पर्यटन केन्द्र पर, स्टेशन या बस अड्डे पर, बगीचे, मैदान, या किसी मेले में अपने बच्चों का बहुत अधिक ख्याल रखना जरूरी है, क्योंकि हर जगह तो सीसीटीवी कैमरे रहते नहीं हैं जिनमें बच्चे चुराकर ले जा रहे लोग दर्ज हो जाएं, और बच्चों को वापिस हासिल किया जा सके। कई लोगों को यह पूरी बात गैरजरूरी लग सकती है कि इतनी समझ तो हर किसी में रहती है कि अपने बच्चों का ख्याल रखें। लेकिन हमारा मानना है कि स्कूलों में बच्चों के माँ-बाप को बुलाकर अगर ऐसे वर्कशॉप करवाए जाएं, तो इससे हादसों में कमी जरूर आएगी। किसी एक को ठोकर लगती है, तो उससे बाकी लोगों को सबक लेना चाहिए, नसीहत पाना चाहिए। हर कोई अलग-अलग ठोकर खाए, तो यह तो कोई अच्छी बात नहीं होगी। और कुछ नहीं तो आज के हमारे इस लिखे हुए के लिंक को आप दूसरों तक बढ़ाएं ताकि सावधानी पर चर्चा कुछ आगे बढ़ सके। आपके बच्चे सुरक्षित रहें, इसके लिए हमारी शुभकामनाएं।
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